काले धन को अर्थव्यवस्था में वापस लाने का इससे बढ़िया मौका नहीं मिलेगा!

दुनिया में कोरोना वायरस का तांडव लगातार जारी है। दुनिया में अबतक लगभग चार करोड़ लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं जबकि 11.15 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। जनसंख्या के हिसाब से दूसरा सबसे बड़ा देश भारत भी इस प्रकोप से बुरी तरह प्रभावित है। अब तक देश में 75 लाख लोग इस संक्रमण से ग्रसित हो चुके हैं और 1.15 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पिछले 100 साल के इतिहास में इसे सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में देखा जा रहा है। कुल मौतों के हिसाब से भारत अमेरिका (2,24,282) और ब्राजील (1,53,690) के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। जबकि संक्रमित लोगों की संख्या के हिसाब से यह अमेरिका (83,42,665) के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। महीनों तक लॉकडाऊन की स्थिति में रहने के कारण देश की अर्थव्यवस्था पिछली तिमाही में 23.9% तक घट गई। इससे सरकार के गरीबी से लड़ने के प्रयास को बड़ा झटका लगना स्वभाविक है। अर्थव्यवस्था को उबारने के लिये प्रधानमंत्री ने कुछ समय पहले 20 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की थी और छिटपुट प्रयास अब भी जारी हैं। उम्मीद की जा रही है कि अगले वर्ष तक एंटी कोरोना वैक्सीन बाजार में आ जाएगी। अभी से यह चर्चा जोरों पर है कि क्या सरकार को यह वैक्सीन मुफ्त में उपलब्ध कराना चाहिए? यदि ऐसा होता है देसी वैक्सीन को 1.35 अरब से अधिक की जनसंख्या तक उपलब्ध कराने के लिए कम से कम 5 से 7 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। इसके अलावा विकास के अन्य कार्यों जैसे कि नए अस्पताल, स्कूल, सड़क, परिवहन, पेयजल जैसे कार्यों के लिये भी धन की बड़ी आवश्यकता होगी। चूंकि सरकार की आमदनी का एकमात्र जरिया टैक्स ही है इसलिये इतनी बड़ी धनराशि को जुटाने के लिये नए कर आरोपित करने पड़ेंगे। चूंकि महामारी के दौर में पहले से त्रस्त जनता पर नया कर लगाना कहीं से भी समझदारी नहीं होगी, इसलिये इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा समय में सरकार की सबसे बड़ी चिंता यही होगी।

कहावत है कि एक समझदार व्यक्ति (सरकार) क्राइसिस (संकट) की घड़ी को जाया होने नहीं देता है। दुनिया भर में जितने भी बड़े भी सुधार हुए हैं उनमें से अधिकांश संकट की घड़ी में ही उत्पन्न हुए हैं। 1990 के दशक में भारत इसका अनुभव कर चुका है। इस हिसाब से पैसे की व्यवस्था करने का एक कारगर तरीका देश से बाहर पड़े काले धन को देश की अर्थव्यवस्था में वापस लाना हो सकता है। काले धन को वापस लाने और इससे होने वाले फायदे पर बात करने से पहले धन, उसकी प्रवृति व काले धन में परिवर्तन के कारणों पर थोड़ी चर्चा जरूरी है।

हमें यह समझना होगा कि धन अंततः धन होता है। यह काला और सफेद नहीं होता। धन को काले और सफेद (कानूनी और गैर कानूनी) में विभाजित करना ही असल समस्या है। जैसे ही सरकार अथवा कोई सरकारी संस्था धन को काले या सफेद में वर्गीकृत करती है, धन अपना नैसर्गिक गुण अर्थात और धन पैदा करने की क्षमता समाप्त कर देता है। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा नुकसान, मौजूदा धन की सहायता से और धन पैदा न कर पाने की क्षमता पहुंचाती है। आगे बढ़ने से पहले हमें गैरकानूनी अर्थात काले धन की उत्पत्ति को समझना होगा। मोटे तौर पर काले धन का मुख्य कारण सरकार द्वारा लोगों को अधिक आय अर्जित करने पर पाबंदी लगाना और आवश्यकता से अधिक कर वसूलना है। दरअसल, आय और व्यय एक वृत्ताकार प्रक्रिया है जिसमें उत्पादक और उपभोक्ता के साथ सरकार भी शामिल होती है। जिस प्रक्रिया में सरकार को (कर ना चुकाकर) शामिल नहीं किया जाता है वह कालाधन बन जाता है।

हमें यह भी समझना होगा कि अपने आय को और अधिक करना मानवीय स्वभाव है। हर कोई चाहता है कि अपनी वर्तमान आय में वह और इजाफा करे। इसके लिए एक सरकारी अध्यापक स्कूल के बाद खाली समय में ट्यूशन पढ़ा सकता है। या एक सरकारी डॉक्टर थोड़ा समय निकालकर घर पर और मरीजों को देख सकता है। ध्यान रहे कि यह उस प्रकार का काम नहीं है जिससे किसी का अहित हो, लेकिन ऐसी संभावनाएं होती हैं कि सरकारी कर्मचारी अपने प्राथमिक पेशे के प्रति ईमानदार नहीं रह जाएगा। इसके मद्देनजर, कर्मचारियों के द्वारा प्राथमिक पेशे (नौकरी) के प्रति लापरवाही बरतने से रोकने के नाम पर सरकारी कर्मियों का ऐसा करना प्रतिबंधित है और पकड़े जाने पर सजा का प्रावधान है। लेकिन बड़ी तादात में सरकारी कर्मचारी न केवल ऐसा करते हैं बल्कि नौकरी के इतर अर्जित धन का चाहते हुए भी खुलासा नहीं कर पाते हैं। और इस प्रकार कर ना चुकाने के कारण वह धन काले धन में परिवर्तित हो जाता है।

हालांकि संपूर्ण कालेधन में इस प्रकार से अर्जित काले धन का हिस्सा अत्यंत कम होता है। काले धन में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी राजनेताओं द्वारा लिये गए राजनैतिक चंदे, सरकारी अधिकारियों, पुलिस आदि द्वारा ली गई रिश्वत, रियल स्टेट के क्षेत्र में होने वाला लेनदेन और उद्योगपतियों द्वारा कर चोरी की होती है। इस प्रकार, चूंकि अवैध धनार्जन की प्रक्रिया में व्यवस्था से जुड़े सभी वर्ग का प्रतिनिधित्व होता है, अतः क्रोनिज्म के कारण किसी भी सरकारी एसआईटी अथवा कानून बनाकर इस समस्या का समाधान तलाशने की उम्मीद बेमानी है। करेंसी के डिमोनेटाइजेशन (विमुद्रीकरण) से जाली नोटों की समस्या पर तो लगाम लगने की उम्मीद की जा सकती है लेकिन कालेधन की समस्या का पूर्णतः समाधान हो जाएगा यह मान लेना सही नहीं होगा। देश ने कुछ वर्ष पूर्व इसके प्रमाण को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव भी किया है।  

अब बारी आती है समस्या के कारण और समाधान की। चूंकि समस्या का सबसे बड़ा कारण आयकर की दर का बहुत अधिक होना और सरकारी कर्मियों को अपनी आय को बढ़ाने की छूट न होना है, इसलिए इसका समाधान आयकर की दर को अत्यंत कम करना या बिल्कुल समाप्त कर देना और लोगों को सरकारी नौकरी के इतर कार्य करने की अनुमति देना है। अब सवाल उठता है कि यदि आयकर को न्यूनतम स्तर पर लाया जाए या बिल्कुल समाप्त कर दिया जाए तो देश का खर्च कैसे चले और सरकारी कर्मचारियों को अपने पेश के प्रति ईमानदार कैसे रखा जाए। इसका भी एक आसान समाधान है। दुनिया के कई ऐसे देश हैं जिन्होंने अनेकों कर लगाने की बजाए बीटीटी यानि की बैंक ट्रांजैक्शन टैक्स लगाने का विकल्प आजमाया है। बीटीटी का मतबल बैंक से की जाने वाले लेन देन की प्रक्रिया के दौरान ही कर लगाना है। साथ ही देश में 100 रूपए से उपर के मूल्य के नोट छापने बंद कर दिए जाए। इससे बड़ी धनराशि (अघोषित) का लेनदेन करने वालों को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा और उन्हें बैंक का सहारा लेना पड़ेगा। छोटी धनराशि (अघोषित) के बाजार में घूमते रहने से भी अर्थव्यवस्था को लाभ ही होगा। इसी प्रकार, सरकारी कर्मचारियों की निष्ठा को टेक्नोलॉजी के प्रयोग जैसे कि कक्षा व अस्पतालों में सीसीटीवी कैमरे व बायोमैट्रिक हाजिरी लगाकर सुनिश्चित की जा सकती है। इसके अतिरिक्त लापरवाही की स्थिति में कड़ी व तात्काल की जाने वाली कार्रवाई भी कारगर साबित होती है। यह भी ध्यान रहे कि निजी क्षेत्र के अध्यापकों और चिकित्सकों पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं होती फिर भी बाजार स्वयं उन्हें कार्य में लापरवाही बरतने की छूट नहीं देता। अध्यापक व चिकित्सक चाहें तो अपने बचे समय में से कुछ समय निकालकर प्रैक्टिस कर सकते हैं।

गैर आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर (दो लाख करोड़ रुपये) की धनराशि देश के बाहर के बैंकों में जमा है, जिस पर सरकार को कोई कर प्राप्त नहीं होता। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान तमाम राजनैतिक दलों व संगठनों द्वारा यह मुद्दा उठाया गया था कि यदि सारा काला धन देश में आ जाए तो कौन कौन से चमात्कारिक कार्य हो सकते हैं। उदाहरण के लिए देश भर में पक्की सड़क, सबको अत्यंत कम दर पर बिजली, स्वच्छ पेयजल, स्कूल, अस्पताल, सस्ता पेट्रोल-डीजल, भारतीय रुपए के मूल्य का अमेरिकी डॉलर के बराबर हो जाना इत्यादि इत्यादि। लेकिन सरकार अथवा राजनैतिक दल इस बात पर विचार नहीं करते कि ऐसा तब भी हो सकता है जबकि सरकार की बजाए ये पैसा उसे जमा करने वाले लोग स्वयं ही देश में लेकर आ जाएं और अर्थव्यवस्था में निवेश कर दें। सोचिए, यदि उक्त सारा पैसा बाजार में निवेश किया जाए तो निवेशक किन किन क्षेत्रों में होगा। सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाले क्षेत्रों जैसे कि टोल युक्त हाइवे, गुणवत्ता युक्त स्कूल, अच्छे अस्पताल, परिवहन, रियल स्टेट इन्हीं क्षेत्रों में होगा। इसके अतिरिक्त इस विशाल धनराशि पर न्यूनतम कर आरोपित कर सरकार आसानी से देश की जनता को एंटी कोरोना वायरस उपलब्ध कराने लायक धन बटोर पाएगी। इससे वह काला धन जो अनुपयोगी तरीके से देश के बाहर पड़ा हुआ है (ध्यान रहे कि जमाकर्ता को भी उसका लाभ नहीं मिल रहा) वह देश के विकास में ही प्रयुक्त हो सकेगा। इससे पहले से ही हांफ रही अर्थव्यवस्था को कुछ राहत अवश्य मिलने की उम्मीद सकेगी और रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। सोचिए, क्या विदेशी निवेशकों को निवेश के लिए आकर्षित करने के लिए उन्हें प्रदान की जाने वाली सुविधाएं और मनचाही रियायतें नहीं दी जाती, फिर अपने देश के धन पर यदि कर ना लेने या कम कर लेने और जमाकर्ता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई ना करने का आश्वासन क्यों नहीं दिया जा सकता? हमें समझना होगा कि देश के भीतर या बाहर बेकार पड़े धन को अर्थव्यवस्था में वापस लाने का इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा।

- अविनाश चंद्र (लेखक आजादी.मी के संपादक हैं)
फोटो साभारः zeebiz.com