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जनपथ का मतलब है- लोगों के लिए बना रास्ता। ये राजपथ नहीं। लेकिन जनपथ पर क्या लोगों को चलने, फिरने, कमाने, घूमने, बेचने के लिए प्रताड़ित होना पड़ेगा? दिल्ली शहर के जनपथ इलाके में पर कई औरतें रेहड़ी-पटरी का काम करके अपनी आजीविका कमाती है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ने में उनके काम-काज और कमाई को समझने के लिए मार्च 2021 में एक अध्ययन किया। औरतों ने बताया कि प्रशासन और पुलिस अक्सर ही उनका सामान जब्त कर लेती है- यह एक आम बात है और जब्त किए गए सामान को वापस पाने के लिए उन्हें पैसे देने पड़ते हैं।

जनपथ और जीविका

Nov, 03 2021 by Prashant लेखक: जनपथ का मतलब है- लोगों के लिए बना रास्ता। ये राजपथ नहीं। लेकिन जनपथ पर क्या लोगों को चलने, फिरने, कमाने, घूमने, बेचने के लिए प्रताड़ित होना पड़ेगा? दिल्ली शहर के जनपथ इलाके में पर कई औरतें रेहड़ी-पटरी का काम करके अपनी आजीविका कमाती है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ने में उनके काम-काज और कमाई को समझने के लिए मार्च 2021 में एक अध्ययन किया। औरतों ने बताया कि प्रशासन और पुलिस अक्सर ही उनका सामान जब्त कर लेती है- यह एक आम बात है और जब्त किए गए सामान को वापस पाने के लिए उन्हें पैसे देने पड़ते हैं।
गांधी जी ग्राम स्वराज के प्रवल समर्थक थे। उनका मानना था कि स्वतंत्र गांधी भारत की राजनैतिक व्यवस्था की नींव ग्रामीण गणतंत्र पर आधारित होनी चाहिए। हालांकि उनके समकालीन कई अन्य विचारक इस अवधारणा को गांधी जी की प्राचीन भारतीय गांव के प्रति रुमानियत या एक ऐसी काल्पनिक छवि के रूप में देखते थे जिसे उन्होंने भारतीयों में उच्च नैतिक जीवन के प्रति मार्गदर्शन करने के लिए गढ़ा था। भारत के इतिहास को देखने पर ज्ञात होता है कि स्वशासित गांव वास्तव में अस्तित्व में थे। उनका राजनैतिक संगठन अद्वितीय था और उनकी प्रकृति लोकतांत्रिक थी। हां, उनके तौरतरीके अलग-अलग अवश्य थे। इस संदर्भ में उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों की कमी के कारण इस वात का ठीकठीक आकलन करना कठिन है कि भारत में ग्राम्य शासन की यह लोकतांत्रिक व्यवस्था कितनी प्रचलित थी। किंतु अनुमान लगाया जा सकता है कि इस महाद्वीप के अधिकांश लोगों को इस प्रणाली की जानकारी अवश्य होगी। भारत में उच्च स्तर की विशेषज्ञता वाली वस्तुओं का उत्पादन होता था और इसके भीतरी और साथ ही साथ वाहरी दुनिया के साथ गहरे व्यापारिक नेटवर्क थे। संचार के इन माध्यमों के द्वारा शासन की इस प्रणाली की सूचना भी अवश्य प्रसारित हुई होगी। जो भी हो, इन ग्रामीण गणतंत्रों का अस्तित्व में होना यह बताता है कि यह गांधी की महज रुमानियत या कल्पनाशीलता नहीं थी।

काल्पनिक नहीं, हकीकत थी गांधी के ग्रामीण गणतंत्र की अवधारणा

Oct, 08 2021 by Parth लेखक: गांधी जी ग्राम स्वराज के प्रवल समर्थक थे। उनका मानना था कि स्वतंत्र गांधी भारत की राजनैतिक व्यवस्था की नींव ग्रामीण गणतंत्र पर आधारित होनी चाहिए। हालांकि उनके समकालीन कई अन्य विचारक इस अवधारणा को गांधी जी की प्राचीन भारतीय गांव के प्रति रुमानियत या एक ऐसी काल्पनिक छवि के रूप में देखते थे जिसे उन्होंने भारतीयों में उच्च नैतिक जीवन के प्रति मार्गदर्शन करने के लिए गढ़ा था। भारत के इतिहास को देखने पर ज्ञात होता है कि स्वशासित गांव वास्तव में अस्तित्व में थे। उनका राजनैतिक संगठन अद्वितीय था और उनकी प्रकृति लोकतांत्रिक थी। हां, उनके तौरतरीके अलग-अलग अवश्य थे। इस संदर्भ में उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों की कमी के कारण इस वात का ठीकठीक आकलन करना कठिन है कि भारत में ग्राम्य शासन की यह लोकतांत्रिक व्यवस्था कितनी प्रचलित थी। किंतु अनुमान लगाया जा सकता है कि इस महाद्वीप के अधिकांश लोगों को इस प्रणाली की जानकारी अवश्य होगी। भारत में उच्च स्तर की विशेषज्ञता वाली वस्तुओं का उत्पादन होता था और इसके भीतरी और साथ ही साथ वाहरी दुनिया के साथ गहरे व्यापारिक नेटवर्क थे। संचार के इन माध्यमों के द्वारा शासन की इस प्रणाली की सूचना भी अवश्य प्रसारित हुई होगी। जो भी हो, इन ग्रामीण गणतंत्रों का अस्तित्व में होना यह बताता है कि यह गांधी की महज रुमानियत या कल्पनाशीलता नहीं थी।

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