क्या पास परसेंटेज और लर्निंग आउटकम में कोई संबंध है!

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हाल ही में बिहार राज्य शिक्षा बोर्ड द्वारा वर्ष 2020-21 के 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं के परिणाम जारी किये गए हैं। 10वीं की परीक्षा में जहां 78.17 प्रतिशत छात्र उत्तीर्ण हुए वहीं 12वी में भी लगभग बराबर 78.04 प्रतिशत छात्र उत्तीर्ण हुए। पिछले वर्ष यानी 2019-20 में भी क्रमशः 80.5 प्रतिशत और 80.7 प्रतिशत छात्र उत्तीर्ण हुए थे। इस प्रकार देखा जाए तो बोर्ड परीक्षा के परिणाम काफी उत्साहजनक है। उत्साहजनक इसलिए क्योंकि इस वर्ष पूरे सत्र के दौरान स्कूल बंद रहें और कक्षाएं संचालित नहीं हुई। बावजूद इसके यदि परीक्षा परिणाम गत वर्ष के परिणाम के लगभग बराबर है तो यह तारीफ के काबिल ही है।

हालांकि एक ट्रेंड पिछले एक दशक के दौरान लगातार देखने को मिला है। और यह ट्रेंड है परीक्षा के परिणाम और छात्रों के सीखने के परिणाम में विरोधाभास का। यदि हम पिछले एक दशक के सीबीएसई व राज्य परीक्षा बोर्डों के कुल पास प्रतिशत को देखें 80 से 90 प्रतिशत छात्र उत्तीर्ण हो रहे हैं। राज्य परीक्षा बोर्ड में 65 व 70 प्रतिशत अंक लाने वालों और सीबीएसई की परीक्षा में 85 व 90 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।

उधर, एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन (असर) रिपोर्ट के आंकड़े ये बताते हैं कि देश में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता अत्यंत बुरे दौर में है। सरकारी स्कूलों के आठवीं के छात्र जहां पांचवी कक्षा की पाठ्य पुस्तकों को नहीं पढ़ पाते वहीं, तीसरी कक्षा के स्तर के साधारण दो अंकों के गुणा और भाग को हल करने में सक्षम नहीं हैं। 2017 का ‘असर’ सर्वेक्षण 14 से 18 साल के युवक-युवतियों पर केन्द्रित था। सर्वे के दौरान पढ़ पाने और बुनियादी गणित करने की उनकी क्षमता को जांचने के अलावा, रोज़मर्रा से जुड़े हुए कई सवाल उनसे पूछे गए। उदाहरण के लिए, अगर 300 रुपए की कमीज पर 15% की छूट मिलती है, तो कमीज़ की कीमत क्या होगी? 15 लीटर पानी को साफ करने में अगर क्लोरीन के तीन टैबलेट लगते हैं, तो 45 लीटर पानी की सफाई में कितने टैबलेट लगेंगे?

जीवन रक्षक घोल के पैकेट पर लिखे गए निर्देश को पढ़कर सही तरीके से घोल कैसे बनाएंगे? सिर्फ़ 50 प्रतिशत प्रतिभागी ही इन गतिविधियों को सही-सही कर पाए! एक तरफ परीक्षा के अंक और आंकड़े, दूसरी तरफ जीवन के ज़रूरी कौशल। क्या इन दोनों को जोड़ने की ज़िम्मेदारी हमारी शिक्षा व्यवस्था की नहीं है?

स्कूली छात्रों के मूल्यांकन के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट्स असेसमेंट (पीसा) में भारत ने वर्ष 2009 में हिस्सा लिया। भारत की रैंकिंग 73 देशों की सूची में 72वें स्थान पर थी। परिणास से शर्मसार देश ने उसके बाद से इस टेस्ट में हिस्सा लेना बंद कर दिया।   

कुल मिलाकर प्रश्न इतना भर ही है कि क्या देश में स्कूलों में होने वाली पढ़ाई और परीक्षा का कोई संबंध है? कहा जाता है कि बिहार में ज्यादातर छात्र परीक्षा की तैयारी ट्यूशन या कोचिंग क्लास में करते हैं। शायद इसीलिए स्कूल बंद रहने का उतना असर रिजल्ट पर नहीं पड़ा।

- आजादी.मी

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स्वाति राव
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ऊपर व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और ये आवश्यक रूप से आजादी.मी के विचारों को परिलक्षित नहीं करते हैं।

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