कोरोना काल में स्कूलों के भविष्य को लेकर निसा के जनरल सेक्रेटरी एस मधुसूदन से खास बातचीत

कोविड 19 संक्रमण के प्रसार को रोकने के उद्देश्य से वर्ष 2020 के शुरुआती महीनों में देश राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लागू किया गया। लॉकडाउन के दौरान अपरिहार्य कार्यों और सेवाओं को छोड़ सभी प्रकार की गतिविधियों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया। लगभग दो महीने तक जारी रहे टोटल लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से धीरे समाप्त किया जाने लगा और छह माह के भीतर कुछ सावधानियों और सुरक्षा उपायों के साथ देश चरणबद्ध तरीके से अनलॉक हो गया। हालांकि कोविड 19 संक्रमण के प्रसार के कारण लागू किया गया लॉकडाउन स्कूलों पर जारी रहा। हाल ही में कुछ राज्यों द्वारा 10वीं और 12वीं की कक्षाओं को कुछ सीमाओं के साथ अनलॉक करने का फैसला लिया गया है लेकिन प्राथमिक कक्षाओं वाले स्कूलों को खोलने पर अबतक फैसला नहीं लिया जा सका है। स्कूलों के बंद रहने से छात्रों, शिक्षकों, स्कूल कर्मचारियों और स्वयं स्कूलों पर क्या दुष्प्रभाव पड़ा है जानते हैं बजट स्कूलों के अखिल भारतीय संगठन नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (निसा) के वाइस प्रेसिडेंट और तेलंगना रिकगनाइज्ड स्कूल्स मैनेजमेंट एसोसियेशन के स्टेट जनरल सेक्रेटरी एस. मधुसूदन से..

प्रश्नः एजुकेशन सेक्टर अबतक अनलॉक प्रॉसेस से बाहर है। इससे छात्रों और स्कूली सिस्टम पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ रहा है? इस सेक्टर के भविष्य को आप कैसे देखते हैं?
उत्तरः 
एजुकेशन सेक्टर को अबतक अनलॉक की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। हमारा मानना है कि एजुकेशन सेक्टर सरकार की प्रयॉरिटी लिस्ट में ही नहीं है। यदि यह सेक्टर सरकार की प्रयॉरिटी में होता तो इसे कब का अनलॉक कर दिया गया होता। सरकार चाहती तो अन्य सेक्टर्स की भांति सुरक्षा के पर्याप्त उपायों के साथ स्कूलों को खोलने की अनुमति दे दी गई होती। अभिभावक भी अपने बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं इसलिए वो बच्चों को स्कूल भेजने से हिचक रहे हैं। लेकिन न तो यह पहली महामारी है और न ही आखिरी। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वे लोगों को ऐसी चुनौतियों का सामना करने और स्वच्छता और संक्रमण से बचाव के तौर तरीकों को अपनाने के प्रति जागरुक करे। इंडियन मेडिकल एसोसियेशन और इंटरनेशनल मेडिकल एसोसिएशन भी कहता है कि 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को इस संक्रमण से अधिक खतरा नहीं है।

प्रश्नः कई देशों का उदाहरण सामने है कि जब वहां स्कूलों को खोला गया वहां कोविड संक्रमण के प्रसार दर में तेजी देखी गई है। स्कूलों के खुलने पर ऐसी परिस्थिति हमारे देश में सामने न आए इसके लिए आप लोगों की क्या प्लानिंग है?
उत्तरः
 संक्रमण का प्रसार हुआ लेकिन इससे जान का कोई नुकसान नहीं हुआ। लेकिन जहां तक संक्रमण के प्रसार को रोकने की बात है, हम सभी सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई गाइडलाइंस का पूरी शिद्दत से पालन करेंगे। सरकार चाहे तो हम क्लास रूम की कुल क्षमता के बीस या तीस प्रतिशत बच्चों को एक दिन या दो दिन छोड़कर बुला सकते हैं। ब्लेंडेड टीचिंग मेथड यानी ऑनलाइन के साथ ऑफलाइन क्लासेस चलाने की भी हमारी योजना है ताकि यदि कोई बच्चा 100 प्रतिशत स्वस्थ नहीं है तो वह घर से ही क्लास कर ले।

प्रश्नः लॉकडाउन के कारण बजट स्कूलों के सामने किस प्रकार की चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं?
उत्तरः
 पिछले वर्ष मार्च में जब लॉकडाउन लगाया गया तबतक अधिकांश स्कूलों में वार्षिक परीक्षाएं नहीं हुई थी। अब बजट प्राइवेट स्कूलों के साथ दिक्कत ये होती है कि इसमें पढ़ने वाले छात्रों की फीस नियमित तौर पर नहीं प्राप्त होती हैं। लगभग 50 फीसदी बच्चों की फीस का कुछ हिस्सा लास्ट क्वार्टर में जब परीक्षाएं होने को होती हैं या रिजल्ट लेकर अगली कक्षा में जाने की बारी आती है तब मिलता है जबकि बाकी अगले सेशन में जमा कराने का आश्वासन मिलता है। ऐसा हमेशा होता है और औसतन 80 से 85 प्रतिशत फीस ही हमें सामान्य वर्ष में प्राप्त हो पाता है। अब लॉकडाउन लग जाने के कारण हमें पिछले वर्ष का फीस हमें अबतक नहीं मिला। इस साल ऑनलाइन क्लास चलने के बाद भी पूरे देश के बजट स्कूलों को कुल फीस का औसतन 20 प्रतिशत ही मिल सका है। जबकि हमारा खर्च पहले की तरह ही जारी है। तमाम स्कूल कर्ज में डूब गए हैं और उनके पास खाने तक के पैसे भी नहीं बचे हैं।  खर्च के लिए पैसों का बंदोबस्त न होने पर हमारे शिक्षक छोड़ कर जा रहे हैं। कई स्कूल संचालकों की हृदयाघात से मृत्यु हो गई और कुछ ने आत्महत्या कर ली।

प्रश्नः इस समस्या का समाधान क्या है क्योंकि जनता की आय पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है और वे भी पूरी फीस चुकाने में समर्थ नहीं हैं?
उत्तरः
 हमें भी इस बात का अंदाजा है इसलिए हमारी मांग है कि बजट स्कूलों को विपत्ति की इस घड़ी से निकालने के लिए सरकार बैंकों को हमें ब्याज रहित ऋण देने के लिए आदेश दे। हम अन्य सेक्टर्स की तरह सरकार से अपने लिए सहायता राशि की मांग नहीं कर रहे बल्कि ऋण की व्यवस्था करने को कह रहे हैं। सरकार हमें एक वर्ष के लिए इस ऋण की ईएमआई पर मोरेटोरियम प्रदान करे ताकि हम फिर से सर्वाइव करने की स्थिति में आ जाएं। इसके अलावा हमारी मांग हैै कि छात्रों को कोविड के दुष्प्रभावों से निकालने और उनके भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए सरकार सभी छात्रों को उनकी फीस वाऊचर के रूप में प्रदान करे। 

प्रश्नः मान लें की सरकार आपकी बात सुन ले तो रिकगनाइज्ड स्कूलों को लोन फिर भी मिल जाएगा। लेकिन बड़ी तादात में जो अनरिकगनाइज्ड स्कूल्स हैं उनका क्या? उन्हें तो लोन भी नहीं मिलेगा!
उत्तरः
 देखिए हमारी मांग ही यही है। जो स्कूल बैंकों को लोन के अगेंस्ट सिक्युरिटी प्रदान कर देंते हैं तो बैंक उन्हें लोन दे देते हैं लेकिन जो स्कूल सिक्युरिटी नहीं दे पाते हैं उन्हें लोन नहीं मिल पाता है। इसलिए हमारी मांग है कि सरकार स्कूल संचालकों को पैन के अगेंस्ट लोन दे। लोन की राशि स्कूलों में पढ़ने वाले कुल छात्रों की संख्या और उनसे प्राप्त होने वाले कुल वार्षिक शुल्क की राशि के कम से कम आधे के बराबर हो। ऐसा न होने पर बड़ी तादात में स्कूल बंद होंगे जिससे वहां पढ़ने वाले बच्चों भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।

लेखक के बारे में

अविनाश चंद्र

अविनाश चंद्र वरिष्ठ पत्रकार हैं और सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के सीनियर फेलो हैं। वे पब्लिक पॉलिसी मामलों के विशेषज्ञ हैं और उदारवादी वेब पोर्टल आजादी.मी के संयोजक हैं।

डिस्क्लेमर:

ऊपर व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और ये आवश्यक रूप से आजादी.मी के विचारों को परिलक्षित नहीं करते हैं।

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