विशेष लेख

दुनिया जबकि साम्यवाद के पतन की 20वीं वर्षगांठ मना रही है, कई विश्लेषकों को याद होगा कि कैसे सोवियत नीतियों की नाकामी ने सरकार को उत्पादन पर ज्यादा अधिकार दे दिया था और साम्राज्यवादी जाल की संज्ञा देकर कैसे विदेश व्यापार और निवेश को हतोत्साहित किया जाता था। भारत जैसे विकासशील देशों ने भी ऐसी ही नीतियों को अपनाया था, जो

Published on 14 Jan 2010 - 13:25

अपनी स्थापना के समय से ही पाकिस्तान एक संवैधानिक संकट से गुजर रहा है और गहरी जड़ों में समाई अन्य समस्याओं की तरह ही इससे निजात पाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। फिर भी, पाकिस्तान को आज़ादी और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ने के लिए इस संकट से हर हाल में

Published on 31 Dec 2009 - 12:50

बारह दिनों तक जलवायु परिवर्तन पर चले कोपनेहेगन सम्मेलन में अंतिम दिन अमेरिका ने चार उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ एक समझौते को दिया अंजाम. अमेरिका समझौते को भविष्य के लिए अहम कदम मान रहा जबकि कई देश कर रहे आलोचना.

Published on 23 Dec 2009 - 15:31

एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

हर रोज और घंटे दर घंटे

Published on 21 Dec 2009 - 15:23

अब जबकि क्लाइमेट गेट ने जलवायु परिवर्तन के मूल को लेकर चर्चा में तेजी ला दी है। यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि आखिर विज्ञान क्या है? यहां कोपेनहेगन में मौजूद नीति निर्धारकों के लिए कुछ विचार पेश हैं।

विज्ञान आलोचना के जरिए ज्ञान हासिल करने की एक प्रक्रिया है। सिद्धांत पेश किए जाते

Published on 18 Dec 2009 - 12:56

हिमालय की बर्फ का पिघलना, समुद्र के जलस्तर का बढ़ना और पृथ्वी के तापमान में वृद्धि ग्लोबल वार्मिंग की भयावहता की ओर ही इशारा करते हैं। यही नहीं, बाढ, सूखे, बीमारी, कुपोषण और अकाल सरीखे खतरे भी हमारे सिर पर मंडरा रहे है.

Pages