वामपंथी नही रोक पाये ममता का विजय रथ

पिछले हफ्ते आए चुनाव नतीजों में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन को 294 सदस्यों वाली विधानसभा में 226 सीटें हासिल हुईं और इस जीत के साथ ही 34 साल से चला आ रहा लेफ्ट का शासन खत्म हो गया। वामपंथी दलों ने अपनी हार स्वीकार करते हुए विपक्ष की सकारात्मक भूमिका निभाने की बात कही तो वहीं ममता ने इसे लोकतंत्र और बंगाल की जनता की जीत बताया है.

पश्चिम बंगाल में बदलाव के लिए अब तक चले संघर्ष में शहीद हुए कार्यकर्ताओं को यह जीत समर्पित करते ममता ने विश्व कवि रवींद्रनाथ टैगोर को याद किया और कहा कि यह जीत मां, माटी और मानुष की है।

वाममोर्चे को पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद पहली बार विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है. इसके संकेत पिछली लोकसभा चुनाव के समय मिल गए थे जब वामदलों को कई अहम सीटों पर क़रारी हार का सामना करना पड़ा था. पंचायत और नगरपालिका चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया था कि विधानसभा चुनाव में ममता की रेल को वामपंथी रोक नहीं पायेंगे. माकपा का उच्च नेतृत्व इसे दबी जुबान स्वीकार भी कर रहा था.

ममता की जीत के जरिए पश्चिम बंगाल की जनता ने जता दिया है कि जो उनके सपनों को समझ नहीं सकेगा और उन्हें हकीकत में नहीं बदलेगा, उसे सत्ता से हटना ही होगा. इस बात को वामपंथियों ने समझने में चूक की और वो जनता की नब्ज़ नहीं पकड़ पाये. विकास की दौड़ मे बंगाल विगत कुछ वर्षो मे भारत के दूसरे हिस्सो से बहुत पीछे रह गया और इस बात का खामियाज़ा वामपंथी दलो को वाजिब तौर पर उठाना पड़ा. सत्ता के 34 साल के इस सफर में जब नई पीढ़ी, खास तौर पर मध्यम वर्ग, युवा तथा सम्पन्न वर्ग सामने आया, तो वह उन की नीतियों से सहमत नहीं था. यह वर्ग क्रांति नहीं रोजगारपरक औद्योगिक विकास चाहते हैं तथा बेकारी और गरीबी के चलते उनमें जबर्दस्त अकुलाहट थी. देखा जाये तो ये ममता की जीत कम और लेफ्ट के खिलाफ जनता का गुस्सा ज्यादा दर्शाता है। खासकर पिछले दस साल में बुद्धदेव सरकार की नीतियों के खिलाफ जनता ने इस चुनाव वोट डाले।

हालांकि वाममोर्चे की हार केरल में भी हुई है लेकिन वहां हर पांच साल बाद सत्ता परिवर्तन हो ही जाता है। इस कड़ी में बंगाल में वाममोर्चा सरकार का पतन एक ऐतिहासिक घटना है। 1977 में, इमरजेंसी की प्रतिक्रिया के रूप में, लाल झंडे की सरकार बनी। तब से लगातार 34 साल तक वामपंथ ने सत्ता का सुख भोगा। इस बार उन्होंने अपना यह रिकार्ड खुद ही तोड़ दिया है और रसातल की राह मे चलते दिख रहे हैं.

- स्निग्धा द्विवेदी