ड्रोन की ऊंची उड़ान के लिए कैसे बनाएं एक साफ आसमान

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हारिस अमजद – 12 मई, 2021

ड्रोन भविष्य के सुरक्षित और कारगर परिवहन माध्यमों में सबसे अहम माध्यम के तौर पर उभरे हैं। भारत सरकार ने ड्रोन संचालनों की भरपूर क्षमता को पहचानते हुए 2018 से ही इसके लिए कानूनी संरचना का कार्यान्वयन करना शुरू कर दिया था। इससे भारत में कई उद्देश्यों के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कानूनी रूप से वैध हो गया है। हालांकि यह उद्योग इस समय अपने शुरुआती दौर में है और अपनी प्रकृति के हिसाब से यह उद्योग तकनीक के विकास के साथ तेजी से बदल रहा है।

ड्रोन के कामकाज और उत्पादन में तेजी आने के साथ नीति और कानूनी संरचना से नदारद कई चीजों का पता चला है और इसलिए नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने जून 2020 में नया मानवरहित विमान प्रणाली नियम, 2020 का मसौदा (यूएएस नियम मसौदा) पेश किया। सवाल यह उठता है कि क्या इन विनियमनों से ड्रोन के उत्पादन की प्रक्रिया, इस्तेमाल में मदद मिलती है या यह इसमें अड़चन लगाते हैं।

यह यूएएस नियम निश्चित रूप से ड्रोन संबंधी विनियमनों के लिहाज से काफी अहम हैं क्योंकि वे न केवल भारत की सीमा में काम करने वाले सभी मानवरहित विमान पर लागू होते हैं बल्कि भारत में पंजीकृत सभा मानवरहित विमान प्रणाली पर भी लागू होते हैं। नये नियमों ने दूरस्थ रूप से उड़ायी जाने वाली विमान प्रणाली (आरपीएएस) और मॉडल आरपीएएस तक सीमित वर्गीकरण का विस्तार कर उसमें एक नयी श्रेणी – स्वायत्त मानवरहित विमान प्रणाली को शामिल किया। इन्हें वजन के आधार पर पांच श्रेणियों में बांटा जाता है:

  • नैनो: 250 ग्राम के बराबर या उससे कम

  • माइक्रो: 250 ग्राम से दो किलो के बीच

  • छोटे: दो किलो से 25 किलो

  • मध्यम: 25 किलो से 150 किलो

  • बड़े: 150 किलो से ज्यादा

नैनो को छोड़कर सभी श्रेणियों के ड्रोन के लिए पंजीकरण कराना ज़रूरी है। प्राधिकार के क्षेत्र में नये नियम पूर्ववर्ती नियमों से काफी अलग हैं। ड्रोन व्यवस्था से जुड़े सभी लोगों (विनिर्माता, आयातक, व्यवसायी, मालिक या संचालक) को मंजूरी लेनी पड़ती है जिसके लिए सरकार के डिजिटलस्काई मंच के जरिए आवेदन दिया जा सकता है। मंजूरी मिलने के बाद व्यक्ति को एक विशिष्ट प्राधिकार संख्या मिलेगी जो पांच साल तक वैध रहेगी अगर उसे रद्द या निलंबित न किया जाए। गौर करने वाली बात यह है कि प्राधिकार किसी भारतीय नागरिक या किसी ऐसी संस्था को ही मिल सकता है जिसकी हिस्सेदारी का बहुमत भारतीय नागरिकों के पास है। इससे भारतीय बाजार में विदेशी कंपनियों के हिस्सा लेने पर रोक लगती है।

साथ ही मानवरहित विमान प्रणाली के विनिर्माता को नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) द्वारा तय डिजाइन से जुड़े निश्चित मानकों का पालन करना होता है जैसे कि जीपीएस, रिटर्न टू होम, एंटी कोलिजन लाइट, आईडी प्लेट, फ्लाइड डेटा लॉगिंग क्षमता से लैस फ्लाइट कंट्रोलर और नो परमिशन नो टेक-ऑफ (एनपीएनटी)। एनपीएनटी एक ऐसी प्रणाली है जो डिजिटलस्काई मंच के अधीन है जिसके लिए ड्रोन के पायलट को उड़ान भरने से पहले हर बार मंजूरी लेने का अनुरोध करना पड़ता है। इसके बिना ड्रोन उड़ान नहीं भर सकता।

मानवरहित विमान प्रणाली की तीसरी श्रेणी यानी स्वायत्त मानवरहित विमान प्रणाली को शामिल किया जाना एक बेहद सराहनीय और दूरदर्शी कदम है। इससे पहले से तय मार्ग पर उड़ने वाली और दृश्य शक्ति सीमा से परे (बीवीएलएस) उड़ने वाली ड्रोन प्रणालियों को डीजीसीए से अवधारणा के प्रमाण की मंजूरी लेनी होगी। इस कदम से मानवरहित विमान प्रणाली आधारित व्यावसायिक गतिविधियों को काफी बढ़ावा मिलेगा और ड्रोन का संचालन बढ़ेगा। इन नियमों के तहत केंद्र सरकार के पास मानवरहित विमान प्रणाली के संचालनों की सुविधा के लिए भारतीय वायु क्षेत्र में मानवरहित विमान यातायात प्रबंधन प्रणाली (यूटीएम) स्थापित करने का अधिकार है। यह सरकार को एक ड्रोन कॉरिडोर या ड्रोन गलियारा बनाने का भी अधिकार देता है जो मानवरहित विमान प्रणालियों के संचालन के लिए एक अलग वायुक्षेत्र है। हालांकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो ड्रोन कॉरिडोर स्थापित करने के लिए जरूरी शर्तें तय करता हो।

मानवरहित विमान प्रणाली नियम, 2020 के मसौदे में तय किए गए किसी भी नियम का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है। इन दंडों में दोषी पाए जाने पर प्राधिकार का निलंबन और अपराध की गंभीरता को देखते हुए दो साल तक की अधिकतम कैद या अधिकतम एक लाख रुपए तक का वित्तीय जुर्माना शामिल हैं।

जहां ये नये नियम मानवरहित विमान प्रणालियों के संचालन की गुंजाइश को काफी बढ़ाते हैं और दूरदर्शी सोच को साफ करते हैं, वे अब भी कुछ अहम सवालों और चिंताओं पर ध्यान नहीं देते। इन नियमों में निजता और डेटा संग्रह (लोगों या सरकार द्वारा) से जुड़ी चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया गया है और साथ ही इस तरह के मुद्दों के निपटान के लिए किसी संरचना की भी स्थापना नहीं की गयी है।

इन नियमों में ‘अवयवों’ की परिभाषा तय नहीं की गयी है जिसमें मानवरहित विमान प्रणाली के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों तत्व आ सकते हैं। ऐसी स्थिति में जब घरेलू उद्योग हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों के लिए ज्यादातर दूसरे देशों पर निर्भर है, विदेशी कंपनियों पर रोक का इस नवजात उद्योग के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। जैसा कि पहले भी बताया गया है, ड्रोन के विनिर्माण के लिए जरूरी मंजूरी केवल कोई भारतीय नागरिक या वह संगठन ले सकता है जिसकी हिस्सेदारी का बहुमत भारतीय नागरिकों के पास है, इससे विदेशी उद्योग के कप्तानों को भारतीय ड्रोन उद्योग में माकूल जगह बनाने का मौका नहीं मिलता क्योंकि नीति भारतीय विनिर्माताओं के पक्ष में हल्की झुकी हुई है। जहां इस तरह के संरक्षणवादी कदम से भारतीय विनिर्माताओं की क्षमता को बढ़ाने में मदद मिल सकती है, इससे इस क्षेत्र में तकनीकी विकास धीमा पड़ सकता है क्योंकि भारतीय उद्योग न केवल ड्रोन के हिस्सों के लिए बल्कि अनुसंधान और विकास के लिए भी काफी हद तक आयात पर निर्भर है। इसके अलावा इन कानूनों के तहत कल पुर्जे और अंतिम ड्रोन दोनों के लिए कई तरह के प्रमाणन की जरूरत है। ड्रोन के उत्पादन के लिए जरूरी कुछ हिस्से (जैसे कि प्रोपेलर, बैट्री, मोटर/रोटर आदि) का दूसरे उद्योगों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है और इसलिए यह साफ नहीं है कि क्या मानवरहित विमान प्रणाली से जुड़े नियम उनपर भी लागू होंगे। ऐसा लगता है कि प्रस्तावित नयी नीति कुछ अहम पहलुओं को लेकर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है।

भारतीय वायु क्षेत्र को और “ड्रोन अनुकूल” बनाते समय बाजार के अति विनियमन से बचना जरूरी है क्योंकि यह हितधारकों के लिए आसानी से ड्रोन का उत्पादन और संचालन करना मुश्किल करता है।

 

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हारिस अमजद
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