यदि आतंकवाद का सहारा लेने वाले साधु-संतों का तर्क यह है कि उनका आतंकवाद सिर्फ जवाबी आतंकवाद है, तो मैं कहूंगा कि यह तर्क बहुत बोदा है। आप जवाब किसे दे रहे हैं? बेकसूर मुसलमानों को? आपको जवाब देना है तो उन कसूरवार मुसलमान आतंकवादियों को दीजिए, जो बेकसूर हिंदुओं को मारने पर आमादा हैं। आतंकवाद कोई करे, किधर से भी करे, मरने वाले सब लोग बेकसूर होते हैं।

कोलकाता की अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय के भीतर का नजारा देखकर अंदाजा हो जाता है कि आखिर क्यों यह पार्टी ममता बनर्जी के ‘परिबोर्तन’ यानी बदलाव के नारे के आगे असहाय हो गयी। कुछ समय पहले कोलकाता में एक यात्रा के दौरान मेरे अनुभव बहुत रोचक हैं. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के इंतजार में बैठने से पहले हमें कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। बड़े से कमरे में हलकी रोशनी है, जिसमें रखी कुरसी पर बैठकर आप अपने स्कूल के परीक्षा वाले दिनों में खो जाते हैं। आसपास का दृश्य अतियथार्थवाद की बुनावट-सा लगता है। दीवार पर करीने से गुजरे जमाने के कम्युनिस्ट दिग्गजों की तसवीरें लगी हैं। वहां सभी हैं- कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, हो ची मिन्ह। उनके साथ राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के कम्युनिस्ट नेताओं और क्रांतिकारियों की तसवीरें भी लगी हैं। मगर एक मुश्किल यह है कि इन सभी नेताओं के नाम चीनी लिपि में लिखे हैं, जिन्हें पहचान पाना मुश्किल है।

हमारा पिछला दशक मूल्यों के कंफ्यूजन का दशक था। मैं उम्मीद करता हूं कि आगामी दस सालों में हम अपने मूल्यों को लेकर सुस्पष्ट हो पाएंगे। खास तौर पर हमारी नई पीढ़ी के लिए यह बहुत जरूरी है। जब मूल्य स्पष्ट और निर्धारित होते हैं तो हम लोगों को यह बता सकते हैं कि उनके जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए। तमाम घोटाले और घपले मूल्यों के अभाव में ही होते हैं।

नए दशक की दहलीज पर खड़े होकर एक कॉलम लिखना चुनौतीभरा काम है। एक सीमित स्थान में पिछले दस सालों का लुब्बेलुआब पेश करना या आगामी दस सालों के बारे में पूर्वानुमान लगाना आसान नहीं। बहरहाल, मैं अपना ध्यान उन घटनाओं पर केंद्रित नहीं करूंगा, जो बीते दशक में घटी हैं या आगामी दशक में घट सकती हैं, क्योंकि उस बारे में पहले ही काफी बातें हो रही हैं। मुझे लगता है यह हमारे लिए एक अच्छा अवसर है कि नए दशक का स्वागत करते समय हम इस बारे में विचार करें कि पिछले दस सालों में भारत की संस्कृति में क्या परिवर्तन आए हैं और आने वाले समय में उसमें क्या परिवर्तन आने चाहिए।

आजादी के बाद अनशन तो कई हुए, लेकिन अन्ना हजारे का अनशन अपूर्व था| इतने कम समय में इतनी जबर्दस्त प्रतिक्रिया पहले कभी नहीं हुई| श्रीरामुलू के अनशन ने आंध्रप्रदेश बनाया और तारासिंह और फतेह सिंह के अनशन ने पंजाब बनाया| अन्ना के अनशन ने अभी तक कुछ नहीं बनाया| लोकपाल भी नहीं| लेकिन इस अनशन ने सब सीमाएं तोड़ दीं| प्रांत, भाषा, जाति, मज़हब – कोई भी दीवार टिक न सकी| मानो पूरे देश में तूफान आ गया| चार-पांच दिन में ही सरकार की अकड़ ढीली पड़ गई| उसने घुटने टेक दिए|

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए देशों में भारत के पास लगातार सफल चुनाव संपन्न कराने का और एक मज़बूत व शांतिपूर्ण लोकतंत्र चलाने का अच्छा रिकॉर्ड है.  पिछले पचास सालों में कई देश जो लोकतान्त्रिक उम्मीदों के साथ जन्मे थे, समय के साथ तानाशाही ताकतों और सैन्य विद्रोहों का शिकार हो गए. हमारे पडोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश के उदाहरण से ही पता चलता है कि लोकतंत्र चलाना कितना कठिन है. फिर भी भारत विगत कई सालों से परिस्थितियों के साथ लचीलापन रखते हुए लोकतान्त्रिक मान्यताओं को बनाये रखने में कामयाब रहा है.  लोग बड़ी तादातों में वोट करने आते हैं और समय के साथ केंद्र व राज्यों की निर्वाचित इकाईओं में विभिन्न जातियों व सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व बढ़ा ही है.

विकास और सामाजिक खर्च को लेकर पिछले एक-दो महीने से इंटरनेट पर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा शुरू किए गए इस बहस में नोबल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि सामाजिक खर्च में वृद्धि नहीं कर सिर्फ दोहरे अंकों की विकास दर हासिल करने पर ध्यान देना नासमझी होगी। समाचार पत्र ने इसके जवाब में नोबेल पुरस्कार के एक दूसरे दावेदार जगदीश भगवती को भी उद्धृत किया, जिन्होंने कहा कि सामाजिक खर्च बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे बेहतर तरीके से लक्षित किया जाए और उसके लिए अधिक-से-अधिक धन की व्यवस्था करने के लिए विकास दर बढ़ाने की जरूरत है और उसके लिए दूसरी पीढ़ी का आर्थिक सुधार किया जाना जरूरी है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

भारत ने 28 साल बाद विश्व कप क्रिकेट पर कब्जा कर चारो तरफ जश्न का माहौल बना दिया। इससे पहले 1983 में लार्ड्स के मैदान पर कपिलदेव के नेतृत्व में भारतीय टीम ने वेस्टइंडीज को पराजित कर क्रिकेट विश्वकप जीता था. 2011 के फाइनल मैच के रोमांचक  मुकाबले में भारतीय टीम ने श्रीलंका की टीम को छह विकेट से हरा दिया और सालों से बंधी लोगों की उम्मीदों को पूरा किया। इसी के साथ धोनी के धुरंधरों पर देश के लगभग हर हिस्से से तोहफों की बौछार होने लगी। खिलाड़ियों को सम्मानित करने की होड़ में मानो कोई पीछे नहीं रहना चाहता.

केंद्र सरकार ने हाल ही मे देश का सलाना आर्थिक बजट पेश किया। इसके साथ ही नई आर्थिक नीति को अपनाए हुए लगभग 20 साल पूरे हो गए, जब भारत ने अपनी उन अधिकतर पुरानी आर्थिक नीतियों का त्याग कर दिया था, जिसने 1991 के शुरुआती महीनों में भारत को कंगाली की कगार पर ला खड़ा किया था।

उस वर्ष नाटकीय रूप से उदारीकरण की नीतियों को अपनाने और 1990 के दशक के आखिरी सालों में किए गए कुछ नीतिगत बदलावों को कुछ मायनों में जबदरस्त सफलता मिली-- भारतीय अर्थव्यवस्था में पहले की तुलना में काफी अधिक स्थायित्व आया और यह पहले से अधिक समृद्ध भी हुआ। लेकिन पिछले छह सालों में आर्थिक सुधार को आगे बढ़ाने में मिली असफलता और पिछले सुधारों की कुछ खामियों को देखने से यह समझा जा सकता है कि सुधार के लिए राजनीतिक जमीन तैयार क्यों नहीं हो पाई।

बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के पास हो जाने के बाद उम्मीद बढ़ी थी कि देश में प्राइमरी स्कूलों की शिक्षा के प्रबंध में भारी बदलाव आयेगा. 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के लिए बनाए गे इस कानून में बहुत कमियाँ हैं और इसको लागू करने की दिशा में ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति का  भी अभाव है. 1991 में जब मौजूदा प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने पी वी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री के रूप में कम संभाला था, उसके बाद से ही शिक्षा को अति महत्वपूर्ण मुकाम पर रख दिया गया था. डॉ मनमोहन ने वित्त मंत्री के रूप में उदारीकरण और वैश्वीकरण की जिन नीतियों का सूत्रपात किया था उन्हें बाद में आने वाली सरकारें भी नहीं  रोक सकीं.

विदेशी मुद्रा में पूर्णतया कंगाल होने के बाद ही देश के राजनीतिक वर्ग को 1991 में आर्थिक सुधार लाने की सुध आयी. डेंग ज़ियाओपिंग के नेतृत्व में चीन में 12 साल पहले ही आर्थिक सुधार शुरू हो चुके थे. ये देर से की गयी शुरुआत एक महत्त्वपूर्ण वजह है कि आज भारत और चीन के विकास में इतना फासला है. भारत में दो चरणों में सुधारों को क्रियान्वित किया गया: पहला चरण था 1991 से 1993 के बीच प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हाराव के नेतृत्व में और दूसरा चरण था 1997 से 2004 के बीच प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व काल में. इसके विपरीत, चीन में सुधारों का सिलसिला अनवरत चलता आ रहा है.

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