क्या हम सभ्य हो रहे हैं ?
फरवरी 2, 2012 - 18:37पिछले दिनों स्टीवेन पिंकर जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल में भाग लेने आए थे जहां उन्होंने अपने भाषण में जो कहा उसका लब्बोलुबाब यह था कि आदमी अब इंसान बनता जा रहा है। भयानक हिंसक युद्ध पहले से कम हो गए हैं और इसके साथ समाज में हिंसा कम होती जा रही है। उनका यह दावा नया नहीं है। उन्होंने अपनी बहुचर्चित पुस्तक – द बेटर एजिंल्स आफ अवर नेचर-व्बाय वायलेंस इज डीक्लाइंड- में भी यही दावा
रूसी ‘चुनाव’ : सिर्फ धांधली का खेल
दिसम्बर 27, 2011 - 16:40चार दिसंबर को रूस में “चुनाव” हुए। मैंने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, क्योंकि यह महज समय की बर्बादी थी, जबकि केंद्रीय चुनाव आयोग इसे “स्टेट ड्यूमा के लिए चुनाव” बता रहा था। उस दिन तक यह स्वयंसिद्ध तथ्य की तरह था कि सत्तारूढ़ यूनाइटेड रशिया पार्टी की झोली में 10.8 करोड़ मतदाताओं में से 4.5 से 5 करोड़ वोट गए। अब इसे मजाक बनाया जा रहा है और यहां तक कहा जा
खाद्य बिल बढ़ा सकता है आर्थिक भार
दिसम्बर 22, 2011 - 18:37कैबिनेट ने खाद्य सुरक्षा बिल को रविवार को स्वीकृति दी, लेकिन भारतीय जनसाधारण को सस्ते भोजन की गारंटी देने वाले इस बिल पर मुहर लगना फिलहाल दूर की कौड़ी लगता है। फिर भी यह बिल अभी से ही उन अर्थशास्त्रियों को भयभीत कर रहा है, जो इसे खास तौर पर इस समय सरकार पर एक बड़े आर्थिक भार के रूप में देखते हैं।
सामाजिक सुरक्षा के लिए चाहिए पुख्ता स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था
दिसम्बर 15, 2011 - 17:15भारत और वैश्विक बिरादरी इस बात को लेकर चर्चा करने लगे हैं कि जिस जनसांख्यिकीय मोर्चे पर भारत लाभ की स्थिति में है, देश को इस सदी के मध्य तक उसका लाभ उठाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या प्रभाग के आंकड़े तो वास्तव में यह दर्शाते हैं कि वर्ष 2040 तक दक्षिण एशिया की कुल जनसंख्या में 15 से 64 साल की आयु वर्ग के कामकाजी समूह की हिस्सेदारी बढऩे वाली है और नवनिर्माण के दौर से गुजर
देर से उठाया गया सही कदम
दिसम्बर 9, 2011 - 13:28अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए रिटेल सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को दी गई अनुमति देर से उठाया गया एक सही कदम है। पिछले दस वर्षो से यह उम्मीद की जा रही थी कि सरकार खुदरा क्षेत्र में भी उदारीकरण की नीतियों को लागू करे, क्योंकि दूसरे देशों की तुलना में हमारा रिटेल सेक्टर काफी पिछड़ा हुआ और असंगठित था। अब जबकि औद्योगिक विकास दर धीमी पड़ रही है और महंगाई पर नियंत्रण पाना
प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप का सफल नमूना
नवंबर 28, 2011 - 13:45पिछले लगभग एक साल के अंतराल में देश में हुए दो बड़े खेल आयोजनों में भारत की दो अलग-अलग तस्वीरें नजर आईं। गत वर्ष अक्टूबर में हुए कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन पुराने भारत के नेता-बाबू गठबंधन द्वारा किया गया था। फॉर्मूला वन ग्रांप्री का आयोजन नए भारत द्वारा स्थानीय निजी उद्यमियों और वैश्विक व्यवसाय के सहर्ष संयोग से किया गया।
भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजन के बारे में आम धारणा है कि उसने देश की छवि पर बट्टा लगाया। दूसरी तरफ फॉर्मूला वन के आयोजन को इस तरह देखा जा रहा है कि उसने वैश्विक जाजम पर इंडिया इंकॉपरेरेशन के पदार्पण की पुष्टि कर दी है। तो क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि राजनेताओं और नौकरशाहों वाले पुराने भारत पर कॉपरेरेट और शो-बिज पॉवर वाले नए भारत ने बढ़त बना ली है?
सांस्थानिक सुधारों का महत्व
नवंबर 22, 2011 - 17:53देश के निजी क्षेत्र और उसके मजबूत नागरिक समाज की चाहे जो भी उपलब्धियां रही हों लेकिन इस बात में कहीं कोई संदेह नहीं है कि अगर भारतीय राज्य की स्पष्ट दिखाई दे रही गड़बडिय़ों में सुधार नहीं लाया गया तो देश बहुत आगे तक नहीं जा पाएगा। भारतीय राज्य की जिन प्रमुख कमियों पर ध्यान केंद्रित है वे हैं भ्रष्टाचार का बढ़ता स्तर और देश के सार्वजनिक जीवन बढ़ता बिकाऊपन। निश्चित रूप से इन ची
शिक्षा के अधिकार के मायने
नवंबर 15, 2011 - 15:38चिराग तले अंधेरा देखना हो तो मेवात पधारिए। देश की राजधानी की नाक तले और गुड़गांव की अति आधुनिक इमारतों के बगल में स्थित मेवात का इलाका इंडिया और भारत के बीच खाई की जीती-जागती मिसाल है। देश के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद इसी मुस्लिम बाहुल्य इलाके से सांसद चुने गए थे।
दुनिया में आर्थिक आजादी घटी, भारत 94वें पायदान पर
नवंबर 8, 2011 - 17:27नई दिल्ली- सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा जारी सालाना वार्षिक रिपोर्ट “इकोनॉमिक फ्रीडम ऑफ द वर्ल्ड 2011’’ में भारत 94वें पायदान पर है। बीते साल वह 90वें स्थान पर था। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के अध्यक्ष पार्थ शाह ने कहा, “बीते साल के मुकाबले भारत की रैंकिंग में गिरावट निराशाजनक है। आर्थिक आजादी बढ़ने के बजाय घटी है। व्यापक भ्रष्टाचार और लाइसेंस राज की पर
भारत में शिक्षा का पैमाना औसत दर्ज़े का
सितंबर 26, 2011 - 13:14आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने कुछ समय पहले जारी अपनी रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा पर केन्द्रित किया है। इस हिस्से में बेशक स्कूलों में बच्चों का नामांकन और उपस्थिति बढ़ने के लिए भारत की पीठ थपथपाई गई है, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी गई है कि देश में छात्रों को औसत दर्जे की शिक्षा और कौशल प्रदान किया जा रहा है। इसमें पढ़ना और लिखना भी शामिल है, जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों से नीचे है।
