विशेष लेख

पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों ने प्रकृति और संस्कृति, कला और जीवन, सामरिक ललक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक शांति, जैव एवं सांस्कृतिक विविधता के बीच एक बेमिसाल तालमेल स्थापित किया है और इसे संरक्षित भी किया है। इन लोगों ने इस संतुलन की खूबी को संगीत, कला, स्थापत्य, अपनी सोच और ज्ञान प्रणाली, जीवन के आधारभूत रीति रिवाज से लेकर अपने कार्यों, मौसम और प्रकृति में संजोये रखा है।

पूर्वोत्तर अपनी भौगोलीय और पर्यावरणीय विविधता के कारण अलौकिक

Published on 19 Sep 2016 - 17:05

केंद्र सरकार द्वारा वंचित व कमजोर वर्ग को गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित कराने के लिए लागू किया गया शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून स्वयं ही सर्वशिक्षा अभियान की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होता प्रतीत हो रहा है। कानून में समाहित कुछ प्रावधान ऐसे हैं जिनसे देशभर के लाखों निजी (बजट) प्राइवेट स्कूल बंद होने की कगार पर पहूंच गए हैं। अकेले दिल्ली में ही 13 हजार से ज्यादा स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा मंडरा रहा है। इसके साथ ही इन स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों नौनिहालों का भविष्य भी अंधकारमय हो गया है। दुष्परिणामों से भरे आरटीई

Published on 23 Oct 2012 - 20:18

जब भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का झंडा अन्ना हजारे के हाथों से अरविंद केजरीवाल के पास आया तो इसमें एक नया जोश देखने को मिला। पिछले कुछ हफ्तों में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खुलासे सामने आए। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई सफल होती है या नहीं, लेकिन यह अपने पीछे एक बड़ी उपलब्धि छोड़ रही है। इसने मध्य वर्ग को जगा दिया है और शशि कुमार की कहानी इसे साबित करती है।

शशि कुमार से मेरी मुलाकात दस साल पहले हुई थी। 22 साल के इस

Published on 22 Oct 2012 - 18:31

सम्पूर्ण विश्व में शहरीकरण श्रम विभाजन की सहायता से समृद्धि बढ़ाता है। इसलिए भारत जैसे देशों में शहरीकरण को संपन्नता बढ़ाने के साधन के रूप में अपनाना सरकार के पिछले 50 वर्षों के प्रयासों (ग्रामीण विकास के नाम पर निर्रथक धन का व्यय) की अपेक्षा बेहतर विकल्प है। अभी हाल ही के आर्थर एंडरसन फार्च्यून के विश्वव्यापी सर्वे में भारत के शहरों को सबसे खस्ताहाल स्थिति में पाया गया। निश्चित ही संपन्न देश होने का यह तरीका नहीं है।

Published on 12 Oct 2012 - 14:17

जब ऐसा कहा गया है कि मानव (Home Economicus) धन पैदा करने के लिए तैयार किया गया एक यंत्र है, तो भारतीय अर्थशास्त्र में बताए जा रहे उस तर्क की जांच करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, जिसके अनुसार भारत की विशाल जनसंख्या गरीबी का एक कारण है। यदि मनुष्य एक मात्र ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है, तो इसकी अधिक संख्या गरीबी का कारण कैसे हो सकती है? सच क्या है ?

सच यह है कि नक्शे पर अंकित प्रत्येक बिंदु, जो किसी शहर या

Published on 10 Oct 2012 - 19:12

पिछले कुछ समय में यूपीए सरकार की चालढाल देखने के बाद राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में यह कहा जा रहा था कि सरकार की निर्णय करने की क्षमता को लकवा मार गया है। कुछ अखबार तो यूपीए को यूनाइटेड पैरालाइजड एलाइंस भी कहने लगे हैं।लेकिन सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने जब अमेरिका में एक कार्य़क्रम के दौरान कहा कि अब 2014 के बाद ही आर्थिक सुधार हो पाएंगे तो बवाल मच गया। इसका मतलब यही निकाला गया कि सरकार का प्रवक्ता खुद कह रहा है कि सरकार के बचे हुए कार्यकाल में कुछ नहीं होना है ,जो  होगा वह लोकसभा चुनावों के बाद नई

Published on 28 Apr 2012 - 23:45

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