ताज़ा पोस्ट

Wednesday, March 22, 2017

समाज की बसावट और बनावट का स्वरूप कितना भी योजनाबद्ध क्यों न हो उसे अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए एक अनियोजित ढंग से विकसित वातावरण की जरुरत होती ही है। फुटपाथ पर लगने वाले छोटे-बड़े ठेले, खोमचे व अस्थायी दुकाने इसी का उदाहरण हैं। हर सोसाइटी, हर मोहल्ले एवं कालोनी के आस-पास के एक फुटपाथ का बाजार स्वत: विकसित हो जाता है। इस बाजार के स्वत: विकसित होने के पीछे दो मूल वजहें हैं जो कारक होती हैं। पहली वजह, वहां रहने वाले लोगों की दैनिक जरूरतों की पूर्ति एवं दूसरी वजह उन जरूरतों की पूर्ति की वजह से रोजगार सृजन के स्थानीय अवसरों की उपलब्धता। फुटपाथ का बाजार स्थानीय समाज की जरूरतों को पूरा भी करता है और उसी समाज के कुछ लोगों को उसी जगह पर रोजगार के अवसर भी देता है।

यह सबकुछ परस्पर सहमति और समझदारी से चलता है ठीक वैसे ही जैसे किसी गली में सब्जी का ठेला...

Tuesday, March 21, 2017

अनएडेड प्राइवेट स्कूलों के फीस को रेग्युलेट करना दरअसल, टीएमए पई बनाम कर्नाटक सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 11 सदस्यीय खण्डपीठ के फैसले की अवज्ञा है। सरकार द्वारा अनएडेड प्राइवेट स्कूलों के फीस को रेग्युलेट करना, न केवल संविधान द्वारा उन्हें प्रदत्त संरक्षण का स्पष्ट उल्लंघन है बल्कि निष्प्रभावी और अबाध्यकारी भी है। निसा के माध्यम से हमने इस मुद्दे को उठाया है और बार-बार दोहराया भी है कि ऐसी कार्रवाई माननीय सर्वोच्च न्यायालय 11 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के निर्णय का अपमान है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना करना है।

राज्यों के शिक्षा विभाग अपने शिक्षा संस्थान अधिनियम के अधीन समय-समय पर शुल्क के नियमन को जाँचते रहते हैं। यह उपक्रम एक ओर तो काफी हद तक स्वीकारयोग्य थी मगर एक कठोर शुल्क की व्यवस्था को स्वीकार्य नहीं किया जा...

Saturday, March 18, 2017

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने सन् 1980 में लिखी अपनी पुस्तक 'फ्री टू चूज़' में धन खर्च किए जाने की प्रक्रिया को अध्ययन की सरलता के लिए चार हिस्सों में वर्गीकृत किया था। पहला, आप अपना धन स्वयं पर खर्च करते हैं। दूसरा, आप अपना धन किसी और पर खर्च करते हैं, तीसरा आप किसी और का धन स्वयं पर खर्च करते हैं और चौथा, आप किसी और का धन किसी और पर खर्च करते हैं। उदाहरणों के माध्यम से फ्रीडमैन ने स्पष्ट किया था कि धन खर्च करने का पहला तरीका सबसे ज्यादा किफायती और सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करने वाला होता है। धन खर्च करने का दूसरा तरीका किफायती होता है लेकिन उपयोगिता को लेकर संशय होता है। तीसरा तरीका किफायती नहीं होता लेकिन सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करता है और चौथा तरीका न तो किफायती होता है और न ही सर्वाधिक उपयोगिता वाला होता है। 

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Friday, March 10, 2017

भाग 1 http://azadi.me/primary-education-in-India-part1‌ से आगे..

देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता में कमी की एक प्रमुख वजह यह भी है कि इसकी जिम्मेदारी पूर्णतः राज्य सरकारों पर ही छोड़ दी गयी है। यही कारण है कि आज देश के तमाम राज्यों में वही पुराने 1986 के ढर्रे पर शिक्षा व्यवस्था को संचालित किया जा रहा है। वर्तमान समय में भूमंडलीयकरण के आने के बाद भी इस तरह से शिक्षा व्यवस्था को चलाया जा रहा है कि वह अर्धनग्न अवस्था में समाज की नकारात्मक प्रदर्शनी बन गयी है। शिक्षा के पुराने पाठ्यक्रम वर्तमान के प्रतिस्पर्धी दुनिया में प्रतिस्पर्धा के लायक नही हैं। देश की नीति नियंता इस बात से अच्छी तरह अवगत हैं कि शिक्षा को उन्नत स्तर का बनाकर ही हम स्वस्थ...

Friday, March 10, 2017
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किसी देश का भविष्य वहां के बच्चों को मिलने वाली प्राथमिक शिक्षा पर निर्भर करता है। प्रारम्भिक शिक्षा जिस प्रकार की होगी देश का भविष्य भी उसी प्रकार निर्धारित होगा। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति आजादी के बाद इतिहास में एक अहम कदम थी। उसका उद्देश्य राष्ट्र की प्रगति को बढ़ाना तथा सामान्य नागरिकता व संस्कृति और राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करना था। 1968 की नीति लागू होने के बाद देश में शिक्षा का व्यापक प्रसार भी हुआ। 

परन्तु अब हालात कुछ और ही हैं। समय-समय पर प्रकाशित आकड़ो के अनुसार शिक्षा के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। शिक्षा का अधिकार फोरम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश में 98,443 सरकारी प्राथमिक विद्यालय सिर्फ एक शिक्षक की बदौलत चल रहे हैं। अर्थात देश के करीब 11.46 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में कक्षा एक से पांचवीं तक छात्रों की पढ़ाई की...

Tuesday, March 07, 2017

ऐसा प्रतीत होता है कि आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी सरकारें यह नहीं समझ सकी हैं कि देश के नौनिहालों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के लिए बच्चों को केवल स्कूल तक पहुंचा देने भर से ही काम नहीं बनेगा। तमाम सरकारी एवं गैरसरकारी आंकड़ें यह सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून, मिड डे मिल योजना, निशुल्क पुस्तकें, यूनिफार्म आदि योजनाओं के परिणामस्वरूप स्कूलों में दाखिला लेने वालों की संख्या तो बढ़ी हैं लेकिन छात्रों के सीखने का स्तर बेहद ही खराब रहा है। देश में भारी तादात में छात्र गणित, अंग्रेजी जैसे विषय ही नहीं, बल्कि सामान्य पाठ पढ़ने में भी समर्थ नहीं हैं। यहां तक कि 5वीं कक्षा के छात्र पहली कक्षा की किताब भी नहीं पढ़ पाते। यूं तो यह ट्रेंड पूरे देश का है लेकिन लैपटॉप और स्मार्ट फोन बांटने वाला उत्तर प्रदेश शिक्षा की गुणवत्ता की गिरावट के मामले में नए प्रतिमान स्थापित करने की ओर अग्रसर...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

आज़ादी ब्लॉग

Thursday, March 02, 2017
  सुनो सुनो... विधायक जी कह रहे हैं कि ये ही मिल कर मुख्यमंत्री चुनते हैं   साभारः काजल कुमार  

Wednesday, March 01, 2017
जनसंख्या को सभी समस्याओं का कारण मानने और चीन जैसी कड़ी नीति का मांग करने वाले लोगों को यह खबर अवश्य पढ़नी चाहिए.. http://bit.ly/2...

Thursday, February 02, 2017
चुनाव आ गए क्या..

Saturday, January 07, 2017
स्कूलों से संबंधित नीतियों के निर्धारण की प्रक्रिया के दौरान अनऐडेड बजट स्कूलों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने की मांग को लेकर...

Monday, December 26, 2016
- प्राइवेट अनएडेड स्कूलों ने प्रिंसिपल की नियुक्ति में सीबीएसई के हस्तक्षेप को बताया स्वायतता से खिलवाड़ - बजट प्राइवेट स्कूलों क...

Thursday, December 22, 2016
स्कूलों के लिए जरूरी है सरकारों से आजादी हाल में राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की बैठक में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश...

Tuesday, December 06, 2016
"संविधान एक अद्भुत मंदिर था जिसका निर्माण हमने देवताओं के रहने के लिए किया था लेकिन इससे पहले कि वे वहां स्थापित होते शैतानों ने उ...

Wednesday, November 30, 2016
शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लाकर बच्चों की पहुंच स्कूल तक तो हो गई लेकिन शिक्षा तक उनकी पहुंच अब भी नहीं हो पायी है। आरटीई में...

आपका अभिमत

क्या आपको लगता है कि देश में सेंसर बोर्ड जैसी संस्था की प्रासंगिकता है?

आज़ादी वी‌डियो

शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) के एक अहम प्रावधान 'नो डिटेंशन पॉलिसी' को जारी रखने, समाप्त करने या फिर...

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