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सोमवार, जून 17, 2013
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दलित इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) की ओर से बीते 6 जून को एक नया वेंचर कैपिटल फंड शुरू किया गया। इस फंड का मकसद है दलितों और आदिवासियों द्वारा चलाई जा रही कंपनियों में निवेश के लिए निवेशकों से 500 करोड़ रुपये जुटाना। कृपया इस पहल को सकारात्मक कार्रवाई (अफर्मेटिव एक्शन) के नाम पर उठाए गए एक और सदाशयी कदम की तरह न देखें।

फंड का इरादा निवेशकों को 25 प्रतिशत का सालाना टैक्स-पूर्व लाभ देने का है, जो सेंसेक्स के सबसे अच्छे शेयरों में पैसा लगाने वाले म्यूचुअल फंडों द्वारा दिए जाने वाले रिटर्न के समतुल्य है। क्या यह कोई खयाली पुलाव है? जी नहीं, जोखिम के बावजूद यह एक वास्तविक संभावना है। कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के नियमों के तहत चोटी के बिजनेस घरानों के लिए अपनी जरूरत का 4 फीसदी सामान दलित विक्रेताओं से सामान खरीदना जरूरी बना दिया गया है। इससे दलित कारोबार में जबर्दस...

शुक्रवार, जून 14, 2013
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बृहस्पतिवार को सेंटर फॉर सिविल सोसायटी में अपने सहयोगी एंड्रयू हम्फ्रीज के साथ बाजार व बाजार की प्रवृति को लेकर काफी देर तक चर्चा हुई। बाजार किस प्रकार समाज के उत्थान में कारगर उपकरण साबित हो सकता है इस पर कई प्रकार के सुझाव और विचार एंड्रयू ने सुझाए। साथ ही उन्होंने प्रख्यात उदारवादी चिंतक व अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन के वास्तविक जीवन से संबंधित एक घटना का भी विवरण दिया। साथ ही उन्होंने इंटरनेट पर उपलब्ध एक लेख का लिंक भी दिया। बृहस्पतिवार को ही आजादी वेबपोर्टल पर हिंदी में एक पैरे की भूमिका के साथ मिल्टन फ्रीडमैन के उस लेख का एक अंश हूबहू अंग्रेजी में पोस्ट किया। शीर्षक था “सामाजिक उत्थान के लिए बाजार का प्रयोग”

आज सुबह ऑफिस आने से पहले नाश्ते की टेबल पर आज के अखबार पर सरसरी निगाह डालते ही मैं चौंक पड़ा। कारण एक खबर थी। ऐसा लगा मानों मिल्टन फ्रीडमैन का बृहस्पतिवार का ले...

गुरूवार, जून 13, 2013
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मिल्टन फ्रीडमैन ने अमेरिका, यूरोप, चीन और सोवियत रूस में निजीकरण की प्रवृत्ति की छानबीन की और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आर्थिक स्वतंत्रता का कोई एक तय मार्ग नहीं होता है और इस दौरान सांस्कृतिक भिन्नताओं का भी ध्यान रखना आवश्यक है।  

चीन की पहले की यात्रा के दौरान के एक प्रकरण ने मुझे काफी प्रभावित किया कि समझदारी के बीच की चौड़ी खाई विभिन्न आर्थिक संस्थाओं से जुड़े लोगों को अलग अलग करती है। यह आधारभूत सिद्धांतों और विचारों पर बार बार जोर डालने को अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है, कि हम सभी उस व्यवस्था से जिसके अभ्यस्त होते हैं, उससे संबंधित सभी वस्तुओं को हल्के में ले लेते हैं। यह प्रकरण तब हुआ जब मैं और मेरी पत्नी दोपहर का भोजन सरकारी विभाग के एक मंत्री के साथ, जो जल्द ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था का मुआयना करने यूएस जाने वाले थे, कर रहे थे। हमारा म...

बुधवार, जून 12, 2013
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आमजन के लिए राहत की खबर है कि अब क्षेत्राधिकार के नाम पर पुलिस वाले एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकते। दिल्ली में तो जस्टिस वर्मा आयोग की सिफारिशों के मुताबिक आपराधिक नियम (संशोधन) कानून-२०१३ के पास होने के साथ ही एफआईआर संबंधी नए प्रावधान अस्तित्व में आ गए, लेकिन अब केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा राज्यों को भेजे गए दिशा-निर्देशों से ये पहलू चर्चा में आया है। इसके मुताबिक अगर कोई शिकायत लेकर आता है तो उसकी प्राथमिकी तुरंत दर्ज करना होगी। अगर घटना संबंधित थाना क्षेत्र की नहीं है तो बाद में शिकायत उस थाना क्षेत्र में भेजी जाएगी, जिसके इलाके में अपराध हुआ होगा। पहले मुश्किल यह थी कि क्षेत्राधिकार विवाद के कारण होने वाली देरी से कई मामलों में अहम सबूत नष्ट हो जाते थे।

केंद्र ने राज्य सरकारों का ध्यान इस तरफ खींचा है कि किसी संज्ञेय अपराध के बारे में एफआईआर दर्ज करने स...

मंगलवार, जून 11, 2013
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दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद का स्पष्ट रूप से मानना है कि दलितों का जितना भला पूंजीवाद ने किया है उतना किसी अन्य विभूति द्वारा नहीं किया जा सका है। चंद्रभान प्रसाद का यह भी मानना है कि आजा बाजार जाति और मार्क्स से बड़ा हो चुका है। उनका कहना है कि वैश्वीकरण के साथ भारत में एडम स्मिथ का प्रवेश हुआ जिन्होंने मनु को चुनौती दी। यह बाजार है जहां आपकी जाति नहीं बल्कि आपकी उपयोगिता का सम्मान होता है। उन्होंने ये बातें इंडियन एक्सप्रेस के मुख्य संपादक शेखर गुप्ता को दिए एक साक्षात्कार के दौरान कही। पूरे साक्षात्कार को हूबहू नीचे पढ़ा जा सकता है...

 

In this Walk the Talk with The Indian Express Editor-in-Chief Shekhar Gupta, Milind Kamble, founder of the Dalit Indian Chamber of Commerce and Industry (DICCI), and Chandra Bhan Prasad, its mentor, say "the nation should know Dalits are not only takers,...

सोमवार, जून 10, 2013
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भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 2010-11 की 9.2 प्रतिशत के आधे से भी नीचे आकर 2012-13 में मात्र 5 प्रतिशत रह गई है। हमारी अर्थव्यवस्था के सामने मुख्य समस्याएं हैं- ऊंचा चालू खाता घाटा, ऊंचा वित्त घाटा और छोटे-मंझोले उद्यमों के लिए बैंक ऋण का अभाव। ये तीनों मुश्किलें एक अकेले उपाय से दूर की जा सकती हैं। वह है देश के पास मौजूद अतिरिक्त खाद्य भंडार को कम करना। कृषि मूल्य एवं लागत आयोग (सीएसीपी) के चेयरमैन अशोक गुलाटी और इसकी संयुक्त निदेशक सुरभि जैन ने अपने हाल के एक शोधपत्र 'सुरक्षित भंडार नीति, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल की रोशनी में' के जरिये इस बात को स्पष्ट किया है। सब्सिडाइज्ड अनाजों के बल पर सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दशकों से चलाती आ रही है। इसके लिए सुरक्षित भंडारों की जरूरत पड़ती है, जिनका आकार पूरे साल के दौरान खरीद के सीजन के मुताबिक बदलता रहता है। पारंपरिक मानकों के अनुसार हर साल 1 जुलाई को रबी खरीद का सीजन...

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