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गुरूवार, अप्रैल 24, 2014
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देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रेहड़ी पटरी व्यवसायी और फेरीवाले समाज में हमेशा से हाशिए पर रहे हैं। शासन और प्रशासन द्वारा हमेशा से उन्हें शहर की समस्या में ईजाफा करने वाले और लॉ एंड आर्डर के लिए खतरा माना जाता रहा है। हालांकि सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस), नासवी व सेवा जैसे गैर सरकारी संगठन देशव्यापी अभियान चलाकर छोटे दुकानदारों और फेरीवालों की समस्याओं को दूर करने के लिए उचित संवैधानिक उपाय की लंबे समय से मांग करते रहे हैं। इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाते हुए पिछले दिनों लोकसभा से प्रोटेक्शन ऑफ लाइवलीहुड एंड रेग्युलेशन ऑफ स्ट्रीट वेंडिंग बिल 2012 पारित किया गया।
 
दरअसल, शहरी गरीबी में एक बड़ी आबादी उन छोटे दुकानदारों और फेरीवालों की है जो तमाम सरकारी कल्याणकारी सुविधाओं से वं...
बुधवार, अप्रैल 23, 2014
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प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस में की जा रही मनमानी वृद्धि को लेकर पैरंट्स मे खासा आक्रोश है। हर नए साल में 30-40 प्रतिशत फीस बढ़ाना सामान्य बात हो गई है। पैरंट्स की मांग है कि सरकार स्कूल मालिकों की इस मनमानी पर अंकुश लगाए। उनकी मांग सही है। शिक्षा को पूरी तरह बाजार पर नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन, सरकारी दखल की अलग समस्याएं है। पूरे देश में सरकारी स्कूलों की बदहाली बताती है कि सरकारी दखल से प्राइवेट स्कूलों का भी यही हाल हो जाएगा।
 
पाठ्यक्रम में यह दखल पहले से मौजूद है। फीस में दखल देकर सरकारी महकमा टीचरों के वेतन और सेवा शर्तों आदि पर भी हावी हो जाएगा। तब स्कूल मैनेजमेंट का लापरवाह टीचरों के विरुद्ध कार्रवाई करना कठिन हो जाएगा। शिक्षा के अधिकार का कानून पहले ही प्राइवेट स्कूलों की स्वायत्तता को संकट में डा...
मंगलवार, अप्रैल 22, 2014
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विभिन्न मामलों में न्यायपालिका द्वारा दी जाने वाली व्यवस्थाओं और टिप्पणियों को पढ़ने के बाद इस पर आश्चर्य होता है कि आखिर हम भारतीय लोग अधिकांश समय न्यायाधीशों को इस तरह की सक्रियता दिखाने के लिए क्यों विवश करते हैं। इस संदर्भ में जो बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है वह यह कि भारत में आज जिस तरह की न्यायिक निगरानी व्यवस्था है यदि वैसा कुछ नहीं होता तो क्या होता? फिर बात चाहे 2जी घोटाले की रही हो, खनन घोटाले की या फिर कोयला खदानों के आवंटन में हुए घपले-घोटालों की, इन सभी मामलों की निगरानी के कार्य में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया और इस बात को सभी जानते भी हैं। व्यापक रूप से कहें तो इस तरह के कदम के कारण उच्च पदों अथवा स्थानों पर भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए एक सकारात्मक माहौल का निर्माण हुआ। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सिविल सोसाइटी को यह अहसास हुआ कि भ्रष्टाचार को नियंत्रि...
सोमवार, अप्रैल 21, 2014
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आज अगर हम नरेंद्र मोदी की आर्थिक सोच के बदले चर्चा कर रहे हैं उनकी उस टोपी के पहनने, न पहनने की, तो इसमें सबसे ज्यादा दोष हम पत्रकारों का है। उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने भी उस टोपी को मुद्दा बनाकर खूब उछाला है, लेकिन जब भी उछाली गई है वह टोपी, हम पत्रकार फौरन पहुंच गए हैं वहां उसको सुर्खियों में रखने के लिए। यह नहीं पूछा हमने कभी कि अगर मोदी ने पहन ली होती वह टोपी, जो उस मौलाना ने उनको देने की कोशिश की थी, तो क्या मुस्लिमों की नजर में मोदी सेक्यूलर बन जाते? क्या टोपी न पहनने से यह साबित हो गया है कि मोदी के दिल में मुसलमानों के लिए नफरत है? नहीं, पर टीवी पर पिछले दिनों आपने देखा होगा किस तरह मोदी का जिक्र आते ही घूम-फिरकर बात उस टोपी तक पहुंचती रही है। इतनी चर्चा सुनने को मिली है उस टोपी की कि मोदी अंदर ही अंदर पछता रहे होंगे कि टोपी पहनने से उन्होंने मना क्यों किया था।
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मंगलवार, अप्रैल 15, 2014
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भूमंडलीकरण तथा आर्थिक उदारवाद के दौर में काफी समय से भारतीय कर प्रणाली में सुधार की मांग होती रही है। अर्थक्रांति नामक संगठन ने अपनी वेबसाइट पर भारतीय कर प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रस्ताव रखा है। इसके अनुसार भारत के सभी प्रकार के करों (कस्टम तथा आयात को छोड़कर) के स्थान पर बैंक लेन-देन कर को लगाने का सुझाव है। इस कर के द्वारा होने वाली आय को केंद्र, राज्य एवं स्थानीय शासन में बांटे जाने की बात है। इस प्रस्ताव के अनुसार आयकर भी समाप्त हो सकता है पर इसकी संभावनाओं पर विचार करना होगा।
दुनिया के कई देशों में आयकर का प्रावधान नहीं है। उदाहरण के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात, ओगान, बहरीन, इत्यादि। हालांकि इन देशों में नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा के नाम पर 5 से 10 फीसद तक कर देना पड़ता है। यही नहीं कुछ उत्पादों जैसे शराब पर 50 फीसद तक...
सोमवार, अप्रैल 14, 2014
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सोलहवीं लोकसभा के चुनाव के लिए तमाम राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में कहा है कि अगर वे सत्ता में आए, तो आर्थिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्राथमिकता से कार्य करेंगे। हाल ही में अमेरिका के अग्रणी मत सर्वेक्षक संगठन गैलप ने अपने सर्वेक्षण में कहा है कि भारत के लोकसभा चुनाव में विकास और अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। 
 
सर्वेक्षण में करीब 35 फीसदी भारतीयों ने माना है कि अर्थव्यवस्था बदतर होती जा रही है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भी अधिकांश मतदाताओं ने महंगाई, भ्रष्टाचार, रोजगार और विकास जैसे चार अहम मुद्दे बताए हैं।
 
महंगाई ने आम आदमी सहित मध्यवर्ग की भी कमर तोड़ दी...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

अनिल पांडेय, जगदीश पंवार व अतुल चौरसिया को पहला आजादी पत्रकारिता पुरस्कार

First Azadi Award Winners

- 8 जनवरी को दिल्ली के पांच सितारा होटल में आयोजित समारोह के दौरान किए गए सम्मानित

- एटलस ग्लोबल इनिसिएटिव के वाइज प्रेसिडेंट टॉम जी. पॉमर ने ट्रॉफी प्रदान कर किया सम्मानित

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आज़ादी ब्लॉग

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सोमवार, अप्रैल 14, 2014
मुझे नहीं लगता कि यह कहना अतिश्योक्ति होगा कि हमारा इतिहास, महंगाई और मुद्रा स्फीति का इतिहास रहा है। वह मुद्रा स्फीति जिसका सृज...

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मंगलवार, फरवरी 18, 2014
जब तक सरकारें सीमित नहीं होंगी, जनता को सही मायने में स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती...   - रोनॉल्ड रीगन (पूर्व अमेरिक...

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सोमवार, फरवरी 17, 2014
दुनिया में अल्पकालीन सरकारी कार्यक्रमों जितनी स्थायी चीज कुछ और नहीं हो सकती... - मिल्टन फ्रीडमैन  

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गुरूवार, फरवरी 13, 2014
व्यवसाय में सरकारी "सहायता" उतना ही त्रासदीपूर्ण है जितना कि सरकारी "उत्पीड़न"...सरकार केवल एक ही तरीके से राष्ट्र की समृद्धि मे...

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सोमवार, फरवरी 10, 2014
निर्धन लोगों के साथ असल त्रासदी, दरअसल उनकी आकांक्षाओं की विपन्नता है ः एडम स्मिथ

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See video पांच साल तक अपने चुनावी क्षेत्र से गायब रहने वाले राजनेता चुनाव आते ही किस प्रकार अपनी लच्छेदार बातो...