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गुरूवार, अगस्त 28, 2014
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दागी नेताओं को मंत्री बनाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को कोई निर्देश देने के बजाय जिस तरह खुद को केवल सलाह देने तक ही सीमित रखा उसे देखते हुए यह कहना कठिन है कि राजनीतिक दल उसकी राय को पर्याप्त महत्व देंगे। आसार इसी बात के अधिक हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद दागी समझे जाने वाले नेता मंत्री बनते रहेंगे। ऐसा इसलिए, क्योंकि दागी की कोई सीधी-सरल परिभाषा नहीं है।
 
राजनीतिक दलों के लिए दोषी सिद्ध न होने तक व्यक्ति निर्दोष है। इतना ही नहीं वे तब तक यह दलील देते रहते हैं जब तक मामले का निपटारा अंतिम तौर पर न हो जाए। ज्यादातर मामलों में ऐसा सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर ही होता है। यह तो गनीमत रही कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल में यह पाया कि दो वर्ष से अधिक की सजा वाले मामले में...
सोमवार, अगस्त 25, 2014
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हम सब स्वतंत्रता दिवस पर नरेंद्र मोदी के भाषण से बहुत प्रभावित हुए। जवाहरलाल नेहरू के बाद से हमने लाल किले से ऐसा ताजगीभरा, उत्साह बढ़ाने वाला और ईमानदारी जाहिर करता भाषण नहीं सुना। मोदी हिंदू राष्ट्रवादी की तरह नहीं, भारतीय राष्ट्रवादी की तरह बोले। आदर्शवाद की ऊंची-ऊंची बातें नहीं कीं, कोई बड़ी नीतिगत घोषणाएं नहीं कीं और न खैरात बांटीं। आमतौर पर हमारे नेता बताते हैं कि वे हमें क्या देने वाले हैं। उन्होंने बताया कि हमें कौन-सी चीजें राष्ट्र को देनी चाहिए। 
 
मोदी की शैली को वर्णित करने के लिए श्रेष्ठ शब्द हैं, व्यावहारिक, तथात्मक, गैर-आदर्शवादी और कार्यक्षम। वे नई नीतियों की घोषणा की बजाय नीतियों को अमल में लाने पर अधिक जोर देते हैं। जिन लोगों को बजट में धमाकेदार सुधारों की अपेक्षा थी, उन्हें निराशा ह...
शुक्रवार, अगस्त 22, 2014
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मोदी सरकार को सत्ता में आए करीब ढाई माह हो चुके हैं। इतने कम समय में किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचना अभी बहुत जल्दबाजी होगी, लेकिन बदलाव के संकेत दिखने लगे हैं और एक बड़ी तस्वीर स्पष्ट होने लगी है। हां, इतना अवश्य है कि जहां लोगों को आमूलचूल बड़े परिवर्तन की अपेक्षा थी वहां निरंतरता पर आधारित छोटे-छोटे बदलाव नजर आ रहे हैं। बजट में बहुत बड़े बदलाव की अपेक्षा पाले बैठे लोगों को भी कुछ निराशा हुई है। इसी तरह जो लोग अनुदार हिंदू तानाशाही के उभार का डर पाले हुए थे वे ऐसा कुछ न होने के प्रति आश्वस्त हुए हैं। प्रधानमंत्री न तो अधिक तेजी से अपने प्रशंसकों की तमाम बड़ी अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हैं और न ही अपने दुश्मनों के डर को समूल खत्म कर सकते हैं। इससे पता चलता है कि भारत में किस तरह सत्ता का संचालन होता है। इस निरंतरता की सकारात्मक व्याख्या यही है कि यह भारतीय राज्य के दिनोंदिन अधिक परिपक्व होने को दर्शाता है। इसका...
गुरूवार, अगस्त 21, 2014
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अपने पड़ोस में खूबसूरत इंडिया पार्क की कल्पना करें। इसमें झूले हैं, प्राकृतिक पगडंडियां हैं, फूलों की क्यारियां, खेल की सुविधाएं और वॉकिंग ट्रैक, क्या नहीं है। सबकुछ अद्‌भुत सिर्फ एक चीज छोड़कर। बच्चे वहां खेलने नहीं आते। ऐसा इसलिए  है, क्योंकि उसका इस्तेमाल वरिष्ठ नागरिक करते हैं, जिन्हें बच्चे अंकल कहते हैं। सौ से ज्यादा अंकल सुबह और शाम की सैर, सोसायटी की बैठकों और योगा क्लास के लिए इस पार्क का उपयोग करते हैं।
 
हर अंकल के पास एक छड़ी होती है, जिसका उपयोग वे उन बच्चों पर करते हैं, जो पार्क में आने का साहस दिखाते हैं। यदि कोई बच्चा ज्यादा उछल-कूद करे, किलकारियां मारे, पेड़ पर चढ़ जाए या क्रिकेट खेले तो अंकल उस बच्चे को छड़ी लगा देते हैं। आखिरकार अंकलों को लगता है कि पार्क में व्यवस्था कायम रहनी चाहिए।...
बुधवार, अगस्त 20, 2014
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प्राथमिक शिक्षा का माध्यम क्या हो इस बाबत अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय का एक महत्वपूर्ण फैसला आया है। फैसले में स्पष्ट तौर पर स्कूली शिक्षा के माध्यम को तय करने का अधिकार स्कूलों को देते हुए कहा गया है कि राज्य सरकारें इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं। साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि आज के समय में अंग्रेजी की महत्ता की अनदेखी नहीं की जा सकती है। मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने के बाद रोजगार के लिए दर दर की ठोकरें खाने से अच्छा है कि उस भाषा में शिक्षा प्रदान की जाए जो आगे चलकर छात्रों को रोजगार प्रदान कराने में सहायता प्रदान करे।  
 
चीफ जस्टीस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने स्पष्ट कहा है कि राज्य सरकारें भाषाई अल्पसंख्यक शिक्षक संस्थानों में क्षेत्रीय भाषाओं को थोप नह...
मंगलवार, अगस्त 19, 2014
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योजना आयोग कोई संवैधानिक संस्था नहीं था। इसका गठन सिर्फ कैबिनेट नोट के माध्यम से किया गया था। देश के विकास और नीति-निर्धारण में महत्वपूर्ण रही इस संस्था को कभी संसद से कानून के माध्यम से संस्तुति दिलाने की जरूरत नहीं समझी गई। यह आज तक संविधान से ऊपर निकाय के रुप में ही कार्य करती आ रही थी। आज जबकि केंद्रीय आयोजना का पूरा समाजवादी माइंडसेट ही बदल चुका है तब इस संस्था की जरूरत वैसे भी नहीं रह गई थी। खुद सोवियत संघ ने अब इस तरह की आयोजना पद्धति छोड़ दी है।
 
1991 के पूर्व योजना आयोग लक्ष्य निर्धारण और लाइसेंस निर्धारण का कार्य करता था। जैसे देश को वर्ष विशेष में कितना कोयला, लोहा और बिजली चाहिए तथा उसे कितने स्कूटर और कारें बनानी चाहिए। इसी हिसाब से देश में उत्पादन के लाइसेंस दिए जाते थे। 1991 के बाद यह सब...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

अनिल पांडेय, जगदीश पंवार व अतुल चौरसिया को पहला आजादी पत्रकारिता पुरस्कार

First Azadi Award Winners

- 8 जनवरी को दिल्ली के पांच सितारा होटल में आयोजित समारोह के दौरान किए गए सम्मानित

- एटलस ग्लोबल इनिसिएटिव के वाइज प्रेसिडेंट टॉम जी. पॉमर ने ट्रॉफी प्रदान कर किया सम्मानित

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आज़ादी ब्लॉग

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बुधवार, अगस्त 27, 2014
विगत कुछ समय से पंजाब में ड्रग्स के सेवन करने वालों की संख्या में हुई वृद्धि ने शासन प्रशासन सहित स्थानीय जनता के माथे पर चिंता की...

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मंगलवार, अगस्त 26, 2014
जिन लोगों को ये लगता हो कि किसानों की समस्या का एकमात्र समाधान सब्सिडी है, तो उन्हें न्यूजीलैंड देश से कुछ सबक सीखना चाहिए..। न्यू...

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सोमवार, अगस्त 11, 2014
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत आठवीं कक्षा तक के बच्चों को फेल नहीं किया जा सकता है. ऐसे में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में हालत इत...

Frederic Bastiat on freedom
बुधवार, अगस्त 06, 2014
यदि मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्ति (स्वभाव) इतनी बुरी है कि उसे आजाद छोड़ना सुरक्षित नहीं तो ऐसी सोच रखने वाले या ऐसी व्यवस्था करने...

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शनिवार, अगस्त 02, 2014
इतिहास गवाह है कि दुनिया भर की सरकारों द्वारा जिस भी चीज के खिलाफ मुहिम छेड़ी गई उस चीज में उतनी ही बढ़ोत्तरी हुई। सरकारों ने भूख,...

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