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गुरूवार, नवंबर 27, 2014
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तीन विषयों में प्रधानमंत्री को पूरे अंक दिए जा सकते हैं : उनकी वक्तृत्व कला, भारतीय  विकास कथा को पश्चिम में पहुंचाने का जुनून और अमेरिकी राष्ट्रपति को गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित करने का कूटनीतिक चातुर्य। हालांकि, मुझे नहीं मालूम की दो अन्य बातों की श्रेणी क्या है। एक तो तैयारी के पहली की इसकी टाइमिंग और दूसरा यह कि तीनों ही बातें पूरी एक ही व्यक्तित्व पर आधारित हैं। भारत की विकास कथा पर पश्चिम को राजी करना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के डोज के बूते तेजी से रोजगार पैदा करने, उत्पादन व प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने और इसके साथ होने वाली सारी अद्‌भुत बातें साकार करने का और कोई रास्ता नहीं है।
 
शेयर बाजार में खरीदी-बिक्री करने वालों का सीमित असर होता है। वास्तविक मदद तो प्रत्यक्ष विदेशी...
बुधवार, नवंबर 26, 2014
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ऐसा भी मौका आता है जब तमाशा बंद करके असली काम शुरू करना पड़ता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुकूल रहे हरियाणा व महाराष्ट्र के चुनावों के साथ ऐसा लगा कि वह वक्त आ गया है। उन्हें अौर उनके मंत्रियों को अब कठोर तथ्यों का सामना करना पड़ेगा। जन-धन योजना के तहत 7.25 करोड़ बैंक खाते खोलना किसी भी दृष्टि से प्रभावी उपलब्धि है, लेकिन अब तक एक-चौथाई के खातों में ही रकम आई है। खाली खाता तो किसी के लिए भी काम का नहीं हो सकता। इसी तरह मंत्रियों और नौकरशाहों द्वारा समारोहपूर्वक सफाई करने से देश स्वच्छ नहीं होने वाला। रेलवे के कामकाज का परीक्षण करने के लिए एक और समिति नियुक्त करने से बुलेट ट्रेन तो छोड़िए, मौजूदा ट्रेनों की रफ्तार तक नहीं बढ़ेगी और न वे समय पर चलने लगेंगी। 
 
जी-20...
मंगलवार, नवंबर 25, 2014
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बहुत से भारतीयों की धारणा अभी भी यही है कि बाजार धनी लोगों को और अधिक धनी तथा गरीबों को और अधिक गरीब बनाता है तथा यह भ्रष्टïचार एवं क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा देता है। वास्तव में यह एक गलत धारणा है। वास्तविकता यही है कि पिछले दो दशकों में व्यापक तौर पर समृद्धि बढ़ी है और तकरीबन 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं। बावजूद इसके लोग अभी भी बाजार पर अविश्वास करते हैं। आंशिक तौर पर इसके लिए आर्थिक सुधारकों को दोष दिया जा सकता है, जो प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताओं अथवा धारणा को ब्रिटेन की मार्गरेट थैचर की तरह आम लोगों को नहीं बता सके। सौभाग्य से हमारे पास अब नरेंद्र मोदी जैसा श्रेष्ठ सेल्समैन उपलब्ध है जो हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बदलने में समर्थ है।
 
कुछ सप्ताह पूर्व जब सरकार ने ड...
शुक्रवार, नवंबर 21, 2014
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दिल्ली से देवभूमि उत्तराखंड आए युवा सैलानी जोड़े की हत्या और लूटपाट की अप्रत्याशित घटना ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र चकराता को सुर्खियों में ला दिया है। लेकिन इन सुर्खियों ने स्थानीय जनजाति समाज को शर्मसार कर दिया है, क्योंकि ऐसी घटना इस क्षेत्र के लिए किसी बड़ी अनहोनी जैसी है। सैलानियों को सिर-माथे बिठाने की परंपरा वाले जौनसार-बावर के इस जनजातीय समाज को पहले तो यकीन ही नहीं हुआ कि उनके बीच के युवक ऐसा वीभत्स कांड कर सकते हैं। लेकिन जब सच सामने आया, तो उन्होंने अनूठे ढंग से सामूहिक प्रतिक्रिया दी।
 
इलाके के 14 गांवों (खत) की सामूहिक पंचायत ने आम राय से फैसला किया कि ऐसे नालायकों से अब उनका कोई वास्ता नहीं। परिजनों ने भी इन आरोपियों से हमेशा के लिए नाता तोड़ने और उन्हें किसी भी तरह का कानूनी मदद न करन...
गुरूवार, नवंबर 20, 2014
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पिछले पखवाड़े एक ही दिन दो खबरें आईं। दोनों इतनी विपरीत थीं कि मैं चकरा गया। दोनों खबरें लोकतांत्रिक संस्कृतियों से आई थीं। अखबारों में फोटो थे, जिनमें युवा लड़के-लड़कियों को पुलिस हिरासत में लेती दिखाई दे रही थी। ये किस ऑफ लव डे के बहाने विभिन्न संगठनों द्वारा नैतिक पुलिस बनकर उन्हें परेशान करने का विरोध कर रहे थे। यह हालत तब है जब उन्होंने किसी कानून का उल्लंघन भी नहीं किया होता है।
 
कोझीकोड के एक कैफे से इसकी शुरुआत हुई, जिसमें प्रेम के खुले इजहार से क्रुद्ध एक गुट के लोगों ने तोड़-फोड़ की थी। जिस युगल पर हमला किया गया था, वह पुलिस के पास गया, लेकिन उसे वहां से भगा दिया गया। ऐसे मामले में अब तक यही होता आया है। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाकर किस ऑफ लव डे मनाना शुरू कर दिया। जैसा कि नाम से ल...
मंगलवार, नवंबर 18, 2014
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गुजरात में नगरपालिकाओं और पंचायतों में मतदान को अनिवार्य बनाने की जद्दो-जहद का अंनतः पटाक्षेप हो ही गया। अब गुजरात के सभी मतदाताओं को शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों के चुनावों में अनिवार्यतः मतदान करना पड़ेगा। इस कानून का श्रेय भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही जाता है। उनके गुजरात के मुख्यमंत्री रहते इसे दो बार- दिसंबर 2009 और मार्च 2011 में पारित किय गया, किंतु तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के विरुद्ध मानती थीं और उन्होंने अप्रैल 2010 में इसे पुनर्विचार के लिए लौटा दिया था। नए राज्यपाल ओपी कोहली ने तीन वर्ष आठ महीनों ने लंबित उस कानून को स्वीकृति दे दी। ऐसी क्या बात है कि गुजरात में संघीय व्यवस्था के तीसरे तल अर्थात स्थानीय सरकारों में मतदान को अनिवार्य बनाने की जरूरत आन पड़ी? गुजरात में नगरपालिकाओं और पंचायतों के पिछले कई चुनावों के आंकड़ों को देखने पर लगता है कि वहां मतदान...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

अनिल पांडेय, जगदीश पंवार व अतुल चौरसिया को पहला आजादी पत्रकारिता पुरस्कार

First Azadi Award Winners

- 8 जनवरी को दिल्ली के पांच सितारा होटल में आयोजित समारोह के दौरान किए गए सम्मानित

- एटलस ग्लोबल इनिसिएटिव के वाइज प्रेसिडेंट टॉम जी. पॉमर ने ट्रॉफी प्रदान कर किया सम्मानित

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आज़ादी ब्लॉग

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मंगलवार, अक्टुबर 07, 2014
बच्चा पेड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा है; तुम क्या करोगे? तुम तत्काल डर जाओगे--हो सकता है कि वह गिर जाए, हो सकता है वह अपना पैर तोड़ ले...

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सोमवार, सितंबर 01, 2014
"यदि आप ऐसे राजनेताओं को वोट देते आ रहे हैं जो आपको मुफ्त (दूसरों के खर्च पर) चीजें देने का वादा करते हैं, तब जब वे आपके पैसे से स...

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बुधवार, अगस्त 27, 2014
विगत कुछ समय से पंजाब में ड्रग्स के सेवन करने वालों की संख्या में हुई वृद्धि ने शासन प्रशासन सहित स्थानीय जनता के माथे पर चिंता की...

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मंगलवार, अगस्त 26, 2014
जिन लोगों को ये लगता हो कि किसानों की समस्या का एकमात्र समाधान सब्सिडी है, तो उन्हें न्यूजीलैंड देश से कुछ सबक सीखना चाहिए..। न्यू...

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सोमवार, अगस्त 11, 2014
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत आठवीं कक्षा तक के बच्चों को फेल नहीं किया जा सकता है. ऐसे में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में हालत इत...

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