ताज़ा पोस्ट

Thursday, August 25, 2016

पिछले एक दशक में देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के तेज प्रयास देखने को मिले हैं। 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी प्रदान करने वाला 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009' (आरटीई एक्ट) सुधार के प्रयासों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) बनाने की कवायद भी सुधार का अगला चरण हैं। हालांकि इससे पहले सन् 1968 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बाद में सन् 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वार नई शिक्षा नीतियां लागू की गईं। वर्ष 1992 में इसमें कुछ छोटे-छोटे बदलाव भी किए गए। किंतु सभी शिक्षा नीतियों में कमोवेश एक बात उभयनिष्ठ थीं कि सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में और ज्यादा खर्च करना चाहिए।

आरटीई एक्ट भी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की बात करता है और इसके लिए विद्यालय के...

Thursday, August 25, 2016

आज अगर किसी से भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बात की जाय तो सब यही कहेंगे कि शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है, एक बाजार बन गया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है अगर इस बात में सच्चाई होती तो क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था की इतनी दुर्दशा होती? इतनी खामियां और नाकामियां होती? शायद नही क्योंकि बाजार या व्यवसाय की एक नैतिकता है जिसका आधार प्रतिस्पर्धा और ग्राहक संतुष्टि है। लेकिन ये दोनों ही मूलभूत तत्व भारतीय शिक्षा व्यवस्था से नदारद है। शिक्षा का अधिकार कानून आए एक अरसा बीत गया है। जितनी उम्मीदें लोगों और सरकार की इससे थीं उतनी फलीभूत नही हुईं। पहले से ही कंडम शिक्षा व्यवस्था का इसने और कबाड़ा किया है।

आज बात इसी से जुड़े एक पहलु पर जिसपर बहुत कम लोगों का ध्यान गया है। ध्यान गया है तो सिर्फ भुक्तभोगियों का जिनकी कोई सुनवाई नही है। उदाहरण के लिए बात दिल्ली की करूँगा...

Wednesday, August 24, 2016

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हमारे पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की राजधानी ढ़ाका से 70 किलोमीटर दूर एक गांव में रहने वाली फातिमा आम बच्चों की तरह ही है। कक्षा 10 में पढ़ने वाली फातिमा एक कपड़ा मजदूर की बेटी है। उसके वालिद की इतनी हैसियत नहीं कि उसकी पढ़ाई का खर्चा उठा सके। बावजूद इसके फातिमा पिछले दस सालों से हर रोज मुस्कुराते हुए स्कूल जाती है। उसकी पढ़ाई वहां की सरकार की वाउचर प्रणाली के कारण मजे से चल रही है। उसे हर महीने 36 डॉलर यानी 2800 टका वहां की करेंसी में मिलते हैं। उसकी पढ़ाई पर जो खर्च आता है उसे बांग्लादेश सरकार सीधे उसके बैंक खाते में डाल...

Thursday, August 18, 2016

- नौनिहालों के उज्जवल भविष्य के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म विकी पर शिक्षाविद, अध्यापक, अभिवावक, सिविल सोसायटी, स्कूल संचालक करा रहे हैं राय दर्ज
- शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सभी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सेक्टर्स की मांग को आवाज देने एक मंच पर आए सिविल सोसायटी संगठन

 देश की शिक्षा व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करने और इसमें आमूल चूल परिवर्तन करने के उद्देश्य से केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा नई शिक्षा नीति निर्धारित की जा रही है। नई शिक्षा नीति की महत्ता को देखते हुए सरकार द्वारा आम जन को इसमें भागीदार बनाने की भी पूरी कोशिश की जा रही है। इस बाबत गठित टीएसआर सुब्रह्मनियन कमेटी द्वारा ड्राफ्ट तैयार करने के बाद मंत्रालय लोगों से ईमेल के द्वारा सुझाव आमंत्रित कर रहा है। फिर भी लोग अपने नौनिहालों के उज्जवल भविष्य के लिए हर उपलब्ध मंच...

Thursday, August 11, 2016

भारत में शिक्षा के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। शिक्षा उपकर से लेकर न जाने क्या-क्या? पर हकीकत ये है कि सरकार जो पैसे खर्च करती हैं, उसका भारी दुरुपयोग होता है। क्यों न शिक्षा के लिए आवंटित पैसे सीधे-सीधे छात्रों को वाउचर के रूप में दे दिया जाए - पेश है इस पर एक पड़ताल।

आजादी की आधी सदी से अधिक गुजर जाने के बावजूद क्या हम शिक्षा के क्षेत्र में कुछ खास हासिल कर पाए हैं? सरकार चाहे जितनी डींगें हाँके, पर भारत का एक-एक बच्चा शिक्षा की दुरव्यवस्था से वाकिफ है। अब समय आ गया है कि हम सरकार के कार्य-कलापों का मूल्यांकन करें और व्यवस्था के हर खोट पर चोट करें। जागरूक लोग इस दिशा में सक्रिय हैं। दुनिया भर में व्यवस्था सुधार के नये-नये प्रयोगों का अध्ययन कर वे भारत की जरूरतों में फिट हो सकने योग्य नये-नये मॉडलों को बनाने में लगे हुए हैं। जरूरत...

Wednesday, August 03, 2016

अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि सभी मनुष्य तार्किक होते हैं अर्थात् वे हानि की अपेक्षा लाभ पसन्द करते हैं तथा तार्किक रूप से स्व-हित के लिए प्रयासरत रहते हैं। राजनीति विज्ञान में अधिकाँशतः गलत रुप से यह माना जाता है कि राजनैतिक बाज़ार के सभी अभिनेता अर्थात् राजनेता एवं नौकरशाह, निस्वार्थ भाव से जनहित के लिए प्रयासरत रहते हैं।

राजनैतिक अर्थशास्त्र या लोक-चयन सिद्धान्त वह सिद्धान्त है जो अर्थशास्त्र को राजनीति विज्ञान में शामिल करता है। अर्थशास्त्र में हम यह मानते हैं कि बाजार में मौजूद सभी पक्ष (व्यक्ति) तार्किक हैं तथा स्वहित के लिए प्रयासरत हैं। यदि हम इस मान्यता को राजनीति विज्ञान में प्रयुक्त करें और मान लें कि राजनैतिक बाजार के सभी पक्ष (व्यक्ति) भी स्व-हित के लिए कार्य कर रहे हैं, तो क्या होगा? परिणाम प्रदर्शित करते हैं कि-...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

आज़ादी ब्लॉग

Thursday, August 04, 2016
सहभागितापूर्ण लोकतंत्र के मूलमंत्र को आत्मसात करते हुए थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) ने शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय व...

Monday, August 01, 2016
जन्मदिन विशेषः "सही लोगों का चयन करना अच्छी बात है, लेकिन समस्याओं का समाधान इतने से ही नहीं होता। समस्याओं का समाधान गलत व्यक्ति...

Tuesday, July 26, 2016
आजादी के पूर्व से ही देश में शिक्षा के प्रचार प्रसार में बजट प्राइवेट स्कूल्स अर्थात लो फी प्राइवेट स्कूल्स का योगदान अत्यंत महत्व...

Tuesday, May 17, 2016
समाजवाद के 6 चमत्कार 1- किसी के पास काम नहीं, लेकिन कोई बेरोजगार नहीं 2- कोई काम नहीं करता, लेकिन पैसे सभी को मिलते हैं 3- पैसे...

Monday, May 09, 2016
सरकारों को कम से कम योजनाएं बनानी चाहिए। सरकारें जितनी अधिक योजनाएं बनाती हैं, लोगों के लिए व्यक्तिगत योजनाएं बनाने में उतनी अधिक...

Monday, May 02, 2016
- शिक्षा का अधिकार कानून ही बन रहा शिक्षा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा - आरटीई के दोषपूर्ण उपनियमों के कारण 1 लाख से अधिक स्कूलों पर...

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Thursday, April 21, 2016
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के माध्यम से देशभर में युवा सशक्तिकरण का अभियान पूरी लगन से जारी है। न सिर्फ केंद्र बल्कि राज्य सरका...

Tuesday, March 08, 2016
रूस में पैदा हुई विख्यात अमेरिकी उपन्यासकार, दार्शनिक, नाटककार व 'द फाउंटेनहेड (1943)', 'एटलस श्रग्ड (1957)' आदि जैसे बेस्ट सेलर क...

आपका अभिमत

क्या सेरोगेसी पर प्रतिबंध, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना है?

आज़ादी वी‌डियो

  जनवरी 1, 2009 को एटलस वैश्विक पहल की घोषणा करी गयी. टॉम पामर के नेतृत्व में शुरू हुई इस पहल क...

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