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मंगलवार, जनवरी 24, 2012
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माओ ने कहा था – सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। इसका तात्पर्य यह था कि क्रांति सशस्त्र संघर्ष के जरिये ही हो सकती है। भारत के माओवादी अच्छी तरह जानते हैं कि सशस्त्र संघर्ष के लिए अस्त्र-शस्त्र और हथियार खरीदने के लिए जेब भरी होना जरूरी है। उसीतरह बंदूक चलानेवालों का पेट भरा होना चाहिए तभी वह डटकर संघर्ष कर सकते हैं इसलिए माओवादी हर वैध और अवैध तरीके से पैसा जुटाकर अपनी तिजोरियां भरनें में लगे हैं। माओवदियों का आर्थिक साम्राज्य कितना बड़ा है इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि  कुछ अर्से पहले केंद्रीय गृहसचिव ने कहा था कि माओवादी हर साल 1600 से 2000 करोड़ रुपये लेवी के तौर पर वसूलते हैं।लेकिन जानकारों का कहना है कि यह आंकड़ा दोगुने से कम नहीं बैठेगा।वैसे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह का कहना है कि म...

सोमवार, जनवरी 23, 2012
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विश्वसनीय आंकड़ों विशेषकर पढाई की गुणवत्ता के बारे में आंकड़ों के अभाव के कारण शिक्षा में सुधार पर चल रही बहस बुरीतरह बाधित होती रही है। सरकारी आंकड़े सरकार द्वारा किए गए कामों पर फोकस करते हैं। स्कूली प्रणाली में कितनी राशि का आबंटन किया गया कितना खर्च हुआ आदि। वे हमें बताते है कि कि कितना धन आवंटित किया गया, कितने परकोटे, टायलेट बने, कितने शिक्षकों की सेवाएं ली गईं। लेकिन वे हमें वह बात नहीं बताते जिसका सबसे ज्यादा महत्व है कि पढ़ाई कितनी हुई।

पिछले कुछ महीनों में पीआईएसए और विप्रो तथा एजुकेशन इनिशिएटीव के हमारे स्कूलों जिनमें कुछ अव्वल स्कूल भी शामिल हैं की पढ़ाई की गुणवत्ता के बारे में दो अध्ययनों ने हमारे स्कूलों में पढाई के कमजोर स्तर को उजागर किया था। एएसईआर की 2011 की रपट बहुत सही समय...

शुक्रवार, जनवरी 20, 2012
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  न होने की तुलना में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हजारों गुना बेहतर होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आत्यंतिक महत्व को प्रतिपादित करने के लिए चार्ल्स ब्रेडला के इस उद्धरण का अक्सर हवाला दिया जाता है। लेकिन हमारे देश में उल्टी गंगा बह रही है। हमारे देश की सरकार और अदालतें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कथित दुरूपयोग को रोकने के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही नकेल कसने पर आमादा हैं। वे शायद यह भूल गए हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। उसके बगैर लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हम अपने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं लेकिन हमारे देश की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों में अक्सर तानाशाहों की आत्माएं घुस जाती हैं और वे बोलने की आजादी को जंजी...

बुधवार, जनवरी 18, 2012
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मैं समाजवाद का समर्थक नहीं हूं क्योंकि स्वतंत्रता ही मेरे लिए परम मूल्य है।उससे ऊपर कुछ नहीं । और समाजवाद बुनियादी तौरपर स्वतंत्रता के खिलाफ है। उसे होना भी चाहिए ,यह अपरिहार्य है क्योंकि समाजवाद की कोशिश किसी अप्राकृतिक चीज को अस्तित्व में लाने की है।

मनुष्य समान नहीं है। वे विशिष्ट हैं। वे समान कैसे हो सकते हैं ? सभी कवि और सभी पेंटर नहीं होते। हर व्यक्ति के पास विशिष्ट प्रतिभा होती है। कुछ लोग संगीत का सृजन कर सकते हैं और कुछ लोग धन का। मनुष्य  को अपने अनुसार बनने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की जरूरत होती है। समाजवाद राज्य की तानाशाही है। यह जबरन थोपी कई आर्थिक व्यवस्था है। यह उन लोगों को समान बनाने की कोशिश है जो समान नहीं है। जो लोग अलग-अलग आकार के हैं उन्हें वह कांट छांटकर एक ही आकार का...

मंगलवार, जनवरी 17, 2012
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इन  दिनों देश की हर आर्थिक समस्या चाहे वह आसमान इस छूती महंगाई हो या बढ़ती बेरोजगारी या मंदी  के लिए पूंजीवाद ,नवउदारवाद और वैश्वीकरण को दोषी ठहराना नवीनतम बौद्धिक फैशन बन गया है। इस भेड़चालवाली बौद्धिकता के दौर में दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद के विचार ताजा हवा के झोंके की तरह लगते हैं। उनके विचारों की  विशेषता यह है कि वे परंपरागत चिंतन की लीक से हटकर सोचते हैं। जब राजनीतिक और बौद्धिक जगत में बहुजन या ओबीसी – दलित गठबंधन को विकल्प की तरह पेश किया जा रहा था तब उन्होंने कहा कि यह गठबंधन लंबे समय तक चल ही नहीं सकता क्योंकि खासकर ग्रामीण क्षेत्र में दलित और ओबीसी एक दूसरे के सबसे  बडे विरोधी हैं। इसके मुकाबले दलित-सवर्ण गठबंधन ज्यादा कारगर रहेगा। ऐसा कहना एक तरह से बसपा के संस्थापक कांशीराम के बहु...

शुक्रवार, दिसम्बर 30, 2011
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पिछले लगभग एक माह की अवधि में हमने एक अद्भुत तमाशा देखा, जिसमें भारत के जनतंत्र की जीत हो सकती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 24 नवंबर को सरकार ने एक साहसी और परिवर्तनकारी आर्थिक सुधार की घोषणा करते हुए रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दी। इसके बाद देशभर में राजनीतिक फलक पर तूफान-सा उठ खड़ा हुआ और अंतत: सरकार को इस सुधार को स्थगित करना पड़ा।

लेकिन इस पूरी बहस के दौरान किसी ने यह नहीं पूछा कि एेसा क्यों है कि चीन सहित दुनियाभर के दर्जनों देश रिटेल में विदेशी निवेश का खुलकर स्वागत करते हैं? सरकार की हार का यह मतलब है कि भारत के उपभोक्ताओं ने कम कीमतों पर किराना पाने का मौका गंवा दिया। किसानों ने बेहतर रिटर्न पाने का मौका गंवा दिया।

अब भारत की पचास फीसदी से लेकर दो तिह...

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फ्रीडम कारवां: पूंजीवाद की नैतिकता

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फ्रीडम कारवां:पूंजीवाद की नैतिकता
23 जनवरी - 10 फरवरी 2012
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मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

आज़ादी ब्लॉग

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बीमारू राज्यों का अच्छा प्रदर्शन
गुरूवार, दिसम्बर 29, 2011

उत्तर भारत के हिंदीभाषी राज्यों को आमतौर पर पिछड़ा मान लिया जाता है। सामाजिक विकास के तमाम पैमानों पर ये राज्य पिछड़े हुए हैं,...


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अल्पसंख्यकों पर दांव
बुधवार, दिसम्बर 28, 2011

कांग्रेस ने इस बार गजब का दांव मारा है| यह दांव वैसा ही है, जैसा कि 1971 में इंदिराजी ने मारा था| गरीबी हटाओ! गरीबी हटी या नहीं...


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जल प्रदूषण की मार
शुक्रवार, दिसम्बर 23, 2011

पर्यावरण संबंधी तमाम अध्ययन देश में जल प्रदूषण के दिनोंदिन भयावह होते जाने के बारे में चेताते रहते हैं। अब सीएजी यानी नियंत्रक...


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लोकतंत्र पर कैसी लगाम
मंगलवार, दिसम्बर 20, 2011

महातिर मोहम्मद अकेले नहीं हैं, जिन्हें लगता है कि भारत में ‘जरूरत से ज्यादा’ लोकतंत्र है। मलयेशिया के पूर्व...


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राजस्थान के करौली जिले में सड़क चौड़ा करने के नाम पर, सरकार ने इंदिरा आवास योजना के तहत गरीबों को मुहय्या कराये गए घर ही तोड़ दिए. इस वीडिओ में सुनीता कसेरा बता रहीं हैं कि पंचायत समिति के दफ्तर तक मार्ग सुलभ करने के लिए सरकार ने रास्ते में पड़ने वाली सड़क को चौड़ा करने का फैसला किया. पर इस बारें किसी को भी पूर्व में सूचना...