विशेष लेख

शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार की महत्वपूर्ण पहल थी शिक्षा का अधिकार कानून 2009।इस क्षेत्र के कई पर्यवेक्षकों और विशेषज्ञों की दलील थी कि  इस कानून में कई प्रमुख समस्याएं हैं।यह कानून बच्चों और अभिभावकों के हितों पर फोकस करने के बजाय सार्वजनिक क्षेत्र के आश्रित सेवा प्रदाताओं के हितों पर फोकस करता है। शैक्षणिक प्रक्रिया के साधनों पर ज्यादा ध्यान देता है भले ही उसके नतीजे कुछ भी हों। यह उन प्रायवेट स्कूलों को दंडित करता है जिनके पास साधनों की कमी होती है इस बात का खयाल किए बगैर कि

Published on 22 Apr 2012 - 23:31

डा.टॉम जी पॉमर पूंजीवादी दर्शन और नैतिकता के मुखर प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। वे जितने अच्छे लेखक है उतने ही प्रभावशाली वक्ता भी। उनकी पुस्तक –रियलाइजिंग फ्रीडम : लिबरेशन थ्योरी,हिस्ट्री एंड प्रैक्टिस – उनके  स्वतंत्रता संबंधी विचारों का सशक्त प्रतिपादन है।पामर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से राजनीति शासत्र में डाक्टरेट की है  और वाशिंगटन स्थित कैटो इंस्टीटयूट में सीनियर फैलो हैं। इसके अलावा वे एटलस नेटवर्क के अंतर्राष्ट्रीय प्रोग्राम के कार्यकारी उपाध्यक्ष है। हाल ही में वे अपनी

Published on 14 Feb 2012 - 17:49

पिछले दिनों स्टीवेन पिंकर जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल में भाग लेने आए थे जहां उन्होंने अपने भाषण में जो कहा उसका लब्बोलुबाब यह था कि आदमी अब इंसान बनता जा रहा है। भयानक हिंसक युद्ध पहले से कम हो गए हैं और इसके साथ समाज में हिंसा कम होती जा रही है। उनका यह दावा नया नहीं है। उन्होंने अपनी बहुचर्चित पुस्तक – द बेटर एजिंल्स आफ अवर नेचर-व्बाय वायलेंस इज डीक्लाइंड- में भी यही दावा किया है। उससे चौंकानवाली बात यह है पिंकर इसके लिए तीन कारकों के त्रिकोण को कारणीभूत मानते हैं वे हैं –मुक्त अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र और बाहरी

Published on 2 Feb 2012 - 18:37

चार दिसंबर को रूस में “चुनाव” हुए। मैंने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, क्योंकि यह महज समय की बर्बादी थी, जबकि केंद्रीय चुनाव आयोग इसे “स्टेट ड्यूमा के लिए चुनाव” बता रहा था। उस दिन तक यह स्वयंसिद्ध तथ्य की तरह था कि सत्तारूढ़ यूनाइटेड रशिया पार्टी की झोली में 10.8 करोड़ मतदाताओं में से 4.5 से 5 करोड़ वोट गए। अब इसे मजाक बनाया जा रहा है और यहां तक कहा जा रहा है कि कुछ जिलों में तो उसे मतदाताओं की संख्या से भी ज्यादा वोट मिले।

चार दिसंबर को मेरे जिन साथियों ने मतदान करने का

Published on 27 Dec 2011 - 16:40

कैबिनेट ने खाद्य सुरक्षा बिल को रविवार को स्वीकृति दी, लेकिन भारतीय जनसाधारण को सस्ते भोजन की गारंटी देने वाले इस बिल पर मुहर लगना फिलहाल दूर की कौड़ी लगता है। फिर भी यह बिल  अभी से ही उन अर्थशास्त्रियों को भयभीत कर रहा है, जो इसे खास तौर पर इस समय सरकार पर एक बड़े आर्थिक भार के रूप में देखते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि कैबिनेट ने इस बिल को हरी झंडी अगले साल की शुरूआत में पांच राज्यों में होने वाले चुनावों के मद्देनज़र दिखाई। भारतीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक विधायिका को विचार करने हेतु

Published on 22 Dec 2011 - 18:37

भारत और वैश्विक बिरादरी इस बात को लेकर चर्चा करने लगे हैं कि जिस जनसांख्यिकीय मोर्चे पर भारत लाभ की स्थिति में है, देश को इस सदी के मध्य तक उसका लाभ उठाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या प्रभाग के आंकड़े तो वास्तव में यह दर्शाते हैं कि वर्ष 2040 तक दक्षिण एशिया की कुल जनसंख्या में 15 से 64 साल की आयु वर्ग के कामकाजी समूह की हिस्सेदारी बढऩे वाली है और नवनिर्माण के दौर से गुजर रहे अफगानिस्तान में वर्ष 2075 तक ऐसा हो पाएगा।

असल चुनौती इस आबादी को पोषण और शिक्षा के जरिये बेहतर नागरिक के रूप में ढालने

Published on 15 Dec 2011 - 17:15

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