Corruption

दिल्ली में भाजपा की हार के बाद मोदी सरकार राजनीतिक साहस की कमी से जूझ रही है। इसलिए सरकार में यह साहस नहीं रहा कि वह मनरेगा जैसी नाकाम रोजगार योजनाओं को बंद कर सके। भाजपा को डर है कि अगर उसने इस तरह की योजनाओं को बंद किया तो उन्हें गरीब विरोधी करार दे दिया जाएगा।

इतिहास गवाह है कि दुनिया भर की सरकारों द्वारा जिस भी चीज के खिलाफ मुहिम छेड़ी गई उस चीज में उतनी ही बढ़ोत्तरी हुई। सरकारों ने भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, नशा, आतंकवाद जिसके खिलाफ भी युद्ध छेड़ा दुनिया में उक्त चीजों में कमी आने की बजाए वृद्धि ही हुई है। आशा है कि सरकार आने वाले समय में धन के खिलाफ युद्ध छेड़े ताकि देश में धन की मात्रा में वृद्धि हो..

यह जितना उत्साहजनक है कि अब सीबीआइ को भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे नौकरशाहों के खिलाफ जांच आगे बढ़ाने के लिए सरकारी मंजूरी का इंतजार नहीं करना पड़ेगा वहीं यह उतना ही निराशाजनक कि इसे उचित ठहराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ को आगे आना पड़ा।

भारत में भ्रष्टाचार का बढ़ना न केवल एक बड़ी चिंता की बात, बल्कि एक ऎसा पक्ष है, जिस पर ज्यादातर भारतीयों को शर्म का अहसास हो रहा है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि भारत में पारदर्शिता और कम हो गई है। भारत वर्ष 2007 में 72वें स्थान पर था, लेकिन अब घटती पारदर्शिता की वजह से 95वें स्थान पर आ गया है।

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टीम अन्ना की छवि धूमिल हो रही है। ऐसा किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल और भूषणों के गैर-गांधीवादी व्यवहार के कारण हुआ है। कांग्रेस व अन्य पार्टियों के नेता इस बात पर चुटकी ले सकते हैं, लेकिन उन्हें यह मुगालता कतई नहीं पालना चाहिए कि भ्रष्टाचार को लेकर जनता का गुस्सा राई भर भी कम पड़ा है। अन्ना हजारे द्वारा आम जन के इस गुस्से को बखूबी उभारकर एक दिशा दे दी गई है, लेकिन इसकी ताकत जनलोकपाल के कहीं आगे तक जाती है। फिलहाल, इससे घटिया आरोप-प्रत्यारोप का दौर खत्म नहीं होगा।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

भ्रष्टाचार को लेकर मध्य वर्ग और युवाओं में भारी आक्रोश है। इससे आज देश का एक बड़ा जनमानस प्रभावित और परेशान है. इसलिए भ्रष्टाचार को लेकर लड़ाई लड़ रही सिविल सोसाइटी की मांगों के प्रति सरकार का टकरावपूर्ण रवैया किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह सरकार की हठधर्मिता का परिचायक है. यह संसदीय लोक प्रक्रिया की दृष्टि से भी हटकर है. देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान ने यह अधिकार दिया है कि वह न केवल अपनी मांगें कर सकता है, बल्कि इससे संबंधित प्रस्ताव अथवा बिल सरकार के पास विचारार्थ प्रस्तुत कर सकता है. इस प्रस्ताव अथवा बिल को मानना या न मानना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और वह चाहे तो इसे संसद में रखे अथवा न रखे?

अब तक किसी भी स्वतंत्रता दिवस से पहले भारत का मूड इतना विषादग्रस्त नहीं रहा है। विडंबना है कि पिछला एक दशक भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे सुनहरा काल रहा है। देश विस्मयकारी रूपांतरण के दौर से गुजर रहा है। दशकों से देश प्रगति के पथ पर जा रहा है। देश का प्रत्येक नागरिक तो इस संपन्नता में भागीदारी नहीं कर सका, किंतु काफी बड़ी संख्या में भारतीयों ने महसूस किया कि उनका जीवन उनके माता-पिता के जीवन से बेहतर है और उनके बच्चे उनसे भी बेहतर जीवन जिएंगे। पश्चिम में बुझती आकांक्षाओं के विपरीत हमारी महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग पहले पैदल चलते थे अब साइकिल की सवारी कर रहे हैं, जिनके पास साइकिल थी वे अब मोटरसाइकिल खरीद रहे हैं और जिनके पास मोटरसाइकिल थी, अब कार में घूम रहे हैं। अगर अब सरकार देश के सभी नागरिकों को अच्छे स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और सुशासन उपलब्ध करा सके तो देश के सभी तबकों का उद्धार हो जाएगा। किंतु रोजमर्रा की घटनाएं इस शानदार तस्वीर को मुंह चिढ़ा रही हैं।

Author: 
गुरचरण दास

नेताओं को समझना होगा कि भारत का नया मध्यवर्ग आत्मसम्मान के लिए लड़ने को तैयार है. वह अपने गुस्से को खुद जाहिर कर रहा है. जन भावना का दबाव राजनीतिक व्यवस्था व नेताओं को अस्थिर कर देगा या फ़िर एक वास्तविक राजनीतिक सुधार की नींव रखेगा.

एक साल पहले किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि कई मंत्री, राजनेता, वरिष्ठ अधिकारी और सीइओ तिहाड़ जेल में होंगे और सुनवाई का सामना कर रहे होंगे. भारत में भ्रष्टाचार अब कोई नयी खबर नहीं है, यह आम प्रतिक्रिया अप्रत्याशित और एक पहेली की तरह है. यदि ऐसा है तो फ़िर घूसखोरी के खिलाफ़ अंतहीन आंदोलन क्यों हो रहे हैं? दरअसल, आज खुद के प्रति आश्वस्त और जिज्ञासु नया मध्यवर्ग तेजी से उभर रहा है. इस मध्यवर्ग ने आत्मसम्मान और गरिमा हासिल की है और अब इसे मीडिया और राजनेताओं के द्वारा भी गंभीरता से लिया जा रहा है. अनुमान है कि मध्यवर्ग 2020 तक भारत की आबादी का 50 प्रतिशत तक हो जायेगा. तब हमारी राजनीति भी बदल जायेगी. हम आज जिन घटनाओं से रूबरू हो रहे हैं, वे आने वाले बड़े बदलाव के ट्रेलर मात्र हैं.

Author: 
गुरचरण दास

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