समतावादी आखिर चाहते क्या हैं? - एलिजाबेथ एंडरसन

मैं विल विलकिनसन की इस बात से सहमत हूं कि अगर अलग से सोचा जाए तो समाज में आय का वितरण हमें इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता पाता कि समाज न्यायपूर्ण है या अन्यायपूर्ण। फिर भी एक समतावादी होने के नाते मैं सोचती हूं कि जब एक कारण के संदर्भ में सोचा जाता है तो धन और आय का काफी महत्व होता है। आर्थिक असमानता उस वक्त आपत्तिजनक हो जाती है जब यह लोगों, खासतौर पर कमजोर तबके को बेहतर हालात में रहने की स्थितियों के बावजूद बुरे हालात में रहने पर मजबूर करती है। यह उस वक्त भी आपत्तिजनक है जब साफ दिखाई देता है कि सरकार का झुकाव भी बेहतर तबके की ओर ही है। अमेरिका में तो आर्थिक असमानता इन दोनों ही कारणों से आपत्तिजनक है।

आर्थिक असमानता के लोगों की बेहतरी में सेंध लगाने के कई तरीके हैं। (मैं यह दावा नहीं करती कि दूसरों के बेहतर होने की केवल जागरुकता ही लोगों को बुरा बना देती हैः मैं वास्तविक शिकायत को ईर्ष्या का कारण नहीं मानता।) जगह की कमी के लिए मैं इस लुभावने सबूत को परे ही रखूंगी कि आर्थिक असमानता लोगों को बीमार कर देती है, उनकी जीवन दर को घटा देती है, तनाव और हिंसा में बढ़ोतरी करती है और सामाजिक विश्वास को ठेस पहुंचाती है। यहां मैं तर्क दूंगी कि आर्थिक असमानता

  1. कमजोर तबके पर प्रभुत्व का खतरा बढ़ा देती है,
  2. उन्हें दोषारोपण के लिहाज से कमजोर बनाती है और
  3. सरकार को कमजोर तबके की कीमत पर बेहतर तबके का पक्ष लेने का मौका दे देती है।

प्रभुत्व की समस्या की बात करें। लोगों की सौदे की शक्ति (bargaining power) उनकी तुलनात्मक निकास लागत (relative exit cost) से जुड़ी है। यह अधिकांशतया अमीरों को अन्य पर प्रभुत्व का मौका देती है। महिलाएं घरेलू हिंसा और नियंत्रण के लिए मजबूर होंगी अगर उनकी अपने जीवनसाथी को छोड़ने की कीमत उनके भौतिक जीवन में ज्यादा बड़ी गिरावट लाएगा। कम पारिश्रमिक वाले कर्मचारी कामकाज के संभावित घंटों को लेकर ज्यादा सौदेबाजी नहीं कर सके क्योंकि नौकरी छोड़ना उनके कूवत की बात नहीं। यह नियोक्ता को कर्मचारियों की जिंदगी से खिलवाड़ का मौका दे देता है, क्योंकि उनके कामकाज के वक्त में मनमाना परिवर्तन उन्हें बच्चों की देखरेख (अधिकांशतया अनुपलब्ध या बहुत महंगा) के लिए जद्दोजहद करने पर मजबूर कर देता है। या उनको कम्युनिटी कॉलेज कोर्स से हटाने पर मजबूर कर देता है, जिससे ट्यूशन पर उनके द्वारा खर्च की गई रकम अप्रतिभूत कर्ज (deadweight loss) बन जाती है और बेहतर जीवन के उनके सपने चकनाचूर हो जाते हैं।

कर्मचारियों के समय पर ऐसा अत्याचारी नियंत्रण अपमानजनक होता है। नेबिस्को के एक प्लांट में, महिला कर्मचारियों के उत्पादन के काम के दौरान बाथरुम जाने तक पर प्रतिबंध  था और उन्हें डायपर्स पहनकर रखने को कहा गया था।

आर्थिक असमानता निंदा का भी कारण बन सकता है। एडम स्मिथ का यह निरीक्षण काफी प्रसिद्ध है, कि जब खपत का आम स्तर बढ़ता है, तो इसके साथ ही हर व्यक्ति की सार्वजिनक स्थान पर जाने के लिहाज से स्तर हासिल करने के लिए खपत की जरुरत भी बढ़ती हैः

उदाहरण के लिए, एक लिनन शर्ट जीवन की जरुरत नहीं है। ग्रीक और रोमन इसके बगैर ही जिए, जहां तक मेरी राय है काफी आराम के साथ, हालांकि उनके पास कोई लिनन नहीं था। लेकिन आज के वक्त में, यूरोप के बड़े हिस्से में एक अच्छे दिहाड़की वाला बिना लिनन के शर्ट के लोगों के सामने जाने में शरमाएगा। क्योंकि लिनन शर्ट का पहने न होना उसकी गरीब होने की बात उजागर करेगा, जिस स्थिति में बुरे व्यवहार के बगैर कोई पहुंच ही नहीं सकता। इस तरह से संपन्न लोगों की किसी बात की खपत कमजोर तबके के लोगों के जीवनयापन का खर्च बढ़ा देती है। सम्मानजनक  रुपरंग की मांग उन इलाकों में बहुत ज्यादा हो सकती है, जहां पर ईर्ष्याभरी प्रतिस्पर्धा ने साफ तौर पर खपत की संस्कृति को जन्म दे दिया हो। 2008 में डॉक्यूमेंटरी किड्स+मनी, में लॉरने ग्रीनफील्ड ने लॉसएंजिल्स के सभी वर्गों के किशोरों में खपत की प्रतिस्पर्धा को दर्शाया है, जिनके कारण कई बार तो कमजोर तबके के माता-पिता आर्थिक तौर पर तबाह हो जाते हैं। एक अकेली मां, जो अपनी बेटी को सामाजिक तौर पर स्वीकृत परिधान पहने देखना चाहती है अपने तमाम किस्म के उपयोगी बिलों का भुगतान नहीं कर पाती क्योंकि उसने अपनी पूरी रकम बेटी की महंगी टी-शर्ट खरीदने पर खर्च कर डाली।

अंत में, आर्थिक असमानता सरकार को मजबूत तबके के बीच लोकप्रिय और कमजोर तबके में अलोकप्रिय बनाती है। लैरी बारटेल्स के एक ताजा अध्ययन से पता चलता है कि कम आय वाले मतदाताओं (constituent) की प्राथमिकताओं का सीनेटर के मतों पर कोई प्रभाव नहीं होता, मध्य आय वर्ग का प्रभाव मध्यम होता है जबकि अधिक आय वाले मतदाताओं का प्रभाव भी अधिक होता है। (उनकी यह खोज डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों ही सीनेटरों पर लागू होती है)।

आखिर कैसे धनी लोगों की प्राथमिकताएं गरीबों के लिए नुकसान का सबब बन सकती हैं? कुछ मामलों में अनुदान और एकाधिकार विशेषाधिकार (monopoly privilegeas) सरकार द्वारा अमीरों को दे दिए जाते हैं। 1990 के मंजूर आईपी और कम्युनिकेशन कानूनों पर विचार करें, जिनके कारण कॉपीराइट की शर्तों को विस्तार मिला, ब्रॉडकास्टिंग के मालिकाना हकों का एकीकरण हुआ और वर्तमान ब्रॉडकास्टरों को ढेर सारा सार्वजनिक स्पेक्ट्रम दे डाला गया। अन्य मामलों में, सरकार धनी लोगों को कई ऐसे कानूनों से बचाकर रखती है जो मूलतः गरीबों के संरक्षण के लिए बने हैं। यह पता चलने के बाद कि वाल-मार्ट ने बालश्रम कानून का दर्जनों बार उल्लंघन किया है, राष्ट्रपति बुश के अधीन कार्यरत श्रम विभाग ने आगामी उल्लंघन के किसी भी निरीक्षण से पहले 15 दिन पहले नोटिस देने पर सहमति जताई। यानी कि उसे कानून तोड़ने की बात अधिकारियों से छिपाने के लिए ज्यादा वक्त मिल गया। यह कोई अपवाद नहीं है। कई नियोक्ता दंड के बिना ही कम वेतन वाले अपने कर्मचारियों से उनका हक चुराते हैं। एक ताजा अध्ययन के अनुसार कम वेतन पाने वाले एक चौथाई कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन से भी कम वेतन मिलता है। कई को काम के बीच में भोजन के लिए अवकाश नहीं दिया जाता, जो उनका कानूनी अधिकार है। उनको काम के निर्धारित वक्त से ज्यादा काम कराकर भी ओवरटाइम नहीं दिया जाता, उनकी टिप्स रख ली जाती है और श्रम कानून के उल्लंघन को जारी रखते हुए उन पर गैरकानूनी तरीके से जुर्माना भी किया जाता है। वेतन के दिन मिलने वाले कर्ज (payday loan) को सूदखोरी कानून (usury law) से लगभग छूट मिली हुई है। कई सालों तक, छात्रों को कर्ज देने वाली कंपनियों को 9.5 फीसदी की दर से ब्याज देती रही, हालांकि उस वक्त की मौजूदा ब्याज दर काफी कम थी और सरकार ने कर्ज की गारंटी ले रखी थी, जोखिम को लेकर किसी भी तर्क का निवारण करते हुए (obviating any rationale for a risk premium)। इस बेतुके अनुदान को समाप्त करने के लिए कांग्रेस द्वारा कानून बना दिए जाने के बाद भी बुश प्रशासन इस दिशा में कुछ भी करने में नाकाम रहा। यहां तो मामला करदाताओं को चूना लगाते हुए रईसों को अरबों डॉलर देने का है।

फिर भी सरकारी अनुदानों और किराये की उम्मीद लगाए बैठे रईसों पर ही ध्यान केंद्रित करना, उन बातों के बारे में संकीर्ण नजरिया ही देता है जो तौर-तरीके अमीरों द्वारा सरकारी नीतियों को अपने हक में करने के लिए अपनाए जाते हैं। निश्चित तौर पर कमजोर तबके की कीमत पर। आर्थिक असमानता बढ़ने के साथ ही, धनी लोग कमजोर तबके के साथ साझा हितों में कमी लाते जाते हैं। क्योंकि वे कई अत्यावश्यक सामान खरीदते हैं-स्वास्थ्य बीमा, शिक्षा, सुरक्षा सेवा, परिवहन, मनोरंजन की सुविधाएं-व्यक्तिगत तौर पर निजी सेक्टर से या फिर इन सामानों को निजी तौर पर तैयार समुदाय विशेष या फिर ऐसी म्युनिसिपालिटियों से जो ऐसे कायदे-कानून रखती हो जिसमें कुछ क्षेत्रों से गरीबों को परे ही रखा जाता हो। साथ ही वे इन सभी बातों को ज्यादा आम जनता को उपलब्ध कराए जाने का भी मुखर विरोध करते हैं। इसी के साथ-साथ, वे जिस तरह से इस सामान को अपने लिए उपलब्ध कराते हैं, उससे भी गरीबों की इसे हासिल करने की लागत बढ़ जाती है। जब धनी लोग सार्वजनिक वाहन प्रणाली को अपना वाहन होने के कारण खारिज कर देते हैं, तो कम बेहतर तबके के लोगों को भी कार खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। जब धनी लोग बच्चों की पढ़ाई पर ज्यादा खर्च करते हैं तो गरीबों को भी अपने बच्चों को जिंदगी में लड़ने के काबिल बनाने की उम्मीद में ऐसा ही करना पड़ता है। चूंकि म्यूनिसिपालिटी द्वारा किया गया क्षेत्रीकरण वर्ग के आधार पर अलग किए गए शहरों को जन्म देता है, कमजोर वर्ग के लोग भी धनी लोगों के इलाकों में उपलब्ध सुविधाओं से कमजोर सुविधाएं अपने यहां पर भी मुहैया कराने के लिए खर्च करने पर मजबूर हो जाते हैं।

विलकिंसन के खपत में असमानता के सबूत इन तथ्यों का जिक्र करने से रह जाते हैं, क्योंकि वे केवल निजी माल की व्यक्तिगत खपत की ओर ही देख रहे हैं, न कि उनकी सार्वजनिक तौर पर मुहैया कराई जा रही वस्तुओं की खपत की ओर। फिर भी गरीब लोगों के लिए बाजार में उपलब्ध उपभोक्ता सामग्री का इस्तेमाल-जो कि उसके लिए बड़ी बात है-जो सभी को इतनी आसानी से उपलब्ध है, जनता और सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध सामान के सामने फीका पड़ जाता है। एक कम अपराध वाले, व्यवस्थित, प्रदूषण मुक्त माहौल, बिजली-पानी के कट से दूर, परित्यक्त जमीन, दीवारों पर लिखने से बरबाद इमारतों, खुली ड्रग आपूर्ति, वेश्यावृत्ति, गैंग के बीच रहना, सार्वजनिक पार्क का होना जहां बच्चे सुरक्षित तौर पर खेल सकें, अच्छे फुटपाथों, सड़कों तक पहुंच, अच्छी नौकरियों तक पहुंचाने वाली स्कूली शिक्षाः इसका मूल्य कितने सेलफोन और महंगे जूते होगा? इस बात की गारंटी कि अगर निर्दोष होंगे तो पुलिस सम्मान देगी, न कि अपराधी की तरह देखेगी, कानून से संरक्षण मिलेगा प्रताड़ना, आरोप, मुकदमेबाजी नहीं-इसकी तुलना किसी भी उपभोक्ता सामग्री से नहीं की जा सकती। लेकिन इन सार्वजनिक सामानों तक पहुंच तुलनात्मक दौलत पर निर्भर है। जैसे-जैसे दौलत की असमानता बढ़ती जाती है, ऐसी सामग्री गरीब लोगों की पहुंच से बाहर होती जाती है।

विलकिंसन कहते हैं, 'यह मानने के लिए ढेर सारे कारण हैं कि अमेरिका में सबकुछ कुछ लोगों के खिलाफ है। परिणामस्वरूप, लाखों लोग अपनी काबिलियत से कम ही काम कर रहे हैं।' मैं उनके इस मत से पूरी तरह से सहमत हूं। मैं विलकिंसन से इस बात पर भी सहमत हूं कि इस स्थिति से निपटने के लिए हमें कारणों के बारे में सही जानकारी हासिल करनी होगी और अन्याय के मूल कारणों पर हमला बोलना होगा, महज बातें ही करते रहने के। मुझे आशंका है कि हम भी इस बात से सहमत हैं कि सही कारणों की खोज सरकार के काम (या नाकारापन) की पहचान करेगी, जो पूर्वाग्रह (stacked deck) है। लेकिन मेरा सुझाव है कि आर्थिक असमानता भी पूर्वाग्रह का एक कारण है, क्योंकि यह प्रभावशाली लोगों को अपने हितों को साधने के लिए सरकार को प्रभावित करने के लिए प्रेरित करती है। निश्चित तौर पर गरीबों की कीमत पर। दौलत में असमानता बढ़ने के साथ ही सरकार की सुरक्षा, समृद्धि और सभी को मौका देने की प्रोत्साहन भरी योजनाओं में अमीरों की रुचि कम होती जाती है। इसकी जगह वे दौलत से मिली लाभदायक स्थिति का इस्तेमाल प्रचार अभियानों में चंदे जैसे कामों से अधिकारियों तक पहुंच बनाने में करने लगते हैं। साथ ही वे कम फंड वाली सार्वजनिक हितों की योजनाओं को गुटबाजी के जरिये समाप्त करा देते हैं। इस तरह से वे आम लोगों की नीतियों की दशा और दिशा तय करने वाले बन जाते हैं। वीटो जैसी ताकत का इस्तेमाल वे वंचित लोगों के लिए प्रावधानों को सीमित करने में और अपने लिए विशेषाधिकार-एकाधिकार, उद्योगों को अनुदान और कमजोर तबके को अमीर तबके से संरक्षण देने वाले कानूनों से राहत हासिल करने में करते हैं। इस तरह से आर्थिक असमानता कमजोर तबके को नुकसान पहुंचाती है और उनको दोयम दर्जे का नागरिक बना देती है।

 


एलिजाबेथ एंडरसन आर्थर एफ. थूरनाऊ प्रोफेसर और दर्शनशास्त्र और महिला विषयों में जॉन रॉल्स कॉलेजियट प्रोफेसर हैं। उनका काम राजनीतिक सिद्धांतों, राजनीतिक दर्शन में समानता और अमेरिकी कानून, नस्लीय भेदभाव, बाजार की नैतिक सीमा, मूल्य के सिद्धांत और उचित चयन (परिणामवाद और उचित चयन के आर्थिक सिद्धांतों के विकल्प), जॉन स्टुअर्ट मिल और जॉन ड्यूवी के दर्शन, नारीवादी ज्ञानमीमांसा (feminist epistemology) और विज्ञान के दर्शनशास्त्र पर केंद्रित रहा है। उन्होंने किताब वैल्यू इन एथिक्स एंड इकानॉमिक्स के लेखन के अलावा एथिक्स, कोलंबिया लॉ रिव्यू, फिलॉसॉफी एंड पब्लिक अफेयर्स जैसी पत्रिकाओं के लिए भी लेख लिखे हैं। हारवर्ड यूनिवर्सिटी से पी.एचडी. करने वाली एलिजाबेथ ने दर्शनशास्त्र में स्वार्थमोर कॉलेज से बी.ए. किया था।