बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत आदर्श नियमः सीसीएस विधायी विश्लेषण 4

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम 2009 दरअसल 86वें संवैधानिक संशोधन के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के सार्वभौमिक अधिकार को सुनिश्चित करने की ही एक वैधानिक कोशिश है। इसके मुख्य बिंदु हैं-

  • 6 से 14 वर्ष तक की आयु के हर बच्चे को प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक अपने घर के पास स्थित स्कूल में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है।
  • सरकारी मदद पाने वाले निजी स्कूलों को कमजोर वर्गों और पिछड़े तबके के 25 फीसदी बच्चों को प्रवेश देना होगा।
  • निजी गैर अनुदानित स्कूलों को छोड़कर सभी स्कूलों का प्रबंधन स्कूल प्रबंधन कमेटियों द्वारा किया जाएगा, जिसके 75 फीसदी सदस्य छात्रों के माता-पिता और पालक होंगे।
  • सरकारी स्कूलों को छोड़कर सभी स्कूलों को तीन साल के भीतर तय नियम और मापदंड अपनाने होंगे, वरना उन्हें बंद कर दिया जाएगा।

फरवरी 2010 में अंतिम तौर पर तैयार आरटीई आदर्श नियम (RTE model rules) राज्य सरकारों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू करने के लिए दिशानिर्देश का काम करता है। वैसे कानून को लागू करने में ज्यादा सफलता के लिए इन नियमों में कुछ पर पुनर्विचार की जरुरत है। सीसीएस का स्कूल विकल्प अभियान (The School Choice Campaign of CCS) इस महत्वपूर्ण विषय पर गंभीर चर्चा के लिए इन 5 विशेष परिवर्तनों का प्रस्ताव करता है-

1. 25 फीसदी आरक्षण लागू करनाः आदर्श नियमों में इस बात को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि आखिर निजी स्कूलों में 25 फीसदी आरक्षण को किस तरह से लागू किया जाएगा। शिक्षा के अधिकार अधिनियम को कारगर बनाने के लिए जरुरी है कि कुछ महत्वपूर्ण सवालों के व्यवस्थित तरीके से विस्तृत जवाब दिए जाएं-

  • कमजोर और पिछड़े तबके की परिभाषा क्या है और इसकी पुष्टि किस तरह से की जाती है?
  • सरकार प्रारंभिक कक्षाओं के लिए इन बच्चों का चयन किस तरह से करेगी?
  • पड़ोस या पूरे गांव/कस्बे/शहर द्वारा स्कूल में प्रवेश के लिए लॉटरी निकाली जाएगी?
  • पड़ोस के हर इलाके में आखिर आपूर्ति और मांग का संतुलन कैसे साधा जाएगा?
  • निजी स्कूलों को इस निशुल्क शिक्षा पर होने वाले खर्च की भरपाई कैसे की जाएगी?
  • सरकार पूरी प्रक्रिया पर कैसे निगरानी रखेगी? प्रक्रिया पर किस तरह के बाहरी निगरानी/सामाजिक लेखा (vigilance/social audit) लागू/प्रोत्साहित किया जाएगा?
  • क्या होगा अगर ये बच्चे बड़ी कक्षाओं में स्कूल बदलना चाहें?

निजी गैर अनुदानित स्कूलों को 25 फीसदी आरक्षण के बदले में की जाने वाली खर्च की भरपाई की गणना न केवल सरकारी स्कूलों में होने वाले आवर्ती खर्च के आधार पर बल्कि अचल संपत्ति और पूंजीगत व्यय के साथ ही मूल्यह्रास और ब्याज की लागत को शामिल करके की जानी चाहिए। इस खर्च में राज्य सरकार द्वारा सभी स्तरों पर प्राथमिक शिक्षा पर किए जाने वाले व्यय को शामिल करना चाहिए. अन्य निजी सार्वजनिक संपत्ति (PPP) की ही तरह सरकार पूंजी के जीवन चक्र (life cycle of capital) तय कर सकती है।

वर्तमान धारा पुनर्लिखित धारा/ टिप्पणी
8 (1) अपने फंड से, केंद्र सरकार से प्राप्त फंड से या किसी अन्य अथॉरिटी से मिले फंड से राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण द्वारा स्थापित, नियंत्रित या स्वामित्व वाले स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा पर किए गए कुल आवर्ती खर्च को ऐसे स्कूलों में पंजीबद्ध बच्चों की कुल संख्या से भाग देने पर राज्य सरकार द्वारा प्रति बच्चे किए गए खर्च की गणना होगी। 8 (1) अपने फंड से, केंद्र सरकार से प्राप्त फंड से या किसी अन्य अथॉरिटी से मिले फंड से राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण द्वारा स्थापित, नियंत्रित या स्वामित्व वाले स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा के लिए सभी स्तरों पर उठाया जाने वाला कुल सालाना आवर्ती खर्च और पूंजीगत व्यय को ऐसे स्कूलों में पंजीबद्ध बच्चों की कुल संख्या से भाग देने पर राज्य सरकार द्वारा प्रति बच्चे किए गए खर्च की गणना होगी।

2. स्कूलों की मान्यता के मापदंडः आदर्श नियमों के तहत किसी भी स्कूल को मान्यता पाने के लिए एक गैर-लाभकारी सोसायटी या ट्रस्ट के तौर पर पंजीकृत होना होगा। यह दोनों ही प्रावधान अधिनियम की मूल भावना के खिलाफ हैं, जिसमें कई प्रयासों के बाद भी स्कूलों के लिए गैर-लाभकारी होने की अनिवार्यता नहीं है। आम कानूनों के तहत मान्यता प्राप्त किसी भी व्यक्ति या संगठन को स्कूल चलाने का अधिकार होगा, लेकिन सरकारी सहित सभी स्कूलों के लिए गुणवत्ता, जवाबदेही और पारदर्शिता के मापदंडों पर खरा उतरना अनिवार्य होगा।

शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धारा 18 के तहत स्कूलों की मान्यता वर्तमान 11 (अ) और (ब) को निम्नलिखित में बदल दिया जाए
“11 (1) राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकरण द्वारा इस अधिनियम के लागू होने के पहले स्थापित या नियंत्रित हर स्कूल को अधिनियम लागू होने के तीन माह के भीतर जिला शिक्षा अधिकारी को फॉर्म क्रमांक एक पर इसके पालन की स्वयं घोषणा करनी होगी, जो निम्नलिखित शर्तों और मापदंडों, मानकों के तहत होगीः
11 (1) (अ) स्कूल सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 (1860 का 21) के तहत एक सोसायटी द्वारा या उस वक्त लागू कानून के तहत गठित एक सार्वजनिक ट्रस्ट द्वारा संचालित है,
(ब) स्कूल किसी व्यक्ति, समूह या संगठन द्वारा किसी व्यक्ति के लाभ के लिए नहीं चलाया जा रहा;”
“11 (1) इस कानून के लागू होने से पहले राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकरण द्वारा स्थापित स्कूलों सहित सभी स्कूलों को तीन माह के भीतर तय मापदंडों के पालन की फॉर्म नंबर एक में जिला शिक्षा अधिकारी के समक्ष स्वयं यह घोषणा करनी होगी, निम्नलिखित शर्तों के साथः
11 (1) (अ) स्कूल एक सार्वजनिक संस्थान के तौर पर पंजीकृत है और यह सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के कार्यक्षेत्र में होगा
(ब) स्कूल का वार्षिक लेखा इसके कार्यालय में और आम लोगों के लिए भी उपलब्ध रहेगा;”

3. स्कूल भवन का इस्तेमालः नियमों के तहत स्कूल के भवन का इस्तेमाल केवल शिक्षा और कौशल के विकास के लिए ही किया जा सकता है। फिर भी कई स्कूलों का इस्तेमाल सामुदायिक भवन, मतदान केंद्र और प्राकृतिक विपदा में आसरे के तौर पर भी किया जाता है। कुछ सरकारी स्कूलों में तो सरकार ने स्कूल का समय खत्म हो जाने के बाद स्कूल भवन में कम्प्यूटर प्रशिक्षण, जीवन-कौशल की अन्य क्लासों और ट्रेनिंग सेंटर की इजाजत दे रखी है ताकि इससे मिलने वाली राशि स्कूल के लिए इस्तेमाल की जा सके। जब तक स्कूल से जुड़े अधिकारियों (स्कूल प्रबंधन कमेटी सहित) को नहीं लगता कि स्कूल का शिक्षा का मूल उद्देश्य प्रभावित हो रहा है, ऐसे विकल्पों को हटाना समझदारी नहीं होगा।

वर्तमान धारा पुनर्लिखित धारा/टिप्पणी
11 (1) (द) स्कूल भवन या अन्य इमारतें व मैदान का इस्तेमाल केवल शिक्षा और कौशल विकास के लिए ही होगा। 11 (1) (द) स्कूल भवन या अन्य इमारतें व मैदान का इस्तेमाल शिक्षा और कौशल विकास के लिए होगा, साथ ही स्कूल प्रबंधन की अनुमति और शिक्षा व कौशल विकास के काम में बाधा न होने की स्थिति में स्कूल के भवन, अन्य इमारतों और मैदान का अन्य विधिसम्मत कामों के लिए भी इस्तेमाल हो सकेगा।

4. शिक्षकः शिक्षा का अधिकार अधिनियम 'बच्चों,' 'स्कूल' और अन्य 'अधिकारियों' को तो परिभाषित करता है लेकिन दुर्भाग्य से इसमें 'शिक्षक' का उल्लेख नहीं है। एक 'स्थायी कैडर' से सामंती नियोक्ता-कर्मचारी के संबंधों का संकेत मिलता है। आदर्श नियम की धारा 18, राज्य या स्थानीय प्राधिकरण के शिक्षकों पर ही लागू होती है।

वर्तमान धारा पुनर्लिखित धारा/टिप्पणी
18 (1) राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकरण, जैसी भी स्थिति हो, शिक्षकों की नौकरी और वेतन, भत्तों के लिए नियम और शर्त तैयार करेंगे ताकि शिक्षकों का एक पेशेवर और स्थायी कैडर (संवर्ग) तैयार हो सके। 18 (1) राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकरण, जैसी भी स्थिति हो, इसके द्वारा नियुक्त शिक्षकों की नौकरी और वेतन, भत्तों के लिए नियम और शर्त तैयार करेंगे ताकि शिक्षकों का एक पेशेवर कैडर (संवर्ग) तैयार हो सके।

ज्यादा जवाबदेही और प्रभावशीलता के लिए शिक्षकों के प्रदर्शन और छात्रों की उपलब्धियों के मूल्यांकन और आकलन का प्रावधान किया जा सकता है।

वर्तमान धारा पुनर्लिखित धारा/टिप्पणी

13 (6) (द) स्कूल में आसपास के तमाम बच्चों के पंजीयन और लगातार उपस्थिति को सुनिश्चित किया जाए।

22 (2) (स) लगातार और समग्र मूल्यांकन के लिए दिशानिर्देश तैयार किए जाएं।

13 (6) (द) आसपास के तमाम बच्चों के स्कूल में पंजीयन, उपस्थिति और सीखने का मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाए।

22 (2)(स) शिक्षकों की काबिलियत और छात्रों के सीखने का लगातार और समग्र मूल्यांकन के लिए दिशानिर्देश तैयार किए जाएं।

5. स्कूल मैनेजमेंट कमेटीः आदर्श नियमों के तहत स्कूल प्रबंधन कमेटियों को शिक्षकों के कर्तव्यों के पालन पर नजर रखने का अधिकार तो दे दिया है, लेकिन इसका पालन सुनिश्चित कराने के अधिकार नहीं दिए गए हैं। अगर हम चाहते हैं कि स्कूल प्रबंधन कमेटियां अपना काम प्रभावशाली तरीके से करें तो उन्हें इसके लिए पर्याप्त अधिकार दिए जाने चाहिए। इसलिए शिक्षकों की सेवा शर्तों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए कि अधिनियम की धारा 24 (2) के आधार पर स्कूल प्रबंधन कमेटियां शिक्षकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती हैं।

वर्तमान धारा पुनर्लिखित धारा/टिप्पणी

18 (2) खासतौर पर उपनियम (1) के साथ बिना किसी पूर्वाग्रह के, सेवा के नियम और शर्तों में इन बातों का भी खयाल रखा जाएगा
(अ) धारा 21 के तहत गठित स्कूल प्रबंधन कमेटियों के प्रति शिक्षकों की जवाबदेही

18 (2) खासतौर पर उपनियम (1) के साथ बिना किसी पूर्वाग्रह के, सेवा के नियम और शर्तों में इन बातों का भी खयाल रखा जाएगा, खासतौर पर-
(अ) धारा 21 के तहत गठित स्कूल प्रबंधन कमेटियों के प्रति शिक्षकों की जवाबदेही, अनुशासनात्मक कार्रवाई के अधिकार सहित 

स्कूल मैनेजमेंट कमेटियों के सदस्य पालकों को भी अपने दायित्वों का बोध कराने के लिए काम करते हैं ताकि समाज के सभी सदस्यों की जवाबदेही तय हो सके. ये सदस्य महज स्वयंसेवी के रूप में काम नहीं कर सकते उन्हें उनके काम के बदले कुछ पारिश्रमिक भी मिलना चाहिए.

वर्तमान धारा पुनर्लिखित धारा/टिप्पणी

13 (1) गैर-अनुदानित स्कूलों के अलावा इसके अधिकार क्षेत्र में हर स्कूल में तय तारीख के छह माह के भीतर स्कूल प्रबंधन कमेटियों का गठन किया जाएगी और हर दो साल में इसका नये सिरे से गठन हो।

13 (1) गैर-अनुदानित स्कूलों के अलावा इसके अधिकार क्षेत्र में हर स्कूल में तय तारीख के छह माह के भीतर स्कूल प्रबंधन कमेटियों का गठन किया जाए और हर दो साल में इसका नये सिरे से गठन हो। स्थानीय प्राधिकरण के आदेशों के अनुरुप सदस्यों को बैठकों के लिए यात्रा और दैनिक भत्ता दिया जाना चाहिए।

बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत आदर्श नियम उपलब्ध हैं...
http://education.nic.in/Elementary/RTI_Model_Rules.pdf

www.righttoeducation.in

लेखक: 
सी सी एस
प्रकाशित: 
मार्च 2010

बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत

yah sab jhoot hai, ek school men admission dila klar bataiye jo private ho.

jab tak bachon me fail pass

jab tak bachon me fail pass hone da dar nahi jahega ve padhega he nahi. fir navi me ek sath load padega to kaise sahan karenge/