शिक्षा पर सियासत...
उत्तर प्रदेश में लगभग चार हजार करोड़ रु. से ज्यादा धन स्मारकों, पार्कों के निर्माण और उनके रख-रखाव पर खर्च किया जा रहा है। लेकिन बात जब शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) को लागू करने की आती है तो राज्य की मुख्यमंत्री केंद्र से अनुदान की दरकार के नाम पर आरटीई को लागू करने से कदम पीछे हटाती नजर आती हैं। यह हालत सिर्फ उत्तर प्रदेश की ही नहीं है बल्कि केंद्र को चिठ्ठी लिख कर फंड मांगने वालों में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के नीतीश कुमार भी शामिल हैं। यानी शिक्षा जैसे मसले पर भी विभिन्न राज्य सियासी खेल खेलने से बाज नहीं आ रहे।
अब जरा इस ओर भी नजर दौड़ाएं, मायावती ने जिन पार्कों और स्मारक स्थलों का निर्माण किया है उनकी सुरक्षा के लिए एक बल बनाने का फैसला भी लिया है, जिसमें 1,200 लोगों को सुरक्षाकर्मियों के तौर पर नियुक्त किया जाएगा। यानी बड़े स्तर पर भर्तियां और खर्च होगा। बात शिक्षा के अधिकार कानून की आए तो मुख्यमंत्री धनाभाव की बात करती हैं। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके राज्य में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की दर कुछ कम नहीं है।
इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि सियासत के जरिये बच्चों के भविष्य पर किसी तरह का कुठाराघात न हो। इसलिए बाकी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को उत्तर प्रदेश का अनुकरण तो कतई नहीं करना चाहिए, क्योंकि घनाभाव की दुहाई देकर शिक्षा के अधिकार कानून के क्रियान्वयन से एकदम हाथ झाड़ लेना राज्य के लोगों से शिक्षा के अधिकार को छीन लेने जैसा है।
जहां तक आरटीई को लागू करने की बात है तो पांच साल में कानून को अमल में लाने के लिए योजना आयोग के आकलन के मुताबिक, 1,44,000 करोड़ रु की जरूरत है। बेशक, पैसे की जरूरत है लेकिन धन के नाम पर आरटीई के क्रियान्वयन से हाथ खींचना भी तो ठीक नहीं है।
- मुख्यमंत्रियों के इस रुख पर आप क्या कहते हैं?
- उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के आरटीई पर रवैया क्या सही है?
- आरटीई के क्रियान्वयन के लिए आप क्या राय देते हैं?
- केंद्र द्वारा लिए जाने वाले एजुकेशन सेस को लेकर आपका क्या कहना है?
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