अभी भी समय शेष है...

एक बच्चा मांद से निकलकर, बड़ी ही बेबसी से अपनी मां का इंतजार करते हुए नजर आता है। उसे इंतजार है, शिकार पर गई मां का। लेकिन वह नहीं जानता कि उसकी मां खुद शिकार बन चुकी है। इसके बाद टीवी स्क्रीन पर नजर आता है, 1411  का आंकड़ा। जी हां, यह संख्या उन बाघों की है जो हमारे देश में बचे हैं। लेकिन इतने प्रचार और सरकारी प्रयासों के बावजूद भी, इस साल जनवरी के बाद से सिर्फ दस हफ्तों में देश के अनेक अभयारण्यों में 13 बाघों को मौत के घाट उतार दिया गया है। इसमें जनवरी और मार्च में पांच-पांच बाघों की मौत हुई। अगर बात पिछले साल की करें तो धरती से 60 बाघ कम हो गए थे।

अब पूरी दुनिया में सिर्फ 3,500 बाघ बचे हैं,  इनमें से 1411 भारत में हैं। लेकिन अब इस आंकड़े में कितने की कमी आ गई होगी, कुछ कहा नहीं जा सकता है। ऐसा उस समय है जब पूरे देश ही नहीं दुनिया भर में इस प्रजाति को बचाने के लिए जमकर प्रयास हो रहे हैं। अगर देखा जाए तो यह जीव इंसानी महत्वाकांक्षा का ही शिकार होता जा रहा है, क्योंकि रहने के लिए नए-नए ठिकाने ढूंढने के प्रयासों में इंसान इस जीव के प्राकृतिक आवासों को अपना निशाना बना रहा है। इसी के चलते इंसान और इस जीव में अक्सर होने वाली मुठभेड़ में भी यह मारा जाता है। इसके हालिया उदाहरण उत्तराखंड, बिहार और राजस्थान में देखने को मिले।

अगर इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन ऑफ नेचर की ताजा रिपोर्ट को देखा जाए तो पता चलता है कि भारत में पाए जाने वाले 124 से भी ज्यादा स्तनधारी जीव संकट का सामना कर रहे हैं। इस तरह देखें, तो हमें खोखली बातें करके या सिर्फ परियोजना बनाने से कुछ आगे सोचना होगा। जब तक जमीनी स्तर पर प्रयास नहीं होंगे तब तक इस शानदार प्राणी की रक्षा के बारे में कल्पना करना भी मुश्किल है। इसलिए सरकारों को सिर्फ योजनाएं बनाने से आगे बढ़कर, ठोस कदम उठाने होंगे, आम आदमी और खासकर जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को जागरूक करना होगा। उन विकास के ठेकेदारों पर लगाम कसनी होगी, जो इस प्राणी की धज्जियां उड़ाने में लगे हैं।

  • आपको क्या लगता है, इस प्राणी की रक्षा के लिए हम-आप क्या कर सकते हैं?
  • क्या सरकार की नीतियां उनकी रक्षा के लिए पर्याप्त हैं?
  • सरकार को कानूनी तौर पर किस तरह के कदम उठाने चाहिए?
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