1991 का सुनहरा ग्रीष्म

सभी सुधारक कुंआरे हुए हैं।

-जॉर्ज मूर

1996 के आम चुनावों में कांग्रेस की हार की कोई व्याख्या किस प्रकार कर सकता है। नब्बे के दशक के कुछ वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था के जीवनकाल थे। सुनहरा समय था तथा जिसमें अलग से समष्टिगत अर्थशास्त्र के उत्कृष्ट परिणाम देखने को मिले। सुधारों ने विश्वास की उत्सुकता की समझ हम में जगाई। बहुत से लोगों ने इसी तरह की समझ व संभावनाएं पचास के दशक में भी महसूस की थीं। अर्थशास्त्रियों ने भारत को कवर स्टोरी में 'आजाद बाघ' कहा। राव न तो अपना कद ही लोगों के समक्ष बढ़ा सके और न ही कोई ऐतिहासिक उपलब्धि ही हासिल कर सके। कांग्रेस पार्टी ने भी उनकी महान और अभूतपूर्व उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया। यह सही है कि एक औसत मतदाता इन सुधारों की व्याख्या को समझने में सक्षम नहीं है, किंतु वे सुधरे आर्थिक हालातों से भी बेखबर नहीं थे। कांग्रेस की हार के लिए एक कारण यह भी दिया जा सकता है कि लोगों ने राव को इतिहास का द्वारपाल ही माना क्योंकि वे उस समय वहां थे, जब इतिहास बदला था। लोगों ने सुधारों के लिए उन्हें कोई श्रेय नहीं दिया। इन विडंबनाओं को समझने के लिए यह जरूरी है कि हम देखें कि 1991 के सुनहरे ग्रीष्म में एक के बाद एक सुधार कैसे होते गए।

21 जून 1991 को राष्ट्रपति ने नई कैबिनेट को शपथ दिलाई। अगले ही दिन राव ने घोषणा की कि राष्ट्र के सामने बहुत बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है और उनकी सरकार इरादा कर चुकी है कि ''बीते हुए समय के इस मकड़जाल को साफ कर और एक नए समय में प्रवेश करेंगे।'' मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री बनते ही सबसे पहला कदम यह उठाया कि रिजर्व बैंक के गवर्नर एस. वेंकटरमण और उनके योग्य सहयोगी सी. रंगराजन को दिल्ली बुलाया। उस दिन इन तीनों ने प्रधानमंत्री को सूचित किया कि देश दिवालिया होने के कगार पर है। वे जानते थे कि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से ऋण ही उम्मीद की एकमात्र किरण है। वास्तव में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ पूर्व सरकार की बातचीत काफी आगे तक हो चुकी थी। नरसिंह राव के कहीं गहरे में एक बात यह भी थी कि यह संकट ही वह मौका है जिससे कई बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं।

राव ने विपक्ष के प्रमुख नेताओं के साथ एक गुप्त बैठक की जिसमें मनमोहन सिंह ने सभी को स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया। मनमोहन सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण ही अब हम लोगों की साख बचा सकता है। जैसे भी हो हमें अपने सदन को क्रम में लाना होगा। उन्होंने कुछ बुनियादी सुधारों की जरूरत के बारे में भी बताया। संक्षिप्त में बताया कि वह मूल्य घटाने जा रहे हैं, वे सरकार द्वारा उठाए गए मुश्किल कदम जिनका वह इरादा कर चुके हैं, उसमें उनके सहयोग की उम्मीद करते हैं। इसके बाद वित्त मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के प्रबंध संचालक एम. कैमदेसस से वादा किया कि हम व्यापार और उद्योग नीति में कई बड़े सुधार लाएंगे।

सरकार ने जुलाई के पहले तीन दिनों में भारतीय रुपये का बीस प्रतिशत अवमूल्यन किया। दूसरे अवमूल्यन के बाद, वह पी. चिदंबरम, नए वाणिय मंत्री और मोंटेक सिंह आहलुवालिया, वाणिज्यिक सचिव से मिले और कहा कि वे निर्यात पर से सब्सिडी पूर्ण रूप से खत्म करना चाहते हैं। उन्होंने बहस की कि निर्यातकों को सस्ते रुपये के द्वारा समान प्रोत्साहन दिए जाने के कारण अवमूल्यन ने सी.सी.एस. को अनावश्यक बना दिया है। इससे राजकोषीय घाटे में 0.4 प्रतिशत की कमी आएगी।

इस बात पर चिदंबरम की पहली प्रतिक्रिया यह थी कि यह कदम किसी वाणिज्य मंत्री के लिए अपने राजनीतिक करियर बनाने के पहले ही दिन आत्महत्या की तरह होगा। उसने तर्क दिया कि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सी.सी.ए.एस. ही तो उसका प्रमुख हथियार है। वह निर्यातकों का सामना किस मुंह से करेंगे? उन्होंने कहा कि ''मुझे इस बारे में सोचने का मौका दो।'' मनमोहन सिंह ने कहा कि आप इस पर जल्दी ही विचार कर जवाब दीजिए क्योंकि प्रधानमंत्री कल सुबह ही इसकी घोषणा करना चाहते हैं। चिदंबरम नाराज हो गए, किंतु बाद में वह अपने आप ही राजी भी हो गए। उन्होंने पूछा कि वह इसी समय व्यापक व्यापार सुधारों की घोषणा भी कर सकता है। वित्तमंत्री ने कहा, ''आज रात ही?'' चिदंबरम ने अपनी सहमति जताई। वे शाम को मिलने व व्यापार प्रस्तावों पर समीक्षा करने के लिए राजी हो गए।

चिदंबरम इस हथियार को इसलिए पसंद करते थे क्योंकि यह इस प्रक्रिया में नौकरशाहों को प्रवेश नहीं देता था। उन्होंने वह छीन लिया और कुछ ही घंटों में इन दो आदमियों ने इसे लालफीताशाही की पहुंच से बहुत दूर पहुंचा दिया। महीनों की देरी और कठिन तर्क, संताप और भ्रष्टाचार जिसे भारत ने कई दशकों से बनाया था। वे दीवानों की तरह काम करने लगे और सात बजे उन्होंने नाटकीय ढंग से उदारवादी व्यापार नीति की घोषणा की। मनमोहन सिंह ने जब इन प्रस्तावों को देखा तो वह बहुत खुश हुए। उन्होंने विश्व को संकेत दिया कि भारत अब समझदारी से विकास पथ पर अग्रसर हुआ है वह भी निश्चित बाजार विनिमय दर के साथ।

नहाकर, बाहर नरसिंह राव लुंगी में ताजा दिख रहे थे। चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के पास बैठकर उन्हें संक्षिप्त में सब कुछ बताया। प्रधानमंत्री मनमोहन की ओर मुड़े। उन्होंने पूछा, ''क्या आप इससे सहमत हैं?'' मनमोहन सिंह ने भी मंजूरी में सिर हिला दिया, ''ऐसे में इस पर दस्तख्त कर देने चाहिए।'' मनमोहन सिंह ने ऐसा ही किया और फिर प्रधानमंत्री ने भी पेपर के नीचे अपने दस्तखत कर दिए। इस तरह भारत के इतिहास में व्यापक संरचनात्मक सुधारों की एक नई शुरुआत हुई। प्रस्तावों में विर्निदिष्ट कुछ बातें उनके सिर के ऊपर से गुजर गईं, लेकिन नरसिंह राव उसमें दुबारा सुगठित करने के लिए दिए गए निर्देर्शों से संतुष्ट थे। उन्हें अपने तीनों आदमियों पर विश्वास था। जोकि सरकार के निर्णय लेने की धीमी व टेढ़ी-मेढ़ी प्रक्रिया को समझते थे, उनके लिए यह एक क्रांतिकारी मौका था। वादे और साहस के साथ उन चारों लोगों ने वह पा लिया जो बारह घंटे पहले असंभव दिख रहा था।

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