मुद्रा, बाजार और बाजार शक्तियां: बिना हस्तक्षेप मुद्रा या मुक्त बैकिंग - आर.के. अमीन

आर.के. अमीन की पुस्तक “मनी, मार्केट और मार्केटवाला” का पहला अध्याय है “बिना हस्तक्षेप मुद्रा या मुक्त बैकिंग” (Laissez-faire money or free banking)। यह पुस्तक पूंजीवाद, मुक्त बैंकिंग और बी.आर. शिनॉय तथा एफ.ए. हायक के जीवन और योगदान पर प्रकाश डालती है। इस अध्याय में विशेष रूप से इस मुद्दे को उठाया गया है कि किस तरह से अर्थव्यवस्था में पूंजी की आपूर्ति की जा सकती है। इस में सवाल उठाया गया हैः अगर मुक्त बाजार के जरिये उपभोक्ताओं के हित की अन्य वस्तुएं मुहैया कराई जाती हैं तो फिर धन की आपूर्ति बाजार द्वारा क्यों नहीं की जाती है? अगर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विनियमन (deregulation) पर मुख्य जोर है तो आखिर क्यों ऐसा बैंकिंग और फाइनेंस, मुख्य रूप से धन के प्रावधान में नहीं किया जाता है?

यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि अगर मुक्त बाजार से सामान की आपूर्ति से उपभोक्ता का भला होता है तो फिर मुद्रा की आपूर्ति भी क्यों न बाजार के ही हाथ में सौंप दी जाए? अर्थशास्त्र के अन्य क्षेत्रों में जब विनियमन (deregulation) हटाने पर ही जोर दिया जाता है तो फिर बैंकिंग और वित्त (फाइनेंस), खासतौर पर मुद्रा की आपूर्ति में क्यों नहीं?

ऐसी सोच के जोर पकड़ने के अनेक कारण हैं-पहला, दूसरे विश्वयुद्ध में ही मौद्रिक प्राधिकारियों (monetary authorities) की स्थिर मुद्रा आपूर्ति में नाकामी साफ तौर पर उभरकर सामने आ गई थी। नतीजतन, 1970 से ही ऐसे आर्थिक साहित्य की बाढ़ सी आ गई है, जिसमें गुजरे दिनों की मुक्त बैंकिंग पर किए गए ऐतिहासिक अध्ययन का जिक्र किया गया है। प्रोफेसर हायक जोर देकर कहते हैं, "बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की पिछली अस्थिरता का कारण मौद्रिक प्रणाली से मुख्य नियामक, जैसे मुद्रा, को ही बाजार की प्रक्रिया में नियमन से परे रखा जाना था।" इसीलिए प्रो. हायक चाहते थे कि सरकार के मुद्रा की आपूर्ति से एकाधिकार को हटाने को लेकर जागरुकता का प्रसार किया जाए, जिसने कई अर्थशास्त्रियों को मुक्त मुद्रा या बिना हस्तक्षेप बैंकिंग पर अध्ययन और अनुसंधान के लिए प्रोत्साहित किया। दूसरा, 1970 के तत्काल बाद, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन पर से नियंत्रण एक-एक करके खत्म होता गया। विश्व बाजार में भारी इजाफा देखने को मिला और परिणाम यह हुआ कि दुनिया के विभिन्न देशों को कारोबार के संचालन में भुगतान के नये तरीके खोजने पड़े। तीसरा, प्रो. हायक को और बल मिला जब यह बात साफ हो गई कि 1930 के दशक की महामंदी (Great Depression ), 1960 की मुद्रास्फीति (inflation) और 1970 की मुद्रास्फीतिजनित मंदी (stagflation) सभी दुनिया भर में मॉनेटरी अथॉरिटीज़ की नाकामी का ही परिणाम थे। और अंत में सरकारों की इच्छा के खिलाफ, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग ने प्रतिभूतिकरण (securitization) और व्युत्पन्नों (derivatives) जैसे विभिन्न साधनों के जरिये मुद्रा की बढ़ती जरूरतों को सफलतापूर्वक आभासी मुद्रा (near money) के जरिये पूरा करना शुरू कर दिया। ताजातरीन उदाहरण कम्प्यूटरों और सूचना प्रौद्योगिकी के जरिये ई-मनी को साकार करके। ई-मनी के आगमन से तमाम देशों के बीच प्रणाली में भुगतान इतनी तेजी से होता है कि दुनिया के किसी भी देश के लिए इस पर नियंत्रण पाना आसान नहीं है। चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसके लिए मुद्रा पर नियंत्रण अब आसान नहीं। इसीलिए हैरानी की बात नहीं है कि मुद्रा के अराष्ट्रीयकरण की मांग बढ़ती जा रही है।

सरकारी एकाधिकार का औचित्य

मुद्रा पर राजघराने या सरकार के एकाधिकार का औचित्य क्या था? या बाकी की अर्थव्यवस्था के लिए मुक्त बाजार को ही बेहतर माना जाता है तो फिर मुद्रा के क्षेत्र में सरकार के हस्तक्षेप की वजह क्या है? इस सवाल का जवाब देने के लिए, आमतौर पर चार तरह के तर्क दिए जाते हैं:

  1. मुद्रा का बाहरी प्रभाव (externalities),
  2. मुद्रा का जनहित का स्वरूप (money as public good),
  3. मौद्रिक प्रणाली में निहित नैतिक खतरों से उत्पन्न परिस्थितियों को देखते हुए स्वाभाविक एकाधिकार,
  4. प्रतिस्पर्धा की अधिकता के कारण संसाधनों का ह्रास और जनता की असुविधा।

पहले दो तर्क तो ज्यादा देर तक टिक नहीं पाते। उनका सीधा जवाब दिया जा सकता है। मुद्रा के बाहरी प्रभाव या मुद्रा बैलेंस (money balance) का खुलासा पॉल सैम्युअलसन ने किया है, जिनके मुताबिक मनी बैलेंस रखने में सकारात्मक निजी लागत तो होती है, सामाजिक लागत नहीं। सामाजिक और निजी लागत में यह असंगति ही सरकार के मुद्रा पर एकाधिकार अनिवार्य बना देती है। वैसे, इस तर्क में एक पेंच है। धोखाधड़ी और चोरी पर नजर रखने जैसी बातों की लागत सामाजिक लागत के ही खाते में जाती हैं। साथ ही नगदी से मिलने वाले लाभ जैसे निजी फायदे भी हैं। यह सच है कि स्वर्ण मुद्राओं की जगह कागजी मुद्रा के सामाजिक लाभ बहुत हैं, लेकिन इन फायदों के लिए ठीक वैसे ही कोई प्रभार नहीं लगाया जा सकता, जैसे हम भाषा के इस्तेमाल पर कोई प्रभार नहीं लगा सकते। कई बार जब बाजार का आकार बढ़ता है और प्रौद्योगिकी भी विकसित होती है, तो हम इन बाहरी तत्वों को भी आत्मसात कर लेते हैं। जैसा कि टीवी और दूरसंचार के क्षेत्र में हो रहा है। साथ ही मुद्रा से मिलने वाले फायदों को निजी और सामाजिक फायदों की दो श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता है।

जहां तक सार्वजनिक वस्तुओं (public goods) का तर्क है तो इसके दो प्रमुख लक्षणः अवर्जनीयता (non-excludablity) और गैर-प्रतिद्वंद्विता, मुद्रा और मनी बैलेंस में नहीं पाए जाते। अगर मनी बैलेंस ए को दे दिया जाता है तो फिर उसे बी को नहीं दिया जा सकता, यानी लोगों को परे रखा जा सकता है और अगर ए ने मनी बैलेंस का इस्तेमाल कर लिया है तो फिर बी इसी मनी बैलेंस का इस्तेमाल नहीं कर सकता, यानी उपभोग में वह प्रतिद्वंद्वी है।

नैसर्गिक एकाधिकार और अतिप्रतिस्पर्धा के खतरे के दो बड़े तर्कों के समर्थन में हम कुछ ऐसी मौद्रिक और बैंकिंग घटनाक्रमों का उदाहरण दे सकते हैं, जिनके चलते सरकार के मुद्रा पर एकाधिकार की स्थिति बनी। पहला, कुछ इकाईयां हैं जो बैंक नोट जारी करती हैं और कई तरह के नोट चलन में हैं। आम आदमी के लिए प्रत्येक नोट की अदायगी क्षमता (solvency) का पता लगा पाना मुश्किल होगा। हो सकता है कि उनकी स्वीकार्यता, जगह-दर-जगह और व्यक्ति-दर-व्यक्ति बदल जाए। बैंकिंग क्षेत्र में कई संदेहास्पद किस्म के लोग प्रवेश कर सकते हैं और ऐसे में कोई तंत्र इस क्षेत्र में हो रही अंधेरगर्दी का पता लगाने की स्थिति में हो। परिणाम यह होगा कि लेन-देन में घालमेल की आशंका बढ़ जाएगी और ऐसे में बैंक के नोटों को या तो लोग हिचक के साथ स्वीकार करेंगे या कम दरों पर स्वीकार करेंगे। मौद्रिक व्यवहार में स्वीकार्यता और विश्वास की वापसी के लिए जरूरी है कि केवल एक ही अथॉरिटी (यानी सरकार) को बैंक के नोटों के प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंप दी जाए। ताकि बैंक नोटों के चलन में एकरूपता कायम रहे और धोखाधड़ी को खोज निकालने के लिए एक तंत्र की भी स्थापना की जा सके।

आइए अब बैंकिंग कारोबार पर नजर डालें। बैंकों की अपनी देयता (liabilities) होती है, जैसे जमा, जिनका भुगतान मांग पर या तत्काल, उदाहरण के लिए कालखंड 1 में किया जाना है, जबकि बैंक की परिसंपत्तियां (assets) कुछ समय बाद ही परिपक्व (mature) होती हैं। समय का यही अंतर बैंकों के कामकाज में बुनियादी अस्थायित्व को दर्शाता है। कोई भी बैंक अपनी देनदारियों को कैसे पूरा कर सकती है, अगर जमाकर्ताओं में नगदी निकालने (encashment) की होड़ सी लग जाए? इसलिए इसमें एक ऐसी एजेंसी की जरूरत महसूस की जाने लगती है, जो ऐसी स्थिति में बैंक को नगदी मुहैया करा सके- एक किस्म का आपातकालीन ऋणदाता, जिसके अभाव में यह संकट की स्थिति छूत की बीमारी की तरह दूसरे बैंकों को भी प्रभावित कर सकती है और हो सकता है कि इसका प्रभाव पूरे बैंकिंग कारोबार पर ही देखने को मिल जाए। अगर एक बैंक को ग्राहकों को भुगतान करने में नाकामी  मिलती है, तो दूसरे बैंकों के ग्राहकों में अपने बैंक में भी ऐसी स्थिति की आशंका के चलते नगदी निकालने की होड़ लग सकती है। यह एक खुले रहस्य की तरह है कि कोई भी बैंक, फिर वह चाहे कितनी भी मजबूत स्थिति में क्यों न हो, सारे जमाकर्ताओं द्वारा एक ही वक्त पर नगदी मांगे जाने पर उनका भुगतान नहीं कर सकता। समूची बैंकिंग प्रणाली को अनर्थ से बचाने के लिए मदद के लिए आगे आने वाले एक केंद्रीय बैंक की जरूरत महसूस की गई, जो तत्काल भुगतान की व्यवस्था कर सके ताकि ग्राहकों के विश्वास को लौटाया जा सके और बैंकों से नगदी निकालने की होड़ को भी रोके।

वैसे, कुछ अर्थशास्त्री इस घटनाक्रम को दूसरे नजरिये से देखते हैं। उनकी राय में बैंकों से नगदी निकालने की ऐसी आपाधापी की स्थिति को रोकने के लिए बैंकों में अपने आरक्षित कोष के इस्तेमाल में ऐहतियात की कुदरती प्रवृत्ति होनी चाहिए। ऐसा बैंकों के ज्यादा से ज्यादा विस्तार से संभव है। ताकि बैंक खातों में अंतर-बैंक भुगतान ही हो, यानी कुछ खातों से रकम निकालना और कुछ अन्य खातों में रकम जमा करना, बिना आरक्षित निधि को हाथ लगाए। यहां एक ऐसी बड़े बैंक की बात हो रही है, जिसकी शाखाएं पूरे देश में हों। यानी कि बैंकिंग कारोबार में बड़े बैंक की, दूसरे शब्दों में बैंकिंग एकाधिकार के प्रयासों की कुदरती प्रवृत्ति होती है। इन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बैंकिंग में प्रतिस्पर्धा कायम नहीं रखी जा सकती। बैंकिंग में एक तीसरा घटनाक्रम भी है, जिसमें बैंक सामंजस्य के साथ काम करते हैं, ताकि ग्राहकों को कर्ज देकर धन कमाया जाए-यह तेजी और मंदी का कारण बन सकता है। अगर कोई बैंक अपनी देयता में इजाफा करता है, तो निश्चित तौर पर उसका कोष कम होगा, लेकिन इसी वक्त दूसरे बैंक भी ऐसा ही करने लगें तो पहली बैंक को ज्यादा धन मिलेगा और वह अपने कोष को बढ़ा सकेगा। अगर यह सारे बैंक सामंजस्य के साथ काम करते हैं तो किसी को भी अपने कोष को लेकर चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि आरक्षित निधि और मुद्रा के कुल भंडारण का गुणक (multiplier) बढ़ जाएगा और बैंकिंग प्रणाली का काम इसी आधार राशि या आरक्षित निधि से चल सकता है। कुल मुद्रा आपूर्ति के निर्धारण का गुणक बदल जाएगा, जिसके फलस्वरुप अर्थव्यवस्था में तेजी और मंदी देखने को मिलेगी। सवाल यह है कि मुद्रा की आपूर्ति या गुणक के प्रभाव पर नियंत्रण के बिना हम कैसे तेजी और मंदी के इस खेल को टाल या नियंत्रित कर सकते हैं?

इससे संबंधित चौथा घटनाक्रम है, जो बैंकिंग प्रणाली के आधारभूत मुद्दे को उठाता है, यानी जरूरत से ज्यादा कागजी मुद्रा जारी करने की प्रवृत्ति। अगर बैंकों को ऐसी वैध मुद्रा जारी करने की अनुमति दे दी जाए जिसकी लागत कम हो और बदले में उनको बेशकीमती परिसंपत्तियां दी जाएं, जिससे अच्छी कमाई की संभावना हो, तो अगर उन पर किसी तरह का नियंत्रण न रहा तो बाजार में जरूरत से ज्यादा नोट आ जाएंगे। जरूरत से ज्यादा बैंक नोट जारी करना बैंक के लिए भी कोई फायदे का सौदा नहीं होगा. ऐसे में बैंकिंग कारोबार में संदेहास्पद, बेईमान और अनिष्टकारी तत्व घुस आएंगे, दूसरी ओर मुद्रास्फीति और यहां तक कि अनियंत्रित मुद्रास्फीति तक का खतरा बढ़ जाएगा। ऐसे हालात को रोकने के लिए महसूस किया गया कि सरकार या उसका कोई प्रतिनिधि, केंद्रीय बैंक, को नोट जारी करने के मामले में एकाधिकार हासिल होना चाहिए, ताकि धोखाधड़ी को रोका जा सके। साथ ही बैंकिंग जगत की आधारभूत अस्थिरता के चलते यह साख पर सवाल लगने की स्थिति में ऋणदाता की भूमिका भी निभा सकता है। इस केंद्रीय बैंक को ही मुद्रा की सही मात्रा जारी करने का अधिकार भी दिया जा सकता है ताकि ज्यादा मुद्रा जारी हो जाने से पैदा होने वाली मंदी और तेजी की घटनाओं को टाला जा सके। खासतौर पर तब जब बैंक बिना किसी पुख्ता रिजर्व के ही एक साथ या बेइमानी से ज्यादा मुद्रा जारी कर दें। केंद्रीय बैंक को इस स्तर तक मौद्रिक प्राधिकरण (monetary authority) की जिम्मेदारी दे दी गई। इस तरह से सेंट्रल बैंक ने नोट जारी करने के मामले में एकाधिकार हासिल कर लिया, इसके जारी किए हुए नोट वैध होते हैं। यही सरकार की बैंकर होती है। यही ऋण नियंत्रण करती है और जरूरत के वक्त ऋणदाता की भूमिका भी निभाती है।

एक मौद्रिक प्राधिकरण के तौर पर सेंट्रल बैंक का अब तक का काम कैसा रहा है? इस सवाल का जवाब देने के लिए प्रो. हायक ने लिखा हैः "मेरी राय में यह बहुत जरूरी है कि यह जान लिया जाए कि सरकार के नोट जारी करने के एकाधिकार को लेकर इतिहास में कोई तर्क नहीं है। शाही परमाधिकार (royal prerogative) के दिनों से ही मुद्रा जारी करने के विशेषाधिकार का पक्ष लिया जाता रहा है, क्योंकि मुद्रा जारी करने का अधिकार सरकार के वित्तीय नियंत्रण के लिए जरूरी था। हमें पर्याप्त पारिश्रमिक देने के लिए नहीं, बल्कि सरकार को पूंजी पर नियंत्रण के लिए ताकि वह जब चाहे मुद्रा उगाह सके या जरूरत पड़ने पर तैयार भी कर सके।"(17वीं सदी में स्टुअर्ट किंग द्वारा लंदन टॉवर के सुरक्षित कोष से सुनारों के 2 लाख स्टर्लिंग निकालना और इटली में 15वीं सदी की ऐसी ही घटना के अलावा आज दुनिया के लगभग सभी देशों में घाटे की वित्त व्यवस्था प्रोफेसर हायक के विचारों की पुष्टि ही करती है।) अगर, प्रो. हायक सही हैं तो क्या मुक्त मुद्रा ऐसी घटना को टालकर हमें सरकार प्रबंधित मुद्रा के नियंत्रण की आधुनिक व्यवस्था से बेहतर व्यवस्था दे सकती है?

बैंकिंग का इतिहास

इतिहास की बात की जाए तो अलग-अलग कालखंडों में विभिन्न देशों में मुक्त बैंकिंग का अनुभव हमने लिया ही है। मुक्त बैंकिंग के अनुभव के दौरान सोने या चांदी का आधार मुद्रा के तौर पर इस्तेमाल होता था। बैंक नोटों की आधार मुद्रा में विनिमेयता को बेहिचक स्वीकार्य मान लिया जाता था जबकि मुक्त मुद्रा का आज तीन अलग परिस्थितियों में अध्ययन किया जाता है। (1) जिसमें आधार मुद्रा सोना या चांदी हो, (2) वैध मुद्रा (fiat money) को आधार मुद्रा मानकर, (3) बिना किसी आधार मुद्रा के मुक्त मुद्रा। अंतिम दो परिस्थितियों के बारे में हमारे पास कुछ गतिविधियों के विश्लेषण के अलावा कोई खास ऐतिहासिक अनुभव नहीं है। आधुनिक युग में यही दोनों देखने को मिल रहे हैं, लेकिन बगैर परीक्षण के। इसलिए जरूरी है कि हम पहली परिस्थिति का विस्तार से अध्ययन करें और दूसरी-तीसरी परिस्थिति में संभावित घटनाक्रम की संक्षिप्त रूपरेखा तैयार करें।

शुरूआत प्रतिस्पर्धी मुद्रा के मसले से करें। ऐतिहासिक तौर पर ऐसा वक्त भी रहा है जब कुछ देशों में सरकारी या केंद्रीय बैंक के नियंत्रण के बगैर मुक्त बैंकिंग अस्तित्व में थी। स्कॉटलैंड (1716-1844), न्यू इंग्लैंड (1820-1860) और कनाडा (1817-1914) इस बात के विशिष्ट उदाहरण हैं जहां इस कालखंड में मुक्त बैंकिंग के दौरान वस्तु आधारित मुद्रा चलन में रही है। अमेरिका में गृहयुद्ध से पहले जाहिर तौर पर मुक्त बैंकिंग मौजूद थी। इसके अलावा, 19वीं सदी में ऑस्ट्रेलिया, चीन, कोलंबिया, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, स्वीडन, स्पेन, आयरलैंड ऐसे देश रहे जहां कुछ हद तक मुक्त बैंकिंग अस्तित्व में रही।

एकाधिक मुद्रा जैसे मुक्त बैंकिंग की अधिकांश बुराइयां, बैंकों की भुगतान क्षमता होने या न होने (solvency) के बारे में जानकारी का अभाव, ज्यादा नोट जारी करने, अटकलबाजी के कारण नोट जारी करने और बैंक नोटों की कम स्वीकार्यता आदि अमेरिका में ही ज्यादा पाई जाती हैं। ब्रांच बैंकिंग पर प्रतिबंध, आदेश दिए जाने पर नोट को सोने में बदलने की बाध्यता, मांग जमा (demand deposit) पर ब्याज भुगतान पर प्रतिबंध जैसी कुछ मूलभूत बंदिशों के कारण यह अमेरिका में नाकाम साबित हुई। इस स्थिति के चलते बैंकों को लेकर भरोसे में कमी आई। बची-खुची कसर अमेरिका के विभिन्न राज्यों और संघीय विनिमयों (regulations) में अंतर ने पूरी कर दी, जिनके चलते बैंकों के लिए बिना बाधा मुक्त होकर काम कर पाना नामुमकिन हो गया।

अगर हम अमेरिकी अनुभव की तर्ज पर ही स्कॉटलैंड के अनुभव को परखें तो पाएंगे कि ब्रांच बैंकिंग या बैंकों में आपसी सहमति को विकसित करके, बिना किसी रियायत के विभिन्न बैंकों के नोटों को ज्यादा ग्राह्य बनाया गया। आपसी सहमति से बैंकों के बीच एक निजी समाशोधन प्रणाली भी थी ताकि समाशोधन बैंकों के समूह की बैंकों के नोट बिना किसी परेशानी के ज्यादा से ज्यादा ग्राह्य होते थे। विभिन्न किस्म के बैंक नोटों के लिए एक अनुषंगी बाजार (secondary market) भी था जहां नोट जारी करने वालों की भुगतान क्षमता की जानकारी हासिल की जा सकती थी और इस सूचना का विभिन्न नोटों के मूल्यों और रियायत के निर्धारण के लिए इस्तेमाल किया जाता था। अनुषंगी बाजार में दिवालिया, बेईमान, अक्षम इकाईयों की पहचान करके उन्हें खारिज कर दिया जाता था। नोट जारी करने के एकाधिकार वाली प्रणाली में कारोबारियों को आरक्षित निधि या किए जा रहे घोटाले के बारे में कोई भी जानकारी नहीं होती। साथ ही, वह बाजार के बारे में भी वास्तविक स्थिति का पता नहीं लगा सकता था, ऐसे में उसका भरोसा टूटने से रोकना बहुत ही मुश्किल काम है।

अलग-अलग राशि के हुंडी भुगतान (discount bills) और परिपक्व होने (maturing) की अलग-अलग तारीखों के बारे में अब लंकाशायर के अनुभव (1790-1830) को देखें। ये हुंडी भुगतान स्थानीय कारोबारियों द्वारा जारी किया गया था और इसे बिना किसी परेशानी के मुद्रा के तौर पर परिचालित (circulated) किया गया। इसके विपरीत लोगों को ऐसा हुंडी भुगतान ज्यादा सुविधाजनक लगता था, क्योंकि इसके साथ ब्याज जुड़ा था और यह वास्तव में मुद्रा थी। उस काल में बैंक ऑफ इंग्लैंड के नोट उपलब्ध तो थे लेकिन लोग उनका इस्तेमाल नहीं करते थे। यह बताता है कि मुद्रा वही है जिसे लोग मुद्रा समझें, वह नहीं जो सरकार द्वारा उन पर थोपी जाए। बुलियन कमेटी की बैठक के काल में हमें इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की बैंकों के कामकाज की आलोचना देखने को नहीं मिलती। डेविड रिकार्डो ने अपने लेखन में उनमें कोई खामी नहीं देखी, जबकि बैंक ऑफ इंग्लैंड के कामकाज को लेकर बवाल खड़ा हो चुका था। रिकार्डो मुद्रा के मूल्य ह्रास (depreciation) और सोने-चांदी सहित अनिवार्य वस्तुओं (essential commodities) की ऊंची कीमतों में बैंक ऑफ इंग्लैंड की भूमिका के मुखर आलोचक थे। स्कॉटिश बैंकों के कामकाज की समीक्षा के दौरान एडम स्मिथ उनमें कोई खामी नहीं खोज पाए थे। इसके विपरीत उनका मानना था कि अगर विनिमेयता (convertibility) को मंजूरी दे दी जाए तो कभी भी नोटों की अधिकता जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा। अगर बैंक अपने मानदंडों से जुड़े रहें तो वे कारोबार की जरूरतों को पूरा करते हैं और नोटों की अधिकता जैसी स्थिति नहीं आती। इस काल में स्कॉटलैंड में बैंकों के बीच एक-दूसरे के नोट सम मूल्य पर स्वीकारे जाते थे, साथ ही विभिन्न बैंकों के नोटों के सम मूल्य पर समाशोधन की व्यवस्था भी अस्तित्व में थी। और कुछ जगहों पर बैंक नोटों का अनुषंगी बाजार भी विकसित हो चुका था जिसमें नोट जारी करने वालों की भुगतान क्षमता की परख हो जाती थी। अगर आधुनिक काल में मुक्त मुद्रा हो तो कई नई तरह की घटनाएं देखी जा सकती हैं, जैसे साझा खाते या वाणिज्यिक पत्र या बैंक प्राप्तियां या फिर बंधक आधारित व्युत्पन्न (mortgage based derivatives), आधार मुद्रा को लेकर किसी भी वादे की पूर्ति के लिए आभासी मुद्रा का चलन देखने को मिल सकती हैं। क्या हम फिर से मुक्त बैंकिंग देख सकते हैं?

एफ.ए. हायक और अन्य अर्थशास्त्रियों ने ऐसी मुद्राओं को लेकर कई सुझाव दिए हैं, जो विभिन्न किस्म के सामान और सेवाओं के लिहाज से पर्चेसिंग पावर की गारंटी दे सकते हैं, जिसके चलते आधार मुद्रा की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। इस वक्त यह एक खयाली पुलाव लग सकता है, लेकिन निकट भविष्य में हकीकत बन सकता है, अगर हम अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में हो रहे मौद्रिक घटनाक्रम को देखें। आज स्वर्णमान जैसी कोई बात नहीं है, फिर भी दुनिया भर में बड़े पैमाने पर बिना किसी दिक्कत भुगतान किया जा सकता है। क्या हम नोट जारी करने में सरकार के एकाधिकार के बगैर कागजी मुद्रा की कल्पना नहीं कर सकते ? या किस तरह से हम सरकार को अलग रखकर एक ऐसी संस्थान का गठन करें कि जो हमें कागजी मुद्रा जैसी पूंजी की आपूर्ति करते रहे? यही वह सवाल है जो रिकार्डो के वक्त से पहले भी पूछा गया था। 19वीं सदी के पहले और दूसरे दशक में बुलियन कमेटी की बैठक के दौरान, रिकार्डो कागजी मुद्रा का अधिकार बैंक ऑफ इंग्लैंड या सरकार को देने के पक्षधर नहीं थे। वह एक नेशनल बोर्ड ऑफ करेंसी का गठन चाहते थे जो आमतौर पर तय रहने वाली कागजी मुद्रा को जारी रखने का काम देखता। अगर आपातकालीन परिस्थितियों में इसकी मात्रा में इजाफे की दरकार हो तो इजाफे की संभावित मात्रा के खुलासे के साथ इसके लिए संसद से अनुमति ली जा सकती थी। रिकार्डो की योजना में न तो सेंट्रल बैंक के लिए कोई जगह थी और न ही सरकार को अधिकार की या फिर जनता की जानकारी के बगैर मुद्रा में इजाफे की। रिकार्डो आंतरिक स्तर पर मुद्रा के संचलन के लिए भी बुलियन के इस्तेमाल के खिलाफ थे। वह सोने के इस्तेमाल को अंतरराष्ट्रीय कारोबार तक के लिए ही सीमित कर देना चाहते थे। इसीलिए इंग्लैंड ने उनके इग्नोट प्लान को उनकी मौत के लगभग सौ साल बाद 1925 में स्वीकार लिया। यह बिना आधार मुद्रा के वैध मुद्रा तैयार करने का एक तरीका है। रिकार्डो जहां आंतरिक भुगतान के लिए सोने का इस्तेमाल बंद कराना चाहते थे, आज अंतरराष्ट्रीय लेन-देन कम्प्यूटर और ई-मनी की मदद से विदेशी विनिमय को भी बिना सोने के इस्तेमाल के ही अंजाम दे देता है। तो क्या हम बिना किसी आधार मुद्रा के वैध मुद्रा की राह पर नहीं हैं?

सोने को एक बर्बर अवशेष कहने वालों में केन्स अकेले नहीं थे। प्लेटो और यहां तक कि रिकार्डो भी सोने को केवल आंतरिक मुद्रा संचलन के लिए बैंकों के वॉल्ट में रखने के लिए ही धरती के गर्भ से बाहर निकालने के पक्षधर नहीं थे। यूरो डॉलर का विकास, सोने के बगैर अंतरराष्ट्रीय विनिमय की ओर ही एक और कदम है। हायक ऐसी परिस्थिति की भी कल्पना करते हैं, जिसमें ब्रांडनेम के सही इस्तेमाल की बदौलत विभिन्न प्रकार की वैध मुद्रा (fiat money) देखने को मिलती है। इससे बैंक अपनी कागजी मुद्रा एक तय पर्चेसिंग पावर या किसी सूचकांक से संबंध के साथ जारी करेंगे। कल्पना तो एक ऐसी कागजी मुद्रा की भी की जा सकती है जो कीमत के लिहाज से कुछ वस्तुओं या वस्तुओं के समूह का प्रतिनिधित्व करे। हमें इस बात को याद रखना चाहिए कि बचत का उपयोग हर एक व्यक्ति के लिए अलग होता है। कुछ बचतकर्ता खाने-पीने के सामान में मूल्यों में स्थिरता चाहते हैं तो कुछ अन्य आम जीवनयापन सूचकांक तो कुछ वस्तुओं या सेवा के किसी समूह के मूल्यों में स्थिरता की अपेक्षा कर सकते हैं। बैंक वैध मुद्रा के इस्तेमाल में ऐसी विविधता के चलते चलन में अलग-अलग वैध मुद्रा जारी कर सकती है। अगर जर्मनी की अतिस्फीति (hyper-inflation)(1923-24) को  भूमि के समर्थन के साथ जारी वैध मुद्रा से काबू किया जा सकता था और आज आधुनिक युग में लेटिन अमेरिकी देशों में महंगाई कागजी मुद्रा के चलन के साथ 30 से 40 फीसदी की दर से बढ़ रही है तो आसानी से माना जा सकता है कि प्रो. हायक की मुद्रा की सोच कितनी कारगर हो सकती है। ऐसी वैध मुद्रा के लिए बैंकों में प्रतिस्पर्धा में चुस्त-दुरूस्त ही बच सकेगा और नाकारा की अपने-आप ही छुट्टी हो जाएगी। इसलिए वस्तु आधारित आधार मुद्रा हो या रिकार्डो और हायक के विचारों की वैध मुद्रा या बिना आधार मुद्रा के मूल्य आधारित मुद्रा, मुक्त बैंकिंग प्रणाली कारगर होती है। साबित तो यहां तक किया जा सकता है कि यह पूरी तरह से बिना किसी बाधा या हानिकारक सरकारी हस्तक्षेप के काम करती है।

मुक्त बैंकिंग प्रणाली की कार्यप्रणाली

अगर मुक्त मुद्रा की स्थापना की जा सकती है तो फिर क्या यह समस्याओं से व्यवस्थित तरीके (या बैंकों का ज्ञात तरीके से संचालन) से निपट सकती हैं? इस संबंध में हमें इन तीन संबंधित सवालों के जवाब तलाशने होंगेः (1) क्या वास्तव में बैंकों में जमाकर्ताओं द्वारा एक साथ धन निकालने की भगदड़ का डर उतना सच्चा है, जितना कि बताया जाता है? (2) सेंट्रल बैंक या सरकार द्वारा लादे गए प्रतिबंध समस्या के बढ़ने या फिर उसके हल में बाधा बनने के लिए कितने जिम्मेदार होते हैं? (3) मुक्त मुद्रा की परिस्थितियों में क्या हम बैंकों से जमा निकालने की होड़ या प्रवृत्ति को रोकने के लिए कोई उपाय कर सकते हैं, या कोई ऐसा कदम उठा सकते हैं जो इसे तत्काल रोक दे?

इन तीनों संबंधित सवालों के जवाब न केवल वास्तविक इस्तेमाल में मुक्त मुद्रा की श्रेष्ठता बल्कि उसकी व्यावहारिकता के बारे में भी बता देंगे। इतिहास की बात की जाए तो बैंकों का ऐसा संकट अमेरिका को छोड़कर बाकी के देशों में कभी इतना गंभीर नहीं हुआ। हर उस देश में जहां वस्तु मुद्रा आधारित मुक्त बैंकिंग है, कुछ ही मामलों में यह संकट गंभीर दिखाई देता है। अमेरिका और अन्य देशों के अनुभवों के इस अंतर की वजह अमेरिका में बड़ी तादाद में मौजूद प्रतिबंध हो सकते हैं। अन्य जगहों पर ऐसा संकट अतिविश्वास के कारण देखने को मिला। इस विश्वास का कारण यह सोच रही कि संकट काल में सेंट्रल बैंक से तो पूंजी मिल ही जाएगी। कई देशों में सेंट्रल बैंक या किसी निजी ऋणकर्ता के न होते हुए भी ऐसे संकट पेश नहीं आए। अमेरिका में अनधिकृत बैंकों के अलावा बैंकों में लोगों के भरोसे में कमी की घटनाएं बार-बार देखने को मिलीं। कई बार तो ऐसा ब्रांच बैंकिंग के अभाव के कारण हुआ, जिसके कारण बैंकों का कार्यक्षेत्र बहुत ही कम दायरे में सिमटा होता था। राज्यों और संघीय कानूनों में अंतर के कारण अनुरुप बैंकिंग प्रणाली विकसित नहीं की जा सकी। इसके अलावा, कानूनी प्रतिबंध भी बहुत ज्यादा थे, जैसे मांग जमा पर मुद्रा के भुगतान के निलंबन पर प्रतिबंध, मांग जमा को बिना किसी ब्याज के हासिल करने पर जोर आदि। नोटों की वापसी या जमा को अस्थायी तौर पर रोकने की कोई व्यवस्था नहीं थी, या फिर देरी से भुगतान पर किसी ब्याज दर की। राज्यों और संघीय कानूनों में अंतर ने कई बैंकों को गैरकानूनी तरीके अपनाने के लिए उकसाया। साथ ही बैंकों की परिसंपत्तियों के भुगतान के लिए कोई प्रभावी मुद्रा बाजार ही नहीं था। साथ ही संघीय आरक्षित निधि प्रणाली के प्रयास भी देर से या आधे-अधूरे मन से किए गए होते थे। एक-दूसरे के विरोधी प्रयोजनों से किए गए इन प्रतिबंधों ने इस सदी में अमेरिका में अनधिकृत बैंकों और आए रोज की बैंकों की नाकामी को जन्म दिया। महामंदी (1929-1935) के दिनों में डॉलर के अवमूल्यन के भय ने बैंकों से नगदी निकालने की होड़ को जन्म दिया था, हालांकि बैंकों के कामकाज को लेकर किसी को कोई आशंका नहीं थी।

कई बार बैंकों पर आरक्षित निधि बनाए रखने का दबाव ही कई बैंकों में एक साथ भगदड़ का कारण बना है। उस जर्मन चांसलर का किस्सा तो आपने सुना ही होगा जिसने हर टैक्सी स्टैंड पर दो टैक्सियों का खड़ा रहना अनिवार्य करवा दिया था और तीसरी टैक्सी यात्रियों को ले जाती थी ताकि लोगों को हर वक्त टैक्सी मिल सके। लेकिन उनकी सोच नाकाम ही साबित होकर रह गई क्योंकि हर वक्त दो टैक्सियां तो स्टैंड पर ही खड़ी रह जाती थीं। यही बात आधार मुद्रा के आरक्षित कोष की सोच पर भी लागू होती है जो जरूरत के वक्त कम पड़ सकता है। लेकिन आरक्षित कोष को लेकर नियमों का बंधन उन्हें एक-दूसरे की मदद कर विश्वास बढ़ाने की कोशिश भी नहीं करने देगा। अगर मौका दिया गया तो कारोबारी समाज का व्यावहारिक ज्ञान एक-दूसरे को मदद करने की व्यावहारिक प्रणाली खोज निकालेगा। मुक्त मुद्रा की परिस्थितियों में आरक्षित कोष का खुलकर इस्तेमाल हो सकेगा, संकट की स्थिति में ज्यादा ब्याज देकर दूसरों के कोष का इस्तेमाल किया जा सकेगा। ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि बैंक छूत की तरह फैलने वाली जमा निकालने की होड़ को अपने ही हित में रोकना चाहेंगे। अगर परिसंपत्ति आधारित व्युत्पन्न (डेरिवेटिव) विकसित किया जाता है तो ऐसे व्युत्पन्नों का बाजार ही समस्या को हल कर देगा। पिछले अनुभवों के अध्ययन से यह बात सामने आई है कि दरअसल अधिकांश मामलों में बैंकों ने कुछ उपाय करने में काफी देर कर दी और बैंकों को मुद्रा की ऐसी मांग की कोई पर्याप्त पूर्वसूचना नहीं मिली जबकि मुक्त बैंकिंग में परिवर्तन के साथ आने वाली मांग का इलाज उसी जगह किया जाता है, जहां पर उसकी तेजी से साथ जरूरत होती है। यह कदम अपने आप ही उठा लिया जाता है, फलस्वरूप डिपॉजिट निकालने की छूत जैसी बीमारी के इतना गंभीर रुप ले लेने की स्थिति ही नहीं आती।

आइए एक और परिस्थिति का अध्ययन करें, जहां बैंकों को बैंकनोट जारी करने की और अपने स्तर पर जमा के इस्तेमाल की पूरी आजादी हो। कई बार डिपॉजिट के लिहाज से मांग में परिवर्तन देखने को मिलता है। कई बार लोग जमा करने की बजाय नोट हासिल करना चाहते हों, भले ही उनका इरादा ऐसा अपनी कुल जमा से करने का न हो। बैंकिंग की वर्तमान प्रणाली में जब ग्राहक बैंकों में डिपॉजिट की बजाय नोट निकालने में ही जुट जाते हैं, बैंकों के पास का कोष कम होने लगता है और बैंक और रिजर्व तैयार करने की कोशिश करते हैं ताकि ग्राहकों को नोट दिए जा सकें। मुक्त बैंकिंग में ऐसी नौबत आती ही नहीं। बैंक खुद ही डिपॉजिट से बैंक नोट और इसके उलट कदम को उठाने में सक्षम होते हैं, अपने सामान्य आरक्षित कोष को छूए बगैर, जिसे वे आधार मुद्रा की मांग को पूरा करने के लिए रखते हैं। वर्तमान प्रणाली में हमें कई बार बेमतलब की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मुक्त बैंकिंग में ऐसी परिस्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा क्योंकि यहां बैंकों में विश्वास की कमी की समस्या नहीं होगी। विभिन्न प्रकार की मुद्राओं या आभासी मुद्रा की मांग में परिवर्तन तो गाहे-बगाहे होते रहने की गुंजाइश है। इसे मुक्त मुद्रा की मदद से हल किया जा सकता है, लेकिन ऐसा प्रबंधित मुद्रा (managed money) की वर्तमान प्रणाली में संभव नहीं है।

वर्तमान परिस्थिति लापरवाह और बेईमान किस्म के लोगों को बैंकिंग कारोबार में प्रवेश के लिए उकसाती है, क्योंकि सेंट्रल बैंक को ऐसे लोगों की भी मदद करना होती है जो इस मदद के लायक नहीं हैं। हकीकत तो यह है कि ऐसी बेईमान बैंकों को महज इसलिए बचाया जाता है कि ये समूचे बैंकिंग तंत्र को ही न ढहा दें और उनको प्रतिस्पर्धा के साथ निकाल बाहर करने की भी कोई व्यवस्था नहीं होती। कई बार, सेंट्रल बैंक के एकाधिकार के रहते मुद्रास्फीति की स्थिति या ब्याज दरों में नाममात्र के परिवर्तन से भी संकट की स्थिति पैदा हो जाती है। इसलिए सेंट्रल बैंक का विनियामक के तौर पर काम नहीं बल्कि उसकी मौद्रिक नीति विश्वास में कमी का कारण बनती है। इसका मतलब यह है कि पहले सेंट्रल बैंक समस्या का कारण बनती है और फिर उसे समाप्त करने के प्रयास करती है। यानी बिना किसी उपयोगी उद्देश्य के कई आर्थिक समस्याओं को जन्म दे देती है। यानी कि बैंकिंग प्रणाली को स्थायित्व देने का जिम्मा जिनके पास है, वही विश्वास का संकट पैदा कर देते हैं।

क्या मुक्त मुद्रा किसी ऐसे नये तंत्र को तैयार सकती है, जो बैंकों में जमा निकालने की होड़ से मचे संकट से निजात दिला सके? यह भविष्य की निगरानी सेवाओं के कामकाज के तौर-तरीकों में संभावित परिवर्तनों को भी भांप सकेगा। मांग जमा के भुगतान के लिए चेक जारी करने की बजाय वह साझा कोष खाते की ईक्विटी में देय किए जा सकते हैं। उनका भुगतान, उदाहरण के लिए यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया की यूनिट्स से किया जा सकता है या फिर वाणिज्यिक पत्रों के रूप में जिनका मुद्रा बाजार में रोजाना बड़ी मात्रा में लेन-देन होता है। निगरानी तंत्र के लिए तो कुछ मानक व्युत्पन्न (standard derivatives) भी तैयार किए जा सकते हैं। यह उपाय मांग योग्य बैंक कर्ज (demandable bank debt) के सही विकल्प तो नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसे व्युत्पन्नों के मूल्यों में परिवर्तन की संभावना बनी रहती है, जबकि कुछ ग्राहक बिना मूल्य के मामले में समझौते के भुगतान पाना चाह सकते हैं। मांग योग्य बैंक कर्ज की व्यवस्था का एक और लाभ यह है कि यह जमाकर्ताओं को बैंक की भुगतान क्षमता के बारे में हमेशा जागरूक रखता है। ऐसे उपाय हालांकि बैंकों को भगदड़ जैसी स्थिति से कुछ हद तक बचा सकते हैं, लेकिन हमें किसी और पुख्ता बचाव तंत्र को खोजना होगा। ऐसा करने का एक उपाय तो तुरंत भुगतान की शर्त में ढील के साथ किया जा सकता है, उदाहरण के लिए भुगतान को कुछ दिन, जैसे 15 दिन या एक महीने के लिए, रोकने का अधिकार देकर। ऐसे कदम में ब्याज का भुगतान करना होता है, ज्यादा दिन तक भुगतान रोकने पर ज्यादा ब्याज के भुगतान की व्यवस्था करनी होती है। स्कॉटलैंड में मुक्त बैंकिंग के दिनों में ऐसी "वैकल्पिक" धारा का इस्तेमाल किया गया था। ताकि बैंकों को भुगतान की व्यवस्था करने के लिए कुछ वक्त मिल जाए। अगर ऐसी व्यवस्था की जाती है तो बैंकों में एक साथ भगदड़ की स्थिति को तो टाला जा सकेगा ही साथ ही खराब बैंक बिना किसी साइड इफेक्ट के बाहर कर दिए जाएंगे। इस मामले में इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया जाता है कि स्कॉटिश बैंकों में इस विकल्प का कभी इस्तेमाल नहीं किया गया और इसलिए इसके प्रभाव को भी नहीं परखा जा सका। लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि ऐसे विकल्प की मौजूदगी के कारण ही बैंक में भुगतान के लिए भगदड़ जैसी स्थिति देखने को नहीं मिली और इसीलिए इसका इस्तेमाल ही नहीं किया गया। वैकल्पिक धारा का इस्तेमाल नहीं होने को बैंक प्रणाली की कमजोरी की बजाय अच्छा गुण माना जाना चाहिए। यह भी संभव है कि इसे इस्तेमाल नहीं करने वाली बैंक डूब जाए। ऐसा इसलिए हो सकता है कि बैंक को लगे कि उसने वैसे काम नहीं किया जैसा उसे करना चाहिए और इसलिए अब वैकल्पिक धारा के इस्तेमाल से भी कुछ संभव नहीं। अगर बैंक मूलतः मजबूत है तो ऐसे में वह वैकल्पिक धारा का इस्तेमाल करके खुद को बचा सकती है। कम से कम दूसरे बैंकों के असर से तो वह बच ही सकती है। एक तीसरा विकल्प, बैंकों को पर्याप्त पूंजी आधार रखने या बैंक के शेयरधारकों के प्रति दोहरे दायित्व तय करके आजमाया जा सकता है। स्वीडन और स्कॉटलैंड में ऐसा किया जा चुका है। हम डिपॉजिट के निजी बीमे की व्यवस्था (private deposit insurance) कर सकते हैं, जिससे जमाकर्ता अपने डिपॉजिट को लेकर आश्वस्त रह सकें। सरकार की मौजूदा करों से वित्तपोषण वाला डिपॉजिट बीमा योजना में प्रतिस्पर्धा और प्रोत्साहन का अभाव है, जो निजी जमा बीमा से संभव है। यह भी संभव है कि मुक्त मुद्रा प्रणाली में यह और अधिक बेहतर तरीके से काम करे। क्या हम यह कह सकते हैं कि ऐसी व्यवस्था बिना आधार मुद्रा के वैध या कागजी मुद्रा या फिर प्रतिस्पर्धी भुगतान प्रणाली में भी काम कर सकती है? शायद, आधुनिक युग में लगभग सभी देशों में कागजी मुद्रा, सोने में परिवर्तनीय है, ये वैध मुद्रा है और जैसा कि हमने हायक के प्रस्तावों के संदर्भ में चर्चा की थी, सामान्य पर्चेसिंग पावर की गारंटी ऐसी प्रणाली दे सकती है, जिसमें आधार मुद्रा की कोई जरूरत नहीं होगी। अब तक हमने आजमाने योग्य जिन संभावनाओं पर विचार किया है, वे अन्य तरीके की प्रणालियों, जैसे वैध मुद्रा जैसी मुद्रा और आधार मुद्रा के बगैर कागजी मुद्रा जैसी परिस्थितियों में काम कर सकती हैं। कम्प्यूटरों और सूचना प्रौद्योगिकी के युग में तो ऐसी व्यवस्थाओं को और अधिक बेहतर तरीके से काम करने की संभावनाएं भी ज्यादा हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि मुक्त मुद्रा प्रणाली में की जाने वाली व्यवस्थाएं, आज की मौजूदा प्रबंधन वाली मुद्रा की तुलना में, औद्योगिक उतार-चढ़ाव से बेहतर तरीके से निपट सकेंगी। हमने देखा कि कैसे सेंट्रल बैंक 1970 के दशक में महंगाई रोकने और 1980 के दशक में इसका हल खोज पाने में नाकाम रही थी। अधिकांश मामलों में सेंट्रल बैंक, आर्थिक विकास और स्थायित्व में रूचि लेने की बजाय राजनीतिक जरूरतों या सरकार के हितों के संरक्षण के अपने नजरिये से काम करती हैं। कई बार वे कोई कदम उठाने में बहुत ज्यादा देर कर देती हैं और कई बार वक्त रहते सूचना का अभाव उसकी मौद्रिक नीति की नाकामी का कारण बनता है। केयनेसीन का यह तर्क कि मुद्रा की आपूर्ति में इजाफे का व्यापार और वाणिज्य पर स्वस्थ प्रभाव पड़ता है, सबसे पहले 1705 में जॉन लॉ ने आजमाया था। उनकी नीति की नाकामी दुनिया ने 1716 में ही देख ली थी, जब जॉन लॉ ने इसी उद्देश्य के साथ 1716 में फ्रांस में बैंक की स्थापना की थी। (टी.ए. एशटन और आर.एस. सेयर द्वारा संपादित इंग्लिश मॉनेटरी हिस्टरी में जे.के. हॉर्सफील्ड का प्रकाशित लेख 'ड्यूटीज ऑफ ए बैंकर' देखें)। जॉन लॉ ने अपनी योजना की सिफारिश स्कॉटलैंड के लिए भी की, लेकिन स्कॉटलैंड ने उसे ठुकरा दिया। एक मुक्त मुद्रा प्रणाली में जहां ब्याज दर को स्वतः ब्याज की स्वाभाविक दर में परिवर्तित होने दिया जाता है, ताकि वास्तविक और अवास्तविक ब्याज दर में ज्यादा अंतर न रहे। यह तथ्य मौद्रिक कारकों से उपजने वाले कारोबारी उतार-चढ़ाव को खत्म कर देंगे।

इस चरण पर आकर एक सवाल उठाना जायज होगाः मुक्त या बिना हस्तक्षेप वाली मुद्रा का उद्देश्य क्या है, जबकि पूरी दुनिया में ही मौद्रिक प्रणाली पर सरकारों का ही अधिकार है? निश्चित ही किसी से ऐसा एकाधिकार छोड़ने की कल्पना करना बेकार है, जबकि इसके ढेरों लाभ हों। क्या सरकार के इस अधिकार को छोड़ने की कोई उम्मीद है? इसके बाद भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजरने की तैयारी के लिए ढेर सारे कारण हैं। पहला, यह विचार मौद्रिक प्रणाली के लिए एक दिशानिर्देशक मानक (benchmark) की तरह काम कर सकता है। यह संबंधित सरकार को बता सकता है कि नियमों में कहां ढील दी जा सकती है या लेन-देन के उपलब्ध दो विकल्पों में से किसे चुना जाना चाहिए। दूसरा कोई नहीं जानता कि कब किसी देश और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली किसी अभूतपूर्व संकट में फंस जाएगी। ऐसे हालात में तो अधिकारी डूबने से बचने के लिए किसी भी तिनके का सहारा लेने को तैयार रहते हैं। और इसीलिए दुनिया, एक सोचा-समझा विकल्प मुहैया कराए जाने पर मुक्त मौद्रिक प्रणाली को अपना सकती है। क्या हमने 1980 से निर्देश आधारित अर्थव्यवस्था को बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में तब्दील होते नहीं देखा है? 21वीं सदी की शुरूआत में बैंकिंग और अर्थतंत्र में ऐसे परिवर्तन की कल्पना किसने की थी? तीसरा मौद्रिक प्रणाली के क्षेत्र में भी हम अविनियमन की ओर ले जाने वाले कई परिवर्तन देखते हैं। उदाहरण के लिए, पूरी दुनिया में स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय बैंक की जरूरत महसूस की जाती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और वर्ल्ड बैंक का अब अंतरराष्ट्रीय लेन-देन पर कोई नियंत्रण नहीं रहा। 1975 के बाद से अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग में भारी बदलाव देखने को मिला है। कागजी या बैंक मुद्रा के इस्तेमाल को कम करने वाले कई व्युत्पन्न (derivatives) देखने को मिल जाते हैं। घरेलू बाजार में सरकारी मुद्रा से दूर जाने का सफर शुरू हो चुका है। कमर्शियल बैंकों की प्रकृति में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। अब हमारे पास विभिन्न किस्म के बैंक रसीद, वाणिज्यिक पत्र, क्रेडिट कार्ड हैं और विभिन्न किस्म के म्युचुअल फंड भी, जो आज मौद्रिक लेन-देन का एक बड़ा हिस्सा होते हैं। सेंट्रल बैंक को कई विनियमों (regulations) को बंद करना पड़ा है और बैंक नोटों और सिक्कों का इस्तेमाल और अधिक सीमित होता जा रहा है।

घरेलू लेनदेन में कोई भी कागजी मुद्रा की सोने में परिवर्तनीयता की बात नहीं करता। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में अब सोने में भुगतान नहीं होता। इसके विपरीत, डॉलर या येन में होता है और यह बड़ी मुद्राएं ब्याज दरों में बदलाव के साथ अपने स्थायी संबंधों को कायम रखती हैं। क्या हम इस प्रक्रिया को तेज करके मूल्य के लिहाज से गारंटी देने वाली वैध मुद्रा का विकास नहीं कर सकते? ऐसी वैध मुद्रा जिसके लिए सेंट्रल बैंक या मौद्रिक प्राधिकरण की बजाय केवल बाजार की प्रक्रिया ही काफी हो? क्या हम 21वीं सदी की शुरूआत में ही ऐसी स्थिति में पहुंचने की कल्पना कर सकते हैं? हम उम्मीद से ज्यादा तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। जब हायक ने मुद्रा के अराष्ट्रीयकरण (denationalisatiion) की बात की थी, तो उन्हें उम्मीद भी नहीं थी कि सूचना प्रौद्योगिकी दुनिया भर के अर्थतंत्र में इतनी तेजी से बदलाव ला देगी।

अब यूरो डॉलर अस्तित्व में है, जिसे कोई सरकार नियंत्रित नहीं करती। साथ ही यह निवेश के सुरक्षित और लाभदायक रास्ते भी खोल रहा है। हमारे पास इंटरनेट है जो किसी भी देश के नियंत्रण से बाहर है। हमारे पास सेमीकंडक्टर चिप है जिसकी मदद से एक व्यक्ति भी बड़ी ही सुगमता के साथ पूरी दुनिया से ढेर सारे मौद्रिक आंकड़े एकत्रित कर सकता है। ऐसी सूचना प्रणाली है जिससे कोई भी किसी और को पता चले बगैर ही दुनिया में किसी से भी संवाद साध सकता है। आज हमारे पास स्मार्ट कार्ड है, जिससे कोई भी व्यक्ति किसी को पता चले बगैर ही इलेक्ट्रॉनिक मनी के इस्तेमाल के साथ चीज खरीद या बेच सकता है। यह सब इतनी कम कीमत में और इतने अधिक सुचारू रूप से होता है कि इसे 'डिजीटल आजादी' की संज्ञा दे सकता है। मुद्रा का काम करने वाले कम्प्यूटर बिट्स दुनिया में कहीं भी किसी के लिए भी सुचारू रूप से काम कर सकते हैं। सब कुछ इतना सस्ता और बगैर किसी खास प्रतिबंध के होता है कि कहा जा सकता है कि मुद्रा के बारे में सरकार के नियंत्रण से मुक्ति मिलना शुरू हो गई है। इस मुद्रा के लिए कुछ आधारभूत नियामकों का ही बस हमें इंतजार करना होगा। खैर सरकार का मुद्रा नियंत्रण तो खत्म होता ही जा रहा है, क्योंकि वह वक्त ज्यादा दूर नहीं जब जमा और भुगतान का काम पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक हो जाएगा। ऐसे में निजी और सरकारी मुद्रा का सहअस्तित्व देखने को मिलेगा। सरकार की नाकाबिलियत जल्द ही उसकी मुद्रा को अर्थहीन और कम उपयोगी बना देगी।

अब तक हमने पिछले अनुभवों से यह दिखाने की कोशिश की कि प्रतिस्पर्धी मुद्रा, कागजी मुद्रा और डिपॉजिट बैंकिंग की कई समस्याओं को हल कर सकती है। क्या हम बड़े परिवर्तनों के एक ही वक्त में होने से आई प्रक्रिया में तेजी के दौरान भी ऐसी ही अपेक्षा कर सकते हैं, जैसा कि 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुआ था (यानी कम्प्यूटरों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और सूचना प्रौद्योगिकी का विकास)? इन दोनों की वजह से ही हमें ई-मनी और ई-कॉमर्स के जरिये सूचना युग में प्रवेश मिला। 21वीं सदी में हम मुक्त मुद्रा व्यवस्था में मुद्रा और बैंकिंग के विकास को किस तरह से देखते हैं? क्या हम मुक्त मुद्रा व्यवस्था पर ही आधारित वक्त देखेंगे? या मुक्त मुद्रा का सरकारी मुद्रा के साथ सहअस्तित्व? या ई-मनी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए सरकार कुछ ऐसे उपाय करेगी कि उसका मुद्रा पर नियंत्रण कायम रह सके और प्रबंधित मुद्रा का युग जारी रहे? ये ऐसे सुसंगत सवाल हैं जिनका जवाब जरूरी है। प्रबंधित मुद्रा व्यवस्था को कृत्रिम कहा जा सकता है क्योंकि मुद्रा का विकास विकासवादी प्रक्रिया के कारण है और इसलिए इसे किसी नियंत्रण या निर्देश की जरूरत नहीं है। निश्चित तौर पर मौद्रिक प्रणाली जैसी कोई सोच हो ही नहीं सकती, या फिर मुद्रा की सही मात्रा या तटस्थ मुद्रा की सोच। मुद्रा का जन्म बाजार की प्रक्रिया से हुआ है। यह एक आर्थिक अच्छाई है और अगर इसमें कोई खामी उभरकर सामने आती है तो बाजार ही इसे दुरूस्त करेगा। बाजार की प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि मुद्रा की सही मात्रा क्या है। सरकार द्वारा मुद्रा पर एकाधिकार गलत था, विकास की प्रक्रिया में एक रूकावट और अगर यह 21वीं सदी में समाप्त होता है तो ऐसा अर्थव्यवस्था में मुद्रा के इस्तेमाल के लिए ही होगा। एक आर्थिक अच्छाई के तौर पर मुद्रा तब बेहतर सेवा देगी।

ई-मनी का विकास मुद्रा की विकास प्रक्रिया का ही अगला चरण है। इसमें गति, लागत और गोपनीयता के अलावा कुछ भी क्रांतिकारी नहीं है। यह पूरी दुनिया में फैला हुआ है और दो लोगों को तीसरे के हस्तक्षेप के बगैर जोड़ता है, प्रकाश की गति से काम करता है। यह किसी देश की सीमाओं की बाधा के बगैर इस्तेमाल किया जा सकता है। यह सही मायनों में विश्वव्यापी है। संक्षेप में, यह उन वस्तु-विनिमय की तमाम दिक्कतों को हल कर देता है जिसकी हमें अरसे से तलाश थी। हम ई-मनी से ज्यादा कारगर विकल्प नहीं खोज सके थे।

शुरूआती दिनों में तंबाखू, जौ और शंखों-सीपियों-मोतियों (cowrie shells) का मुद्रा के तौर पर इस्तेमाल किया करते थे। इसके बाद धातु की मुद्रा का दौर आया और फिर कागजी मुद्रा और मियादी जमा का। हमें लेन-देन के माध्यम के लिए किसी सांकेतिक वस्तु की दरकार होती है। यह माध्यम तेज, ले जाने योग्य, विभाजन योग्य, संग्रहण योग्य होना चाहिए। इंसान ने अपनी कुशलता से इस जरूरत को पूरा करने के लिए कई उपाय खोजे, लेकिन हर उपाय के दोनों ही पहलू हैं। एक ओर तो यह जरूरत को पूरा करता है और दूसरी ओर कुछ समस्याएं खड़ी करता है। हमारे प्रयासों के दौरान हम पहले पहलू को ज्यादा से ज्यादा पाने की कोशिश करते हुए दूसरे पहलू से बचना या उसका हल खोजने का प्रयास करते हैं। मुद्रा के मामले में भी यही बात लागू होती है। हाल ही के वक्त तक दोनों ही किस्म के लोगों, क्रेता और विक्रेता, को एक अकाउंट से दूसरे अकाउंट तक राशि को स्थानांतरित कराना पड़ता था। अब तो चेक या तार के जरिये ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है। हम ऐसा स्मार्ट कार्ड और माइक्रो चिप हमारे खाते की स्थिति बताकर मुद्रा का संचालन भी कर देता है। डिजिटल मुद्रा के स्मार्ट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड जैसे रूपों और इंटरनेट ने मौद्रिक प्रणाली को ही बदलकर रख दिया है। हालांकि यह नये उपाय वैध मुद्रा नहीं हैं, लेकिन वे वैध मुद्रा से ज्यादा बेहतर तरीके से काम करते हैं। अब कागजी मुद्रा की जरूरत कम हो गई है। दूसरी ओर लेन-देन के लिए करेंसी का इस्तेमाल ज्यादा परेशानी का सबब होता है। नगदी रखना खतरे से खाली नहीं होता और इसे अपने पास रखने से ब्याज का भी नुकसान होता है, जबकि स्मार्ट कार्ड से नगद लेन-देन में कोई नुकसान नहीं है और इसके अतिरिक्त ब्याज की भी कमाई होती है। कई उन्नत देशों में तो कागजी मुद्रा का इस्तेमाल बहुत ही कम हो गया है। हमने पहले भी देखा था कि कैसे बैंक ऑफ इंग्लैंड के अस्तित्व के बाद भी लंकाशायर इलाके में (1790-1830) डिस्काउंट बिल का इस्तेमाल होता था।

अगर सरकार ने हस्तक्षेप करके खेल नहीं बिगाड़ा तो ऐसा ही फिर हो सकता है। वास्तव में मुद्रा वही है जो मुद्रा कर सकती है। सेंट्रल बैंक के वैध मुद्रा से ज्यादा आज स्मार्ट कार्ड और क्रेडिट कार्ड को स्वीकारा जाता है। ई-मनी का इस्तेमाल इतना ज्यादा लोकप्रिय, तेज और सरल हो गया है कि इसने अमेरिका, कनाडा, पश्चिमी यूरोप और जापान में अपनी गहरी जड़ें जमा ली हैं। दक्षिण कोरिया, ताईवान, सिंगापुर और मलेशिया जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में ई-कॉमर्स लोकप्रिय होता जा रहा है। चीन और भारत ने भी बड़े सौदों में इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। भारत में बैंकों ने विभिन्न किस्म के कार्ड जारी करना शुरू कर दिए हैं। भारत के ग्रामीण इलाकों में भी कम्प्यूटरों का इस्तेमाल बढ़ने लगा है। ई-मनी का इस्तेमाल इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है कि किसी भी सरकार के कुछ करने से इसे प्रभावित नहीं किया जा सकता। कली को मसलने का वक्त निकल चुका है। अब तो यह बड़े हो चुके बच्चे की तरह है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। कोई देश कितना भी बड़ा या शक्तिशाली क्यों न हो, ई-मनी को रोकने की कोशिश नहीं कर सकता।

तो फिर इस तरह की ई-मनी का सेंट्रल बैंकों पर क्या असर हुआ है? ऐसा लगता है कि सरकार भले ही अपनी मुद्रा को ही वैध मुद्रा करार देती रहे, कारोबारी जगत इसे लेनदेन के लिए मान्यता नहीं देगा। ज्यादा से ज्यादा सेंट्रल बैंक की मुद्रा मौजूद और मुद्राओं में से एक हो सकती है। लेनदेन के लिए इसी के इकलौती मुद्रा होने के दिन अब लद गए। साथ ही सरकारी मुद्रा और अन्य किस्म की मुद्राओं के बीच कोई तय रिश्ता नहीं होगा, यानी कि सरकारी मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन का अन्य मुद्राओं पर असर जरूरी नहीं होगा। इस तरह अब सरकारी मुद्रा की मात्रा में परिवर्तन का मुद्रा की कुल आपूर्ति पर कोई असर नहीं होगा। हालांकि सरकार अब भी एक महत्वपू्र्ण आर्थिक कारक है और यह घरेलू लेनदेन में असर रख सकती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कारोबार में यह तुलनात्मक रूप से महत्वहीन हो जाएगी। वैश्वीकरण के फैलाव के साथ ही मौद्रिक नीति का असर कम या नगण्य हो जाएगा। विभिन्न सरकारों के लिए ऐसे में समझदारी भरा कदम यही होगा कि ई-मनी के कामकाज के लिए कुछ आधारभूत नियम तैयार किए जाएं और यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी इसका पालन करें। यह काम जितनी जल्दी होगा, बेहतर होगा क्योंकि मुक्त मुद्रा न केवल उन्नत बल्कि उन्नतिशील देशों में भी सर्वव्यापी होने वाली है। किसी भी दर से, जैसा कि हायक चाहते थे, सरकार का मुद्रा पर एकाधिकार खत्म होना चाहिए। और अगर सरकारी मुद्रा जैसी कोई चीज अस्तित्व में रहती भी है तो यह अन्य मुद्राओं की तरह होनी चाहिए, इकलौती मुद्रा की तरह नहीं।

संदर्भ सूचीः

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