स्वस्थ्य सरकारी नीतियों के सात सिद्धांत

इकोनॉमिक क्लब ऑफ डेट्रॉयट के समक्ष प्रस्तुत विचार

मैं सर्वप्रथम आप सभी का धन्यवाद करता हूँ कि आपने मुझे इस विशेष सभा में बोलने का सुअवसर प्रदान किया। इकोनॉमिक क्लब ऑफ डेट्रॉयट को दुनिया भर में विचारों के आदान-प्रदान के उत्कृष्ट मंच के रूप में जाना जाता है। और काफी लंबे समय से यह प्रतिष्ठित मंच उपलब्ध कराते रहने के लिए आप सभी सचमुच बधाई के पात्र हैं।

इस क्लब ने नीति विषयों पर सरकार, व्यवसाय और शिक्षा जगत के दिग्गजों के विचार सुने हैं। जिसमें परिवहन से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तथा अन्य अनेक क्षेत्रों के ज्वलंत प्रश्नों पर बारीकी से विचार किया गया है। मैकिनेक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में हम विशेष तौर पर शोध करते हैं और वर्तमान नीतिगत मसलों पर विस्तार से सुझाव देते हैं। यहाँ भी मैं कुछ ऐसे ही विषयों पर बोलने की सोच रहा था। पर अचानक कुछ खयाल आया और मैंने किसी खास विषय पर विस्तार से बोलने की अपेक्षा एक व्यापक दृष्टिकोण रखना बेहतर समझा, जो सभी मुद्दों पर समान रूप से लागू होता हो। मैं चाहता हूँ कि हम कुछ ऐसे व्यापक और आधारभूत सिद्धांतों के बारे में सोचें, जो सदियों के अनुभवों और आर्थिक ज्ञान पर आधारित हो। मेरे खयाल से वे शाश्वत सिद्धांत होंगे और सरकार के अंदर और बाहर के हमारे नीतिगत प्रयोगों के बारे में एक समझ बनाने में हमारी मदद करेंगे।

हमारे पेशे में यह कहने का चलन है कि मैं हर मुद्दे पर खुले दिमाग से सोचता हूँ। आपके लिए इसका चाहे जो भी अर्थ हो, पर मेरे खयाल से इसका मतलब खाली दिमाग तो कत्तई नहीं है। सदियों के अनुभवों से हमने कुछ सीखा है। इसे कोई पूर्वाग्रह नहीं कहना चाहिए यदि हम बिना किसी तर्क के यह स्वीकार करते हैं कि सूरज पूरब में उगता है। जनतांत्रिक शासन व्यवस्था को तानाशाही अथवा राजशाही से बेहतर समझना कोई अंध विश्वास नहीं है। मैकिनेक सेंटर में हम इस दृढ़ आस्था के साथ ही किसी विषय पर विचार आरंभ करते हैं कि निजी संपत्ति और मुक्त बाजार व्यवस्था हमेशा राज्य नियंत्रित और केंद्रीकृत नियोजन से श्रेष्ठ होती है। यह सिर्फ एक सतही सोच नहीं है, बल्कि आज उन लोगों द्वारा एक स्थापित सत्य के रूप में स्वीकारा जाने लगा है, जो अपनी आँख और कान खुले रखते हैं तथा जिनके लिए विवेक, तर्क, तथ्य, प्रमाण, अर्थशास्त्र और अनुभव कुछ मायने रखता है।

जिस स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें से प्रत्येक किसी विशेष मुद्दे पर किस तरह लागू होता है, इस संबंध में हमारी राय अलग-अलग हो सकती है, पर ये सिद्धांत अपने आप में स्थापित सत्य हैं। इन्हें मैंने नहीं बनाया है। बल्कि मैंने इन्हें सिर्फ एक जगह इकट्ठा किया है। ऐसा नहीं है कि मुक्त अर्थ व्यवस्था के आधार स्तंभ सिर्फ ये ही हैं या सिर्फ यही सत्य है, लेकिन ये एक संतुलित और सम्यक विचार जरूर प्रस्तुत करते हैं। मेरा विश्वास है कि सरकार की प्रत्येक संरचना में बैठे लोग यदि इस दृष्टिकोण से चलें और मुख्य रूप से कानून बनाने वाले लोग यदि इसे समझें और पूरे विश्वास के साथ इसे लागू करें, तो हम अपेक्षाकृत अधिक सशक्त, मुक्त समृद्ध और पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सुशासित लोग होंगे।

सिद्धांत: 1 - स्वतंत्र लोग एक समान नहीं होते और एक समान लोग स्वतंत्र नहीं होते

सर्वप्रथम मैं यहाँ साफ कर देना चाहता हूँ कि हम यहाँ किस प्रकार की समानता की बात कर रहे हैं। हम यहाँ कानून के समक्ष हर आदमी की समानता की बात नहीं कर रहे हैं, जिसमें आपकी जाति, धर्म, लिंग, वर्ग, इत्यादि से ऊपर उठ कर आपको देखा जाता है तथा आप दोषी हैं या निर्दोष यह सिर्फ इस आधार पर तय होता है कि आपने कोई अपराध किया है या नहीं। यही पश्चिमी सभ्यता का आधार है। यद्यपि प्रायः हम इस पर पूर्णतः खरे नहीं उतर पाते हैं और मुक्षे आशंका है कि कोई कल इस धारणा का विरोध न करने लगे।

नहीं, मैं यहाँ जिस समानता की बात कर रहा हूँ, उसका संबंध आमदनी एवं भौतिक जगत से है- जो हम विनिमय, कार्य और व्यवसाय के बाजार में कमाते और उपार्जित करते हैं। मैं आर्थिक समानता की बात कर रहा हूँ। हम इस पहले सिद्धांत को लें और इसे  दो भागों में विभक्त करें।

स्वतंत्र लोग समान नहीं होते। जब लोगों को अपने रास्ते पर चलने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है, यानी, जब उन्हें अपनी भलाई तथा अपने परिवार की बेहतरी के लिए अपनी तरह से मेहनत करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है, तो इसका परिणाम बाजार में समान आमदनी के रूप में नहीं आता है। उनकी कमाई का स्तर अलग अलग होगा। और वे अलग अलग मात्रा में संपत्ति खड़ी करेंगे। कुछ लोग जहाँ इस बात का रोना रोएंगे और गंभीरता पूर्वक अमीरों और गरीबों के बीच की खाई के बारे में बात करेंगे, वहीं मेरा मानना है कि मनुष्य को एक मुक्त समाज मिलना ही एक बड़े किस्मत की बात है। दुनिया में हर आदमी अनूठा है और किसी भी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से अनेक मामलों में अलग है। तो हम ऐसा माहौल क्यों न बनाएँ, जिसमें सभी व्यक्ति का प्रदर्शन बाजार में एक जैसा हो। हम प्रतिभा के स्तर पर अलग हैं। किसी के पास अधिक प्रतिभा है या विशेष प्रतिभा है। और किसी को जीवन के उत्तरार्द्ध में जाकर अपनी प्रतिभा का पता चलता है अथवा कभी पता ही नहीं चलता पाता। सचिन तेंदुलकर बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी हैं। तो इसमें क्या आश्चर्य यदि उनके पास मुझसे ज्यादा पैसा है। क्या कैलॉग को 46 वर्ष की अवस्था में जाकर अपनी उद्यम शक्ति और मार्केटिंग प्रतिभा का पता नहीं चल पाया। इससे पहले वह अपने बड़े भाइयों के साथ काम करता था और कठिन परिश्रम कर सिर्फ 25 डॉलर प्रति सप्ताह ही कमा पाता था।

हम मेहनत करने की भावना एवं इच्छाशक्ति में एक दूसरे से अलग हैं। कुछ लोग कठिन मेहनत करते हैं, लंबे समय तक करते हैं और अनोखे अंदाज में करना जानते हैं। इसके कारण लोग हमारी मेहनत का मूल्य भी अलग-अलग लगाते हैं।

हमारी बचत क्षमता भी अलग-अलग है। अगर भारत के प्रधान मंत्री चुटकी बजाकर रातोंरात देश के सभी लोगों की आर्थिक दशा एक जैसी कर दें, तब भी कल इस समय तक आते-आते हमारी हैसियत अलग-अलग हो जाएगी। कुछ लोग पैसे खर्च कर देंगे, तो कुछ लोग बचा लेंगे। ये तीन कारण हैं, पर सिर्फ यही तीन कारण नहीं हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि लोग आर्थिक रूप से समान नहीं हो सकते।

मेरे प्रथम सिद्धांत का दूसरा अंश, समान लोग स्वतंत्र नहीं होते, असली मुद्दे को छूता है। मुझे धरती पर एक भी ऐसा व्यक्ति दिखाइए, जिनकी आर्थिक हैसियत बराबर है, तो मैं आपको तुरंत ऐसे लोग दिखा दूंगा, जो स्वतंत्र नहीं हैं। क्यों?

एक मात्र उपाय, जिसके द्वारा समाज के सभी लोगों की आय और संपत्ति समान करने की, अगर थोड़ी-सी भी, गुंजाइश है, तो वह यह है कि सभी के सिर पर बंदूक टिका दी जाए। आपको सभी को समान करने के लिए शब्दसः शक्ति का इस्तेमाल करना होगा। आपको कठोर सजा और मुत्युदंड के प्रावधान के साथ आदेश देने होंगे। ये आदेश इस प्रकार होंगे: खबरदार! तुम किसी से बेहतर नहीं कर सकते। दूसरे से कठिन मेहनत करने की तुम्हें इजाजत नहीं। दूसरे से बेहतर तरीके से कार्य का निष्पादन मत करो। दूसरों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमानी पूर्वक पैसे की बचत मत करो। ऐसी वस्तु और सेवा मत पेश करो, जिसे लोग तुम्हारे प्रतियोगी के उत्पाद से ज्यादा पसंद करने लगें।

विश्वास कीजिए आप ऐसा समाज कभी नहीं चाहेंगे, जहाँ ऐसे आदेश हों। 1970 में साम्यवादी खमेर रुज शासन काल में कंबोडिया की स्थिति लगभग ऐसी ही हो गयी थी। परिणाम 4 साल से भी कम समय में कुल 80 लाख लोगों में से 20 लाख लोग मारे गये। सत्ता और शक्ति के शिखर पर बैठे कुछ संभ्रांत लोगों को छोड़ दिया जाए, तो बाकी लोग पाषाण काल से बेहतर किसी भी स्थिति में नहीं थे।

इस पहले सिद्धांत से कौन-सा सबक मिलता है? लोगों की आय के अंतर के मुद्दे पर मत अटक जाइए, वह व्यक्ति के अपने-अपने रास्ते पर अपने तरीके से चलने के कारण पैदा होता है। अगर वह किसी राजनीतिक बाध्यता के कारण हे, तो उस बाध्यता से मुक्त होने की कोशिश जरूर कीजिए। लेकिन भूल से भी असमान लोगों को दबा-दबा कर एक समान मत कीजिए। आप कभी ऐसा नहीं कर पाएंगे। बल्कि इससे समाज में वैमनस्य ही बढ़ेगा तथा लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे।

उदाहरण के तौर पर तरह-तरह के कर। ये लोगों को बराबर नहीं करते, बल्कि मेहनती और उद्यमी लोगों को देश छोड़ने अथवा दूसरे व्यवसाय में चले जाने के लिए मजबूर करते हैं और आराम से कमा-खा रहे बाकी लोगों को गरीब बनाते हैं। अब्राहम लिंकन की प्रसिद्ध उक्ति है, आप किसी एक को नीचे खींच कर किसी दूसरे को ऊपर नहीं उठा सकते।

सिद्धांत : 2 - आप उनकी सार-संभाल करते हैं, जिनके आप मालिक हैं। जो किसी का नहीं या सबका है, उसका तो भगवान ही मालिक है।

यह निजी संपत्ति के चमत्कारिक प्रभाव का राज बताता है। तथा दुनिया भर में समाजवादी व्यवस्था की दुर्गति का भी कारण बताता है।

पुराने सोवियत संघ में सरकार ने केंद्रीकृत योजना तथा राज्य की मिल्कियत की घोषणा कर दी। वे निजी संपत्ति को बिल्कुल समाप्त या न्यूनतम कर देना चाहते थे, क्योंकि उनका मानना था कि निजी स्वामित्त्व स्वार्थी और उत्पादन विरोधी होता है। उनका तर्क था कि सरकार के हाथों संसाधन का इस्तेमाल सबके फायदे के लिए होगा।

एक समय जो किसानों का भोजन था, वही सबका भोजन हो गया और लोग भूखों मरने लगे। जो फैक्टरी कभी उद्यमियों की होती थी, वह सार्वजनिक हो गयी और उसमें इतने भौंडे सामान बनने लगे, जो देश से बाहर कहीं बिक ही नहीं सकता था।

अब हम यह जान पा रहे हैं कि पुराना सोवियत साम्राज्य वस्तुतः एक के बाद एक अपने देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करता रहा। समाजवाद के सभी प्रयोगों का यही सबक है: समाजवादी जहाँ यह समझाने में काफी आगे रहते हैं कि आपको आमलेट बनाने के लिए अंडा तोड़ना ही होगा, वहीं सच यह है कि वे कभी आमलेट नहीं बना पाए। वे सिर्फ अंडे ही तोड़ते रह गये।

अगर आप यह सोचते हैं कि आप दूसरे की संपत्ति का खयाल रखना जानते हैं, तो आप एक महीने के लिए जाकर किसी और के घर में रहें या फिर किसी और की साइकिल चलाएँ। मैं दावा करता हूँ कि एक माह बाद न तो उसका घर और ना ही उसकी साइकिल वैसी नजर आएगी, जैसी उतने ही समय के बाद आपकी नजर आएगी।

अगर आप समाज के किसी दुर्लभ संसाधन को बर्बाद करना चाहते है, तो आपको कुछ और करने की जरूरत नहीं। बस उसे उन लोगों के हाथों से छीन लीजिए, जिन्होंने उसकी खोज की या जो उससे जीविका चलाते है, और उसका प्रबंधन किसी केंद्रिय सत्ता के हाथो सौंप दीजिए। एक झटके में ही आप सब कुछ बर्बाद कर देंगे। दुर्भाग्य से सरकार हमेशा हर स्तर पर ऐसे-ऐसे कानून बनाने में लगी रहती है, जो एक-एक कर निजी संपत्ति के अधिकार को खत्म कर उसे सार्वजनिक हाथों में डालते हैं।

सिद्धांत: 3 - सही नीति के लिए हमें दूरगामी और सभी पर होने वाले प्रभाव को देखना होगा, न कि चंद लोगों पर अल्पकालिक प्रभाव को।

यह सही हो सकता है, जैसा कि ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनर्ड केंस ने एक बार कहा था, कि लंबे अंतराल में हम सभी की मौत निश्चित है। लेकिन इससे किसी को ऐसी नीति लागू करने का अधिकार नहीं मिल जाना चाहिए, जो बहुत से लोगों को भविष्य में होने वाले नुकसान की कीमत पर कुछ लोगों को आज लाभ पहुँचाती हो।

मैं ऐसी कई नीतियों को याद कर सकता हूँ। जब लिंडन जॉनसन ने 1960 के दशक में एक महान समाज की कल्पना की थी, तो उनकी सोच थी कि कुछ लोगों को कल्याण चेक मिलेंगे। अब उसके परिणाम देखने को मिल रहे हैं, सरकार द्वार प्रदत्त इस अधिकार ने समाज में अकर्मण्यता फैलायी, परिवार तोड़े, एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी को पराश्रित बनाया और निराशा फैलायी, करदाताओं से काफी धन वसूला तथा इससे ऐसे बुरे सांस्कृतिक लक्षण सामने आए, जिसे शायद कई पीढ़ियों के बाद ही ठीक किया जा सके। इसी तरह से अतिशय खर्च तथा सरकार के विस्तार की नीति ने जहाँ शुरू में कुछ लोगों को लाभान्वित किया, वहीं दशकों तक राष्ट्र की अर्थव्यवस्था और नैतिक मूल्यों को घुन की तरह खाते रहे।

यह सिद्धांत वस्तुतः हमें संपूर्णता में सोचने की प्रेरणा देता है। यह कहता है कि हमें सतही फैसले नहीं लेने चाहिए। अगर एक चोर बैंक लूटकर लूटा गया सारा धन बगल वाले बाजार में खर्च कर डालता है, तो आपकी सोच वैसी स्थिति में संपूर्ण नहीं मानी जाएगी, यदि आप बाजार में पूछताछ कर इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि चोर ने बाजार में पूंजी लाकर अर्थव्यवस्था में तेजी लायी है।

हमें याद रखना चाहिए कि पिछले दिनों के नीति-निर्माताओं ने जिस कल को नजरंदाज करने की सलाह दी थी, उनके उसी भावी कल को हम वर्तमान के रूप में आज भुगत रहे हैं। अगर हमें एक जिम्मेदार व्यस्क बनना है, तो हम बच्चों जैसा व्यवहार नहीं कर सकते, जिनकी सोच खुद तक ही सीमित होती है और जो अभी और यहाँ से आगे नहीं सोच सकते।

सिद्धांत: 4 - आप जिस चीज को प्रोत्साहित करते हैं, वह बढ़ती है; तथा जिस चीज को हतोत्साहित करते हैं, वह कम होती जाती है।

मनुष्य के रूप में मैं और आप प्रोत्साहन पर काम करने वाले प्राणी हैं। प्रोत्साहन के प्रति हम प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। और कभी-कभी इस प्रोत्साहन का हमारे व्यवहार पर काफी तीव्र असर होता है। इस बात को नहीं समझने वाले नीति निर्माता उटपटांग हरकतें करते रहते हैं, जैसे - कुछ गतिविधियों पर कर बढ़ा देते हैं और सोचते हैं कि हम पहले की तरह वे कार्य उतनी ही मात्रा में करते रहेंगे, मानो हम लोग बकरी - भेड़े हों और हलाल होने के लिए ही काम कर रहे हों।

अमेरिका का एक उदाहरण गौरतलब है। जॉर्ज बुश (पहले वाले) ने 1988 में कर में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं करने का वचन दिया था। पर कुछ दबावों के तहत काँग्रेस ने 1990 में नौका, हवाई जहाज एवं गहनों पर कर बढ़ा दिया। उसका सोचना था कि ये चीजें अमीर लोग रखते हैं, इसलिए इन पर अतिरिक्त कर लगाना चाहिए। उन्हें इस कर वृद्धि से पहले साल 31 मीलियन डॉलर के अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति का अनुमान था, पर हुआ कुछ और ही। उन्हें सिर्फ 16 मीलियन डॉलर की ही प्राप्ति हुई। इसके साथ ही उन्हें 24 मीलियन डॉलर बेरोजगारी भत्ते पर खर्च करने पड़े। कारण यह था कि कर में वृद्धि के कारण उपर्युक्त तीन उद्योगों में भारी संखया में मजदूरों की छंटनी की गयी। आप खुद सोच सकते हैं कि कानून बनाने वाले जब बिना प्रोत्साहन का ध्यान रखे कोई कदम उठाते हैं, तो क्या होता है। 3.1 करोड़ की उम्मीद कर सिर्फ 1.6 करोड़ की प्राप्ति और उसके लिए भी 2.4 करोड़ डॉलर का खर्च। इससे क्या सीख मिलती है।

आप परिवार को तोड़ना चाहते हैं? तो अभिभावकों के बीच बँटवारा होने पर बड़ी आर्थिक मदद की व्यवस्था कर दीजिए। बचत और निवेश घटाना चाहते हैं? तो उन पर दो गुना कर लगा दीजिए तथा अधिक संपत्ति अर्जित होने पर भी अतिरिक्त कर लगा दीजिए। आप चाहते हैं कि लोग काम न करे? कर इतना बढ़ा दीजिए कि लोगों को लगने लगे कि काम करने से कोई लाभ नहीं।

फिलहाल सरकार का अधिक ध्यान इस प्रश्न पर लगा रहता है कि मंदी ओर राजस्व की कमी से होने वाले घाटे की भरपाई कैसे की जाए। मैकिनेक सेंटर का मानना है कि सरकार इस समस्या से ठीक उसी तरह निपटे जैसे पूरे देश भर के परिवार ऐसी समस्या से निपटते हैं: यानी, खर्चे में कटौती। यह विशेषकर तब और भी जरूरी हो जाता है, जब हम एक कमजोर अर्थव्यवस्था को गतिशील कर रोजगार और राजस्व बढ़ाना चाहें। डॉक्टर मरीज का खून बहाने से यथासंभव बचना चाहते हैं।

सिद्धांत: 5 - दूसरे का धन लोग बेरहमी से उड़ाते हैं और अपना धन जान लगाकर भी बचाते हैं

कभी आपको आश्चर्य हुआ है कि जब सरकार 600 डॉलर का हथौड़ा और 800 डॉलर का टॉयलेट शीट खरीदती है? आप पूरे अमेरिका में घूम आइए, आपको शायद ही कोई मिले जो इतनी दरियादिली से अपना पैसा खर्च करता हो। फिर भी सरकार में प्रायः और कुछ अन्य मामलों में भी यदा कदा इसी प्रकार पैसे खर्च किए जाते हैं। आखिर क्यों? क्योंकि कमोबेश ऐसे मामलों में खर्च करने वाला किसी और का पैसा खर्च कर रहा होता है। अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रिडमैन ने कुछ समय पूर्व इसे थोड़ा स्पष्ट किया था। उनके अनुसार धन सिर्फ चार प्रकार से खर्च किया जाता है। जब आप अपना धन अपने ऊपर खर्च करते हैं, तो कभी-कभी ही गलती करते हैं। गलतियाँ काफी कम होती हैं और लंबे समय पर होती हैं। इसमें कमाने वाले, खर्च करने वाले तथा इसका अंतिम लाभ उठाने वाले के बीच रिश्ता सर्वाधिक मजबूत, सीधा और निकट का होता है।

जब आप अपने पैसे से किसी दूसरे के लिए कोई उपहार खरीदते हैं, तो आप यह ध्यान जरूर रखते हैं, कि आप जो कुछ भी खरीदें सामान उतनी कीमत का तो हो ही यानी, आप ठगे न जाएँ। पर दूसरे के लिए उस सामान का क्या महत्त्व होगा या वह उसके लिए कितना जरूरी होगा, इसका ध्यान नहीं रखते।

जब आप किसी दूसरे के पैसे से अपने लिए कुछ खरीदते हैं, उदाहरण के लिए जब खर्च खाता से भोजन खरीदते हैं, तो आप यह जरूर सोचते हैं कि बढ़िया से बढ़िया चीज खरीदी जाए, पर वह सस्ता भी हो उसकी उतनी फिक्र नहीं करते।

और अंत में, जब आप किसी दूसरे के पैसे से किसी तीसरे के लिए कोई चीज खरीदते हैं, तो कमाने वाले, खर्च करने वाले और लाभान्वित होने वाले के बीच संबंध काफी दूर का हो जाता है और यहाँ बर्बादी और घपले की संभावना भी सर्वाधिक होती है। इस पर गौर से सोचिए कोई एक व्यक्ति किसी दूसरे का पैसा किसी तीसरे पर खर्च करे। यही तो सरकार करती है।

लेकिन यह सिद्धांत सिर्फ सरकार के लिए ही प्रांसंगिक नहीं है। 1993-94 की बात याद आती है, जब मैकिनेक सेंटर ने मिशिगन शिक्षा संगठन के स्वार्थपूर्ण वक्तव्य को गंभीरता से लेते हुए उस पर कुछ पड़ताल की थी। इस संगठन ने कहा था कि वह शिक्षा जिला द्वारा दिये जाने वाले किसी भी प्रतियोगी विद्यालय सहायक ठेकों, जैसे - बस, भोजन या रखरखाव, आदि का कहीं भी, कभी भी, विरोध करेगा। हमने पता लगाया, तो यह पता चला कि मिशिगन शिक्षा संगठन के अपने पॉश और आलीशान ईस्ट लांसिंग मुख्यालय में साफ सफाई और भोजन प्रबंधन पर अपना कोई भी पूर्ण-कालिक, संगठित कर्मचारी नियुक्त नहीं है। इन्होंने अपने सभी कैफेटेरिया, रखरखाव, सुरक्षा और डाक सेवा को निजी कंपनियों को ठेके पर दे रखा था, और जिसमें चार में से तीन असंगठित थे।

इस प्रकार मिशिगन शिक्षा संगठन, यानी, रसोइयों, सफाई कर्मचारियों, बस चालकों और शिक्षकों का राज्य का सबसे बड़ा संगठन, एक ओर जहाँ अपने धन को किसी और तरह से खर्च करता है, वहीं दूसरी ओर आम लोगों के कर से मिले पैसे को किसी और तरह से खर्च करने की वकालत करता है। कोई भी - मैं पुनः कहना चाहूंगा - कि कोई भी व्यक्ति दूसरे के धन को उतनी ही किफायत से खर्च नहीं करता, जितनी किफायत से वह अपने धन को खर्च करता है।

सिद्धांत: 6 - सरकार किसी से कुछ लिए बिना किसी को कुछ भी नहीं दे सकती, और जो सरकार आपको सब कुछ दे सकने में समर्थ होती है, वह आपका सबकुछ ले लेने में भी समर्थ होती है

यह कोई अतिवादी, सरकार विरोधी, विचारधारात्मक कथन नहीं है। बस एक सीधा-सादा सच है। यह सरकार के चरित्र के बारे में बताने के लिए काफी है। और अमेरिका के संस्थापक के दर्शन और सुझाव के अनुरूप है।

जॉर्ज वाशिंगटन ने एक बार कहा था, सरकार की न तो कोई समझ होती है, न विचार होता है। यह सिर्फ एक शक्ति है। आग की तरह, यह एक खतरनाक सेवक भी हो सकती है अथवा डरावना मालिक भी। इस पर थोड़ा विचार कीजिए।

जॉर्ज वाशिंगटन कहते थे कि जबकि सरकार उतनी बड़ी भी नहीं है, जितना कि वे चाहते थे और अगर यह अपना कार्य उतनी अच्छी तरह भी करने लगे कि यह जनता की सेवक हो जाए, तब भी यह खतरनाक है। जैसा कि ग्रूचो ने एक मर्तबा हार्पो के बारे में कहा था कि वह ईमानदार है, पर आपको उस पर नजर रखनी होगी। सरकार चाहे कितनी ही अच्छी और कितनी ही छोटी क्यों न हो आपको उस पर नजर रखनी ही होगी जैसा कि जैफर्सन चेतावनी देते हुए कहते हैं कि सरकार की स्वाभाविक प्रवृत्ति ही अपना विस्तार करने की तथा पीछे हटने की है। अलेक्जेंडर हेमिल्टन ने काफी मायने की बात कही थी, किसी व्यक्ति की जीविका को नियंत्रित करने का अर्थ है, उसकी इच्छा को नियंत्रित करना।

तथाकथित कल्याणकारी राज्य का अर्थ सिर्फ इतना ही है कि एक गैरजिम्मेदार तथा खर्चीली नौकरशाही द्वारा राम की दौलत लूट कर श्याम को दे दी जाए। कल्याणकारी राज्य वैसे ही है, जैसे कि चिड़ियों को खिलाने के लिए पहले घोड़े को खिलाना, आप शायद समझ रहे होंगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ। इसे दूसरे तरीके से कहा जाए, तो सभी लोग एक गोल घेरा बनाकर खड़े हैं तथा सभी का हाथ दूसरे की जेब में है। कल्याणकारी राज्य को अंग्रेजी में वेलफेयर स्टेट कहते हैं। किसी ने कल्याणकारी राज्य अर्थात वेलफेयर स्टेट की तारीफ करते हुए कहा था कि इसे वेलफेयर स्टेट इसलिए कहते हैं कि इसमें राजनीतिज्ञों की भलाई (Well) होती है और बाकी जनता को फेयर (fare) अर्थात कीमत चुकानी होती है। इसी तर्ज पर हिंदी में कल्याणीकारी राज्य को इस प्रकार समझा जा सकता है कि कल्याणकारी राज्य एक ऐसा राज्य है, जिसमें राजनीतिक खिलाड़ियों के कल्याण के लिए बाकी सारी जनता कार्य करती है।

स्वतंत्र और आत्मनिर्भर लोग अपने भरण-पोषण के लिए सरकार की तरफ नहीं देखते। वे सरकार को खैरात बाँटना वाला कोई दानवीर नहीं समझते, बल्कि इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थक समझते हैं और इसे गिने-चुने कार्यों, जैसे- शांति बनाए रखने, सबको अधिकाधिक अवसर प्रदान करने, तक सीमित कर देना चाहते हैं। उनके अनुसार सरकार को इन कार्यों के अलावा लोगों के जीवन में अनावश्यक दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए। सरकार पर निर्भरता वस्तुतः अपनी ही ताबूत में कील ठोकने के जैसा है, रोम से लेकर आज तक की सभी सभ्यताओं ने अपनी दुखद परिणति से यही सीखा है।

सिद्धांत: 7 - स्वतंत्रता जीवन का आधार है

हो सकता है कि पहले के छह सिद्धांत मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए काफी न हों, इसलिए मैंने यह सातवाँ और अंतिम सिद्धांत जोड़ा है।

स्वतंत्रता सिर्फ एक मानसिक विलास या सुविचार मात्र नहीं है। यह एक सुखद संयोग अथवा रोजमर्रा के वैचारिक संघर्ष से कहीं बड़ी चीज है। यही वह चीज है, जिससे सबकुछ है। अगर यही नहीं हो, तो अपने सर्वोत्तम रूप में जीवन नीरस हो जाएगा, और निकृष्टतम रूप में जीवन जीने योग्य नहीं रहेगा।

अगर सरकारी नीति स्वतंत्रता को बाधित करने वाली हो, अथवा इसे मजबूत नहीं करती हो, तो जागरूक लोगों को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। उन्हें पूछना चाहिए कि यदि वे अपनी आजादी से थोड़ा भी समझौता करते हैं, तो बदले में उन्हें क्या मिलेगा? उम्मीद यही की जानी चाहिए कि यह तात्कालिक लाभ का सपना दिखाकर दीर्घकालिक पीड़ा गले बांध देने जैसी बात नहीं होगी। बेन्जामिन फ्रैंकलिन ने तो यहाँ तक सुझाव दे डाला है कि जो तात्कालिक छोटी-मोटी सुरक्षा के लिए आवश्यक स्वतंत्रता छोड़ देते हैं, वे न तो स्वतंत्रता के अधिकारी हैं, न ही सुरक्षा के।

प्रायः आजकल नीति निर्माता नयी नीति बनाते समय स्वतंत्रता के बारे में जरा भी नहीं सोचते। अगर यह देखने में या सुनने में ठीक लग रहा हो या फिर यदि इससे उन्हें चुनाव जीतने में मदद मिलती हो, तो वे कुछ भी नीति बना डालते हैं। अगर कोई स्वतंत्रता संबंधी मुद्दों को उठाता भी है, तो उसका मजाक उड़ाकर उसे नजरंदाज कर दिया जाता है। अमेरिका में आज सरकार प्रत्येक स्तर पर लोगों के कुल उपार्जन का 42 प्रतिशत खा जाती है, जो 1900 ई में 6 या 7 प्रतिशत था। फिर भी शुक्र है कि कुछ लोग ऐसे हैं, जो उन लोगों से, जो सरकार के और भी विस्तार के समर्थक हैं, से यह प्रासंगिक सवाल पूछते हैं, 42 प्रतिशत क्यों काफी नहीं है?'', आप और कितना चाहते हैं?, या आपके विचार से व्यक्ति का उसके अपने मेहनत की कमाई पर कितना हक है?

मैं उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूँ, जब सभी अमेरिकी इन सात सिद्धांतों को जीवन में उतारने लगेंगे। आज ये काफी प्रासंगिक हैं। अगर हम इतिहास में झांक कर देखें, तो पता चलता है कि किसी-न-किसी रूप में इन सिद्धांतों में हमारी आस्था रही है और इसी से पता चलता है कि कैसे और क्यों हम आज इस धरती के मानव इतिहास में सर्वाधिक लोगों को सर्वश्रेष्ठ तरीके से रोटी, कपड़ा और मकान दे पाने में सफल हुए हैं। और ये सिद्धांत जीवन की आधारभूत जरूरत, स्वतंत्रता, को बरकरार रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। इन्हें आपके सामने रखने का अवसर देने के लिए हम आपके तहे दिल से आभारी हैं। और इसे आम व्यवहार में लाने के लिए हम आपके हमेशा शुक्रगुजार रहेंगे।

- इकोनॉमिक क्लब ऑफ डेट्रॉयट के समक्ष प्रस्तुत विचार, डेट्रॉयट, मिशिगन, 29 अक्तूबर, 2001

लेखक परिचय

लॉरेंस डब्ल्यू रीड मैकिनेक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी के प्रेसीडेंट हैं। मैकिनेक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी एक शोध एवं शिक्षण संस्थान है, जिसका मुख्यालय मिशिगन के मिडलैंड में है। सेंटर का उद्देश्य नागरिकों एवं नीति-निर्माताओं को मुक्त बाजार के दृष्टिकोण से सरकारी नीतियों का मूल्यांकन करने में सक्षम बनाना है। इनके नेतृत्त्व ने सेंटर को वाशिंगटन, डी.सी. के बाहर चल रहे 40 मुक्त बाजार थिंक टैंकों में सर्वाधिक विशाल बना दिया है। आज इन सभी में सर्वाधिक प्रभावशाली और सक्रिय थिंक टैंक के रूप में इसकी गिनती होने लगी है।

श्री रीड ग्रोव सिटी कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक (1975) और स्लिपरी रॉक स्टेट  यूनिवर्सिटी से इतिहास में परास्नातक (1978) हैं। दोनों पेन्सिल्वेनिया में स्थित है। इन्होंने मिडलैंड के नॉर्थ वूड यूनिवर्सिटी में 1977 से 1984 ई तक अर्थशास्त्र का अध्यापन किया तथा 1982 से 1984 तक अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्षता की। सेंट्रल मिशिगन यूनिवर्सिटी ने 1994 में उन्हें लोक प्रशासन में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। 1988 में ग्रोव सिटी कॉलेज ने उन्हें डिस्टींग्विश्ड एलुमनी अवार्ड प्रदान किया।

पिछले 15 सालों में उन्होंने युनाइटेड स्टेट्स और इससे बाहर के अखबारों में 800 से अधिक स्तंभ तथा आलेख, 200 रेडियो कमेंट्री, पत्रिकाओं तथा जर्नलों में दर्जनों आलेख साथ ही साथ पाँच किताबें लिखी हैं। इसी काल में इन्होंने युनाइटेड स्टेट्स के 40 राज्यों तथा दस देशों में 700 से अधिक वक्तव्य दिये हैं। राजनीतिक, आर्थिक और पत्रकारिता संबंधी अपनी अभिरुचियों की बदौलत उन्होंने 1985 से अब तक छः महादेशों के 57 देशों की यात्रा की है।

1994 में रीड न्यूयॉर्क के इर्विंग्टन स्थित अमेरिका की सबसे पुरानी और प्रतिष्टित अर्थशास्त्र की संस्था फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन के न्यासी परिषद (बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज) में चुने गये। फाउंडेशन आइडियाज ऑन लिबर्टी नाम से एक जर्नल प्रकाशित करता है। इसके लिए वे आइडियाज एवं कंसीक्वेंसेज' शीर्षक से मासिक स्तंभ लिखते हैं। 1998 से 2001 तक उन्होंने फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन के न्यासी परिषद के चेयरमैन (अध्यक्ष) के रूप में अपनी सेवा दी।