'मुक्त भारत' राष्ट्र के गरीबी से सम्पन्नता की ओर जाने व एक छोर से दूसरे छोर तक फैले विचारों के संघर्ष की रोचक कहानी है. आज का भारत मुक्त बाजार-तंत्र पर आधारित है और इसने अपने हाथ विश्वव्यापी सूचना अर्थव्यवस्था में भी आजमाने शुरु कर दिए हैं. पुराना नौकरशाही राज्य, जिसने उद्योगों के विकास को दबा दिया था वह भी अब ह्रास की ओर अग्रसर है. भारत का निम्नवर्ग अब मतपेटी की ताकत के सहारे पूर्ण आत्मविश्वास के साथ उभर रहा है. पिछले दो दशकों में मध्यवर्ग तिगुना हो चुका है. यही आर्थिक और सामाजिक बदलाव ही इस पुस्तक का मुख्य विषय है.

इस पुस्तक में गुरचरण दास ने पिछले पचास वर्षों की आशाओं व निराशाओं को प्रस्तुत किया है. 1991 के सुनहरे ग्रीष्म के साथ ही सुधार शुरु हुए, जब शांतिप्रिय सुधारक, प्रधानमंत्री नरसिंहराव, ने आर्थिक सुधारों के साथ देश के विकास की दिशा ही बदल दी. जब सारा काम जहां राज्य के अंतर्गत होता था तब उन्होने उभरते मध्यवर्ग को आशा की एक नई किरण दिखाई, उस मध्यवर्ग को जो बाकी विश्व के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए व्याकुल था. यह एक ऐसी शांत क्रांति थी जो इतिहास में पहले कभी नही हुई थी.

गुरचरण दास ने स्वतंत्र भारत के उतार-चढ़ावों का इतिहासानुसार व अपने खुद के और सुधारों के दौरान मिले बहुत से लोगों के अनुभवों के आधार पर अध्ययन किया. यह पुस्तक नए राष्ट्र की समझ और इरादों के बारें में बताती है और कई प्रश्नों के हल खोजती है.

'मुक्त भारत आईना है
समकालीन भारत का.'

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'आधुनिक' और 'पाश्चात्य' के बीच भेद जानने की असमर्थता ही हमारे दुख का कारण है। सभी बुद्धिजीवी तथा सभ्य मनुष्यों की आलोचनात्मक सोच केवल पश्चिम की पूंजी नहीं है बल्कि सर्वव्यापक है तब हमें उस पर इतना दुखी नहीं होना पड़ेगा। हमें अपनी शक्ति को अच्छे कामों के लिए बचाकर रखना चाहिए न कि उसे स्वदेशी, हिंदुत्व, भारतीय भाषा पर विवाद, अमेरिका पर टिप्पणी, विदेशी पूंजी निवेशकों पर कटाक्ष आदि बेकार के मुद्दों पर बरबाद करना चाहिए। उन्नीसवीं शताब्दी में राजा राममोहन राय द्वारा शुरू आधुनिकीकरण तथा पश्चिमी सभ्यता के बीच विवाद आज भारतीय जनता पार्टी के उत्थान से और प्रचंड हो गया है।

सभी सुधारक कुंआरे हुए हैं।

-जॉर्ज मूर

भारत में साम्राज्यवाद की स्थापना की बहुत बड़ी कीमत चुकाने के बाद ब्रिटिश सरकार राजस्व बचत को अपने साथ अपने घर ले गई। भारत उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे भाग और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में काफी बड़े स्तर पर आयात की अपेक्षा निर्यात ज्यादा करता था। ब्रिटेन भारत के व्यापारिक अधिशेष का इस्तेमाल अन्य विश्व के साथ अपने वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए करता था। सतपाल के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद का आठ प्रतिशत भाग ब्रिटेन को जाता था जो हमारी धनसंपत्ति का महाकाय खर्च प्रद‌र्शित करता है। इस प्रकार ब्रिटेन हमें कंगाल करता रहा और धन उसकी औद्योगिक क्रांति में लगता रहा।

किसी भी राष्ट्र की उन्नति की दिशा में एक महान और आकर्षक कदम है, उसका गरीबी से समृद्धि और पारम्परिकता से आधुनिकता की ओर बढ़ना। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत अभी हाल ही में सनसनीखेज रूप से मुक्त बाजार तंत्र के रूप में उभरा है और इसने विश्वव्यापी सूचना अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में खुद को बढ़ाना और फैलाना शुरू कर दिया है। औद्योगिक क्रान्ति को पिछले पचास वर्षों से निरंतर घुन की तरह चाटने वाला 'पुराना केन्द्रीय नौकरशाही शासन' अब धीमी गति से ही सही किन्तु निश्चित तौर पर अन्त की ओर बढ़ रहा है। साथ ही लोकतन्त्रीय शासन से निम्न जातियों का उत्थान भी धीरे-धीरे होने लगा है