डेविड श्मिट्ज और जेसन ब्रेनन के आलेख “आज़ादी की अवधारणाएं” पर टॉम जी. पामर की प्रतिक्रिया

संयुक्त राष्ट्र के विलुप्तप्रायः प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर सम्मेलन में विलुप्तप्रायः प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर रोक लगाने की मांग की गई है लेकिन दोहा के कतर में चल रहे 15वें सम्मेलन में इस मुद्दे पर निराशा ही दिखाई दे रही है। साइट्स (सीआइटीईएस) के महासचिव विलियम विंस्टेकर्स का कहना है कि बाघों की कम होती संख्या पर रोक लगाने के सारे प्

ममता बनर्जी की नजर भले ही कोलकाता की 'राइटर्स बिल्डिंग' पर रही हो पर रेलमंत्री के तौर पर उन्होने अपना जो 'विजन' सामने रखा उससे कम से कम ऐसा लगा था कि वह रेलवे के बारे में बहुत ही संजीदगी से सोचती हैं। दिसंबर 2009 में जारी “विजन 2020 डॉक्यूमेंट” को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कई प्रावधान किए हैं लेकिन रेल बजट में कहीं-कहीं गुंजाइश रह गई है।

शिक्षा का सबसे असरदार ढंग यही है कि बच्चों को प्यारी चीजों के बीच में खेलने दिया जाए.”

- प्लेटो, महान ग्रीक दार्शनिक

क्लाइमेटगेट-1 ने यह खुलासा किया था कि ईस्ट एंजेलिया यूनिवर्सिटी में ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ जंग छेड़ने वाले जलवायु वैज्ञानिकों ने किस तरह से अपने खिलाफ जाने वाले आंकड़ों को रोककर शैक्षिक पत्रिकाओं में अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का गला घोंटने की कोशिश की थी। क्लाइमेटगेट-2 ने एक और सनसनीखेज खुलासा किया है कि जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) ने 2007 की रि

दुनिया जबकि साम्यवाद के पतन की 20वीं वर्षगांठ मना रही है, कई विश्लेषकों को याद होगा कि कैसे सोवियत नीतियों की नाकामी ने सरकार को उत्पादन पर ज्यादा अधिकार दे दिया था और साम्राज्यवादी जाल की संज्ञा देकर कैसे विदेश व्यापार और निवेश को हतोत्साहित किया जाता था। भारत जैसे विकासशील देशों ने भी ऐसी ही नीतियों को अपनाया था, जो साम्यवादी नहीं समाजवादी थे। 1930 के दशक में सोवियत संघ

अपनी स्थापना के समय से ही पाकिस्तान एक संवैधानिक संकट से गुजर रहा है और गहरी जड़ों में समाई अन्य समस्याओं की तरह ही इससे निजात पाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। फिर भी, पाकिस्तान को आज़ादी और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ने के लिए इस संकट से हर हाल में उबरना होगा।

बारह दिनों तक जलवायु परिवर्तन पर चले कोपनेहेगन सम्मेलन में अंतिम दिन अमेरिका ने चार उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ एक समझौते को दिया अंजाम. अमेरिका समझौते को भविष्य के लिए अहम कदम मान रहा जबकि कई देश कर रहे आलोचना.

एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

Pages