सर्वोच्च न्यायालय के प्रबल समर्थक निश्चित तौर पर उसे यह श्रेय देंगे कि बीते तीन दशकों के दौरान उसने तीन क्रांतिकारी बदलावों की शुरुआत की। पहला था 1980 के दशक में जनहित याचिका से जुड़ा आंदोलन जिसने देश के हर नागरिक के लिए अदालत के दरवाजे खोले, खासतौर पर उन लोगों के लिए जो अपनी गरीबी, निरक्षरता और पिछड़ेपन के कारण ऐसा करने में असमर्थ थे। लगभग उसी समय न्यायालय ने अपने कुछ फैसलों के जरिए नागरिक अधिकारों की शुरुआत की जो आगे चलकर सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम का आधार बना। तीसरी लहर थी भ्रष्टाचार-निरोधक तंत्र की स्थापना की. इसका अंकुरण भी अदालती कक्षों में हुआ जब हवाला मामलों, 2जी मामलों तथा ऐसे ही बड़े मामलों में उसने कई महत्त्वपूर्ण फैसले दिए.

भ्रष्टाचार को लेकर मध्य वर्ग और युवाओं में भारी आक्रोश है। इससे आज देश का एक बड़ा जनमानस प्रभावित और परेशान है. इसलिए भ्रष्टाचार को लेकर लड़ाई लड़ रही सिविल सोसाइटी की मांगों के प्रति सरकार का टकरावपूर्ण रवैया किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह सरकार की हठधर्मिता का परिचायक है. यह संसदीय लोक प्रक्रिया की दृष्टि से भी हटकर है. देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान ने यह अधिकार दिया है कि वह न केवल अपनी मांगें कर सकता है, बल्कि इससे संबंधित प्रस्ताव अथवा बिल सरकार के पास विचारार्थ प्रस्तुत कर सकता है. इस प्रस्ताव अथवा बिल को मानना या न मानना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और वह चाहे तो इसे संसद में रखे अथवा न रखे?

एक साल पहले तकरीबन इन्हीं दिनों में राहुल गांधी ने ओडिशा में कुछ आदिवासियों से कहा था कि वे दिल्ली में उनकी लड़ाई लड़ेंगे। नियमगिरि के डोंगरिया कोंड आदिवासी बिसार दिए गए और अब राहुल का फोकस यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर नोएडा के जाट किसानों व अन्य समूहों की ओर हो गया है।

राहुल गांधी का यह व्यवहार समूचे राजनीतिक वर्ग के चरित्र को प्रदर्शित करता है। देश की आजादी के बाद संविधान द्वारा चिह्न्ति ऐसे दो समूहों में आदिवासी भी एक थे, जिन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत थी। इसी वजह से संसद में व सरकारी नौकरियों में दलितों के अलावा आदिवासियों के लिए भी सीटें आरक्षित की गईं।

भारत में अगर कोई पानीदार सरकार होती तो आज वह बिन पानी ही डूब मरती. जो काम सरकार को करना चाहिए, वह काम सर्वोच्च न्यायालय को करना पड़े, इससे बढ़कर लज्जा की बात किसी सरकार के लिए क्या हो सकती है. विदेशों में जमा काले धन की वापसी पर माननीय न्यायाधीशों ने जो टिप्पणियां की हैं, वे तो अपनी जगह है ही, सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि सरकार द्वारा नियुक्त उच्च समिति को अदालत ने रद्द कर दिया है और उसकी जगह उसने स्वयं एक विशेष जांच दल बिठा दिया है.

लोकपाल कमेटी के बारे में जो आशंका थी, वह सच निकली| यदि जन-लोकपाल के सारे प्रमुख प्रावधानों को पांचों मंत्री मान लेते तो भला उन्हें मंत्री कौन मानता? उन्हें कोई साधारण राजनीतिज्ञ भी मानने को तैयार नहीं होता| कोई भी राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार के समूल-नाश की बात सोच भी नहीं सकता| क्या भ्रष्टाचार किए बिना आज देश में कोई राजनीतिज्ञ बन सकता है? नेता इतने मूर्ख नहीं हैं कि वे जिस डाल पर बैठे हैं, उसी पर कुल्हाड़ी चलाएंगे| लोकपाल कमेटी में मंत्रियों ने जो रवैया अपनाया है, उन्हें वही शोभा देता है| वे लोकपाल की जगह धोकपाल लाना चाहते हैं|

चार जून की रात दिल्ली के रामलीला मैदान में की गई पुलिस ज्यादतियों का विरोध करने वाले तमाम धर्माचार्य, योगाचार्य, संन्यासी और स्वयंसेवी संगठन अगर आने वाले समय में एक मंच पर एकत्र होकर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की मांगों का समर्थन करने का तय कर लें और गांव-गांव और शहरों में फैले अपने करोड़ों समर्थकों से सरकार का विरोध करने का आह्वान कर दें तो कैसी परिस्थितियां बनेंगी?

देशभर के शहरों में रहनेवाले गरीबों के आंकड़े जुटाने के लिए एक जून से सात माह का सर्वे शुरू हो चुका है. इसके साथ ही गरीबों की पहचान के मानदंड पर बहस भी फ़िर छिड़ गयी है. यह विडंबना ही है कि तमाम योजनाओं के बावजूद गरीबों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

शहरी गरीबों की गणना की खबरों के साथ ही गरीबी को लेकर जारी बहस फ़िर छिड़ गयी है. यह भारतीय लोकतंत्र की विडंबना ही है कि एक तरफ़ तो यह चुनावी प्रक्रिया में गरीबों की बढ़ती भागीदारी पर गर्व महसूस करती है, दूसरी तरफ़ इसी भागीदारी ने राजनीतिक और सांख्यिकीय रूप से गरीबों की पहचान को अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण बना दिया है. इस हद तक कि हम महात्मा गांधी जी के उस सूत्र वाक्य को भी भूल गये, जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई भी कदम उठाने से पहले सबसे गरीब व्यक्ति के चेहरे को याद करें और खुद से पूछें कि आपका यह कदम क्या उसके किसी काम आयेगा?

19वीं सदी में तिलक युग से देश में राजनैतिक राष्ट्रीय भावना के नवजागरण का आरम्भ हुआ| उन दिनों बंगाल में भी राष्ट्रीयता के त्रि-आयाम का उद्भव हुआ| सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कर्मयोग, विपिन चंद्र और महर्षि अरविन्द का ज्ञान योग और रविंद्रनाथ की देशप्रेम साधना का भक्तियोग| स्व-देश या निज-देश की भावना उन्हें पारिवारिक विरासत से प्राप्त हुई थी| भारतवर्ष के जीवन आदर्श और सांस्कृतिक श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए देवेंद्रनाथ ‘तत्वबोधिनी’ पत्रिका के माध्यम से हमेशा देशवासियों को ईसाई मिशनरियों के धर्मान्तरण के खरते से आगाह करने की कोशिश करते रहते थे| राष्ट्र की व्यापक समस्याओं के विषय में ठाकुर परिवार सदैव सजग रहा था| ऐसे परिवेश में रविंद्रनाथ टैगोर का पालन -पोषण हुआ था| उन्हीं दिनों बंगाल में बंकिमचंद्र, जिन्होंने राष्ट्रीयता और आध्यात्मिकता को जीवन में समान स्था दिया था, का पदार्पण हुआ| देशप्रहरनी दुर्गा के रूप में वंदेमातरम के मंत्र से उन्होंने स्वदेश को दीक्षित किया| हिंदुत्व के आदर्श के आधार पर उन्होंने देश भविष्य का निर्माण करने के लिए महान मन्त्र का प्रचार किया| उनके इस प्रभाव से खुद रविंद्रनाथ भी अपने आपको अलग नहीं कर सके थे| इसिलए वर्ष १८९६ में कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने वन्देमातरम का गायन किया और साथ में ‘ओ भुवनमोहिनी’ की रचना की|

हम यह तो जानते ही हैं कि हमारे मौजूदा सिस्टम में कहीं कुछ गड़बड़ है। इसके बावजूद बदलाव हमें असहज कर देता है। अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाए गए आंदोलन में हम एकजुट हुए और आंदोलन को सफल बनाया। लेकिन जब हम भ्रष्टाचाररोधी लोकपाल बिल का मसौदा बनाने बैठे तो अंतर्विरोध सामने आने लगे।

ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों पर निजी टिप्पणियां की गईं, दुर्गति के अंदेशे लगाए जाने लगे और यह भी कहा गया कि स्वयं लोकपाल भी तो भ्रष्ट हो सकता है। कुछ बुद्धिजीवियों ने इस आंदोलन को लोकतंत्र पर एक आक्रमण बताया।

पिछले साल ‘सबल भारत’ के आंदोलन ‘मेरी जाति हिंदुस्तानी’ ने देश में कुछ ऐसी जागृति फैलाई कि सरकार को जनगणना से जाति को बाहर करना पड़ा। इस आंदोलन के पास न जन-शक्ति थी, न धन-शक्ति और न ही मीडिया-शक्ति। सिर्फ विचार-शक्ति ने हमारे राजनीतिक नेताओं को जरा हिलाया, जगाया और दोबारा सोचने पर बाध्य किया। हड़बड़ी में किए गए इस निर्णय को उन्होंने वापस लिया और केंद्र सरकार ने उन सहयोगी दलों के आगे घुटने नहीं टेके, जो अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए इस देश को जातिवादी खाई में गिराने का संकल्प ले चुके थे। सरकार की इस दृढ़ता और चतुराई की जितनी सराहना की जाए, कम है।

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