क्लासिक्स

बी.आर. शिनॉय

स्वर्गीय प्रोफेसर बी.आर. शिनॉय एक विश्व-विख्यात अर्थशास्त्री थे। नोबेल पुरस्कार विजेता मिल्टन फ्रायडमैन के शब्दों में, ''प्रो. बी.आर. शिनॉय एक ऐसे महान व्यक्ति थे जिनके पास भारत में केंद्रीय आयोजना में व्याप्त त्रुटियों को पहचानने की समझ थी तथा उनमें जो बात और भी दुर्लभ थी, वह बिना किसी झिझक के अपने दृष्टिकोण को खुले तौर पर व्यक्त करने का साहस था। वस्तुतः कभी-कभार ही ऐसे व्यक्ति हमारे समाज में जन्म लेते हैं।''

प्रो. बी.आर. शिनॉय के जीवन एवं कृतित्व के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

(I) साम्यवाद, समाजवाद और मुक्त समाज

दुनिया भर में समकालीन तौर पर मुख्य तौर पर तीन आर्थिक तंत्र या ढांचा अस्तित्व में रहे हैं- मुक्त समाज, साम्यवादी समाज और समाजवादी समाज. अंतिम तंत्र पहले के दो तंत्रों के मतों का मिश्रण है। हालांकि समाजवाद, भारत के पहले स्व. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का काफी लंबे अरसे की भरोसेमंद विचारधारा रही है और इस वजह से इसका आजादी (1947) के वक्त से भारत की आर्थिक नीतियों पर असर रहा है। सरकार के तमाम कामकाज का

Published on 18 Oct 2010 - 16:04

मैं साथियों के निम्न विषयों पर विचारों से सहमत नहीं हो पा रहा- (i) योजना का आकार, (ii) योजना के लिए वास्तविक संसाधन जुटाने में घाटे का वित्त पोषण, (iii) योजना के प्रारुप पर कुछ योजनाओं और संस्थाओं का प्रभाव। मैं संक्षेप में इन विषयों पर अपने विचार रख रहा हूं-

(I) योजना का आकार

योजना का आकार राष्ट्रीय आय में पांच वर्षों में 25 से 27 प्रतिशत की वृद्धि पर आधारित होता है। कुछ क्षेत्रों में उत्पादन के लक्ष्य

Published on 4 Oct 2010 - 14:16

9 मई, 1977 को लिखा बी. आर. शिनॉय का  यह निबंघ “कृषि मूल्य आयोग के मिथ्या तर्क” शीर्षक से यह निबंध छपा था. शिनॉय ने इस सिद्वांत का विरोध इस गलत धारणा को दूर करने के लिए किया कि मजदूरी की दरें बढ़ाने से बढ़ीं खाघान्नों की कीमतों मुद्रास्फीति में इजाफे का कारण बनती है। यह तो मुद्रा के एक हाथ से दूसरे हाथ में जाने का साधारण मामला है जिसके तहत धन किसानों की जेब से होते हुए वितरण प्रणाली के जरिए होते हुए शहरी आबादी की जेब में जाता है।

Published on 30 Apr 2010 - 17:55

21 दिसंबर 1961 के इस लेख में चुनाव से ठीक पहले जारी राजनैतिक दलों के घोषणापत्रों की आलोचना की गई है। लेखक के मुताबिक केवल जनसंघ का घोषणा-पत्र ही अर्थव्यवस्था के सरकारीकरण के खिलाफ है। हालांकि इसमें भी आधारभूत मामलों को लेकर स्पष्टता का अभाव ही है। पीएसपी और कांग्रेस जिस प्रगति की बात कर रहे हैं, वह केवल कुछ अतिप्रिय हठों को दूर करके ही हासिल की जा सकती है।

Published on 24 Feb 2010 - 14:13

साठ के दशक में ही बी.आर.शिनॉय ने मुद्रास्फीति और सरकारीकरण से होने वाले नुकसान को भांप लिया था। उन्होंने इसके दुष्परिणामों के बारे में भी बार-बार चेतावनी दी थी। 1962 में लिखी गयी उनकी किताब "इंडियन प्लानिंग एंड इकानॉमिक डवलपमेंट" से लिए गए इस अध्याय में उन्होंने एक चेतावनी दी जिस पर 1992 में पहली बार ध्यान दिया गया जब उदारीकरण और वैश्वीकरण की लहर आखिरकार पूरे देश में छा गई थी.

Published on 8 Feb 2010 - 18:43

विदेशी मदद से प्रगति को पंख लगने की वर्तमान सोच के विपरीत लेखक ने 21 जनवरी, 1970 के इस अध्ययन में संभावना व्यक्त की है कि भारी-भरकम सहायता का भारी भरकम दुरूपयोग होगा। उन्होंने इस बात पर भी हैरानी जताई है कि आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के अर्थशास्त्री और सांख्यिकीविद भी इस बात को समझ नहीं सके हैं….

Published on 3 Feb 2010 - 14:34

यह लेख उद्योगपति जे.आर.डी. टाटा के एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री में दिए गए भाषण के समर्थन में  12 मई, 1975 को लिखा गया है। इसमें निजी उद्योग के अस्तित्व पर गहराते संकट को लेकर चेतावनी दी गई है…

Published on 29 Jan 2010 - 15:12