स्वर्गीय प्रोफेसर बी.आर. शिनॉय एक विश्व-विख्यात अर्थशास्त्री थे। नोबेल पुरस्कार विजेता मिल्टन फ्रायडमैन के शब्दों में, ''प्रो. बी.आर. शिनॉय एक ऐसे महान व्यक्ति थे जिनके पास भारत में केंद्रीय आयोजना में व्याप्त त्रुटियों को पहचानने की समझ थी तथा उनमें जो बात और भी दुर्लभ थी, वह बिना किसी झिझक के अपने दृष्टिकोण को खुले तौर पर व्यक्त करने का साहस था। वस्तुतः कभी-कभार ही ऐसे व्यक्ति हमारे समाज में जन्म लेते हैं।''

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बंधन मुक्त कृषि मूल्य

9 मई, 1977 को लिखा बी. आर. शिनॉय का  यह निबंघ “कृषि मूल्य आयोग के मिथ्या तर्क” शीर्षक से यह निबंध छपा था.

खुलेपन की नीतियों की दरकार

21 दिसंबर 1961 के इस लेख में चुनाव से ठीक पहले जारी राजनैतिक दलों के घोषणापत्रों की आलोचना की गई है। लेखक के मुताबिक केवल जनसंघ का घोषणा-पत्र ही अर्थव्यवस्था के सरकारीकरण के खिलाफ है। हालांकि इसमें भी आधारभूत मामलों को लेकर स्पष्टता का अभाव ही है। पीएसपी और कांग्रेस जिस प्रगति की बात कर रहे हैं, वह केवल कुछ अतिप्रिय हठों को दूर करके ही हासिल

योजना का एक दशक - बी.आर.शिनॉय

साठ के दशक में ही बी.आर.शिनॉय ने मुद्रास्फीति और सरकारीकरण से होने वाले नुकसान को भांप लिया था। उन्होंने इसके दुष्परिणामों के बारे में भी बार-बार चेतावनी दी थी। 1962 में लिखी गयी उनकी किताब "इंडियन प्लानिंग एंड इकानॉमिक डवलपमेंट" से लिए गए इस अध्याय में उन्होंने एक चेतावनी दी जिस पर 1992 में पहली बार ध्यान दिया गया जब उदारीकरण और वैश्वीकरण की

क्या विकास के लिए मदद जरूरी है? - बी.आर. शिनॉय

विदेशी मदद से प्रगति को पंख लगने की वर्तमान सोच के विपरीत लेखक ने 21 जनवरी, 1970 के इस अध्ययन में संभावना व्यक्त की है कि भारी-भरकम सहायता का भारी भरकम दुरूपयोग होगा। उन्होंने इस बात पर भी हैरानी जताई है कि आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के अर्थशास्त्री और सांख्यिकीविद भी इस बात को समझ नहीं सके हैं….

खतरे में हैं मुक्त उद्यम - बी.आर. शिनॉय

यह लेख उद्योगपति जे.आर.डी. टाटा के एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री में दिए गए भाषण के समर्थन में  12 मई, 1975 को लिखा गया है। इसमें निजी उद्योग के अस्तित्व पर गहराते संकट को लेकर चेतावनी दी गई है…