जन्मदिन मुबारकः उदारवादी चिंतक एवं पत्रकार सी.वाई.चिंतामणि

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सर सी. वाई. चिंतामणि का पूरा नाम था, चिर्रावूरी यज्ञेश्वर चिंतामणि। चिर्रावूरी, कृष्णा जिले के उनके पैतृक ग्राम का नाम था। उनका जन्म तेलुगु नव-वर्ष के अवसर पर अप्रैल 10, 1880 को विजयनगरम (आंध्र-प्रदेश) में हुआ था। उस समय यह मद्रास प्रेसीडेंसी के अंतर्गत आता था। अपने पिता चिर्रावूरी रामसोमायाजुलु गारू की वे तीसरी संतान थे। उनके पिता सनातनधर्मी विद्वान् एवं विजयनगरम के शासक, महाराजा सर विजयराम गजपति राजू के ‘धार्मिक अनुष्ठानों’ के परामर्शदाता थे! उनके पूर्वज 19वीं सदी के प्रारम्भ में ही इसी कारण से अपने ग्राम एवं जनपद से विजयनगरम आ गए थे। किन्तु, चिंतामणि ने पारिवारिक, परंपरागत धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने से इंकार कर दिया। उन्हें महाराजा विजयनगरम के परामर्श पर पाश्चात्य शिक्षा दिलाई गयी। उन्होनें 1890 में महराजा कॉलेज में प्रवेश लेकर वहीं से 1895 में मद्रास विश्वविद्यालय की ‘मैट्रिकुलेशन’ की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की। इसी बीच उनके पिता का 1892 में ही स्वर्गवास हो गया था।

वे सिर्फ समाज-सुधार के प्रचारक ही नहीं थे अपितु उन्होनें स्वयं के जीवन में इसका उदाहरण भी पेश किया। 1899 में उनकी पत्नी एक पुत्र को जन्म देने के 30वें दिन ही चल बसीं जिसके बाद चिंतामणि ने भागवतुल कृष्णा राव की विधवा बेटी कृष्णा वेणी से विवाह किया!

चूंकि, चिंतामणि का प्रशिक्षण दादाभाई नौरोजी, महादेव गोविन्द रानाडे, फिरोज़शाह मेहता, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी जैसे प्रारम्भिक राष्टवादी नेताओं के मध्य हुआ था अतः उसका पूरा प्रभाव उनके “उदारवादी” चिंतन में परिलक्षित होता है! फिरोज़शाह मेहता ने “बॉम्बे क्रॉनिकल” में उन्हें प्रशिक्षित किया था। और, इलाहाबाद आने से पूर्व वे कुछ दिनों लाहौर में “ट्रिब्यून” समाचारपत्र के संपादन का भी दायित्व निभा चुके थे। 1918 के पश्चात “लीडर” स्पष्टतः ‘नरमपंथियों’ के दृष्टिकोण एवं नीति का प्रबल समर्थक हो गया, जिसका प्रतिनिधित्व ‘लिबरल’ करते थे। महात्मा गाँधी के ‘सत्याग्रह’ और ‘असहयोग’ आन्दोलनों से लिबरल सहमत नहीं थे, किन्तु सरकार की दमन नीति के वे भी प्रबल विरोधी थे। अतः, जब गांधी जी को ‘रौलेट एक्ट’ के तहत बंदी बनाया गया तब चिंतामणि ने “लीडर” में इसे सरकार की “बहुत बड़ी गलती” शीर्षक से सम्पादकीय का विषय बनाया था! उन्होनें लिखा था: “इस घटना कर्म पर हमें गहरा दुःख है। गांधी जी की गिरफ़्तारी को हम बहुत बड़ी और गंभीर गलती मानते हैं। जिससे देश भर में तीव्र प्रतिक्रिया होगी” (“लीडर”, अप्रैल 12, 1919)
   

मौन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के तहत सी.वाई. चिंतामणि झाँसी से ‘नेशनल लिबरल फेडरेशन’ के प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतकर प्रदेश के शिक्षा-मंत्री बने। चिंतामणि के अथक परिश्रम और प्रयासों के फलस्वरूप ‘कलकत्ता विश्वविद्यालय की रिपोर्ट’ के आधार पर माध्यमिक शिक्षा को विश्वविद्यालय की शिक्षा से पृथक किया गया। जुलाई 26, 1921 को संयुक्त प्रांत माध्यमिक शिक्षा परिषद् का गठन हुआ। उन्हीं के प्रयासों से से शिक्षकों की दशा में भी अनेक सुधार प्रस्तावित हुए। इन परिवर्तनों के तहत ही जुलाई 28, 1921 को ‘इलाहाबाद यूनिवर्सिटी बिल’ के माध्यम से विश्वविद्यालय को अपने शिक्षक (‘प्रोफ़ेसर’) चयनित करने के साथ ही, वाईस-चांसलर तथा कोषाध्यक्ष के चुनाव का भी प्रावधान करके, विश्वविद्यालय को स्वायत्ताशासी बनाने में बड़ा योगदान दिया गया। शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होनें प्रदेश में तकनीकी एवं कृषि-शिक्षा के विकास की नींव रखी। इतना ही नहीं, चिंतामणि ने दूरदृष्टि से काम लेते हुए, उद्योग एवं म्युनिसिपल बोर्ड को भी अधिक आत्म-निर्भर बनाने का प्रयास किया ताकि वह आंग्ल-सरकारी नियंत्रण से अधिक स्वावलंबन का स्वरुप अख्तियार करे। वे 1926 से 1937 तक संयुक्त प्रांत के विरोधी दल के नेता के रूप में विधायी परंपराओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते रहे। इसी प्रकार, ‘आगरा काश्तकारी और भू-राजस्व बिल’ (1926) के विभिन्न जनकल्याण के प्रावधानों को सम्मिलित करवाने में उनका योगदान भी अविस्मरणीय है। इसी प्रकार, इलाहाबाद को प्रांतीय राजधानी बनाये रखने और हिंदी भाषा के विकास के लिए भी वे सदैव संघर्षरत रहे।

लेखक के बारे में

Centre for Civil Society
डिस्क्लेमर:

ऊपर व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और ये आवश्यक रूप से आजादी.मी के विचारों को परिलक्षित नहीं करते हैं।

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