स्कूली शिक्षा

‘हिंदी सीखो, हिंदी बोलो, हिंदी अपनाओ’ की भावुकतापूर्ण अपीलें कम नहीं हुई हैं, लेकिन समाज इन अपीलों को कितनी गंभीरता से ले रहा है, इसका अंदाजा स्कूली शिक्षा के ताजा आंकड़ों से हो जाता है। देश भर के स्कूलों से मिले ब्यौरों के आधार पर नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन के डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेंशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (DISE) की ओर से जारी इन आंकड़ों के मुताबिक 2008-09 से 2014-15 के बीच हिंदी माध्यम स्कूलों में नामांकन 25 फीसदी बढ़ा है, जबकि इंग्लिश मीडियम स्कूलों का नामांकन इस दौरान बढ़कर दोगुना हो गया है।

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निजी स्कूलों की दाखिला प्रक्रिया से लेकर वहां ली जाने वाली फीस पर सूबे का सियासी पारा चढ़ सकता है। दिल्ली सरकार ने जहां इन दोनों मुद्दों पर निजी स्कूलों पर नकेल कसने की कवायद शुरू कर दी है, वहीं स्कूल प्रबंधक भी सरकार के ऐसे किसी भी कदम से निपटने के लिए लामबंद होना शुरू हो गए हैं। स्कूल प्रबंधक सरकार के किसी भी अंकुश के खिलाफ जहां सड़क पर उतर सकते हैं, वहीं इस मामले में वह न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं।
 
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स्कूली शिक्षा को लेकर हरियाणा सरकार के मन में सम्मान की भावना बिल्कुल नहीं है, और ना ही यह नई शिक्षा नीति को लेकर गंभीर है। निजी स्कूलों की फेडरेशन लगभग दो महीने से शिक्षा का अधिकार (आरटीई) व 134ए की गलत नीतियों के खिलाफ जिला स्तर पर धरना प्रदर्शन और हड़ताल कर रही है किंतु राज्य सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। ऐसा सुनने में आ रहा है कि नई शिक्षा नीति के बाबत विभिन्न राज्यों द्वारा प्राप्त अनुशंसाओं को लेकर आगामी 31 अक्टूबर को उत्तर भारतीय राज्यों की एक बैठक बुलाई गई है। किंतु हमें खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि इस नई शिक्षा नीति के बाब

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कैबिनेट द्वारा अनुमोदित बाल मजदूरी पर प्रस्तावित अधिनियम को मीडिया बाल मजदूरी को बदावा देने वाला एक पिछडा कदम बता रही है। वास्तव में, यह अधिनियम बाल मजदूरी को लगभग पूरी तरह से प्रतिबंधित  करता है। 
 

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) द्वारा देश भर के स्कूलों में किए गए शोध के आधार पर एक रिपोर्ट जारी किया गया है जिसमें शिक्षकों द्वारा नन्हें मुन्ने छात्रों के साथ मारपीट, दंड देने के नाम पर प्रताड़ित करने व जानवरों जैसे बुरे बर्ताव करने की बात कही गई है। रिपोर्ट में अक्सर शिक्षकों को छोटे-छोटे बच्चों को उनमें पढ़ने की क्षमता न होने व भविष्य में कभी भी पढ़ाई न कर पाने जैसे बयान देने का भी आरोपी पाया गया है। हालांकि इस रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे आश्चर्यजनक की संज्ञा दी जा सके। देशभर में आए दिन ऐसे तमाम शोध व उनके रिपोर्ट आते रहते हैं जो महज कुछेक गोष्ठि

इस सवाल का जो लगभग अनबूझ जवाब मैंने दिया है उसका महत्व समझने में कुछ पल का वक्त लगेगा, मैं यह कह रहा हूं कि स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा संबंधित स्कूलों, परिवारों और कुल मिलाकर समाज के लिए या तो अच्छी हो सकती है या फिर बुरी। यह सब परिस्थितियों पर निर्भर है, जिसमें कानून

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