सम्मान

यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक संस्था अपने आप में अत्यंत नैतिक होती है, और

देश में इन दिनों बेवजह बात का बतंगड़ बनाने की एक परंपरा सी चल पड़ी है। किसी भी सुझाव, विचार अथवा प्रस्ताव के अच्छे बुरे पहलुओं पर विचार किए बगैर ही बेवजह उस पर विवाद पैदा कर दिया जाता है। मजे की बात यह है कि इस परंपरा का निर्वहन, केवल सत्तापक्ष द्वारा विपक्ष और विपक्ष द्वारा सत्तापक्ष की खिंचाई के लिए ही नहीं बल्की अपने लोगों की भर्त्सना के दौरान भी बखूबी किया जा रहा है। केंद्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री शशि थरूर द्वारा एंटी-रेप लॉ के मद्देनजर एक दिन पूर्व दिए गए सुझाव के संदर्भ में भी इसी परंपरा का निर्वहन देखने को मिल रहा है। स्वयं थरूर की पार्टी कांग्रेस के लोग ही उनके

हमारी संस्कृति की अनेक खूबियों में से एक है उसका उदारवाद। हमारे ग्रंथों ने हमें सभी लैंगिक समूहों और उनकी यौन अभिरुचियों का सम्मान करने की सीख भी दी है, फिर चाहे वे हमसे भिन्न ही क्यों न हों। लेकिन इसके बावजूद आज भी हम भिन्न यौन अभिरुचियों वाले व्यक्तियों के प्रति पर्याप्त उदार और सहिष्णु नहीं हो पाते। उभयलिंगियों को तो हमने हाशिये का उपेक्षित समुदाय बना डाला है। बर्बर देशों की तरह हम 'व्यभिचारियों' को पत्थर मार-मारकर मार तो नहीं डालते, लेकिन एक तरह से उनका सामाजिक बहिष्कार जरूर कर देते हैं। उन्हें अन्य तरीकों से यंत्रणा दी जाती है और वे हमारी घृणा और हिकारत का वि