सुधार

स्वतंत्रता दिवस का अवसर थोड़ा रुकने, रोजमर्रा की घटनाओं पर सोच का दायरा बढ़ाने और पिछले 68 साल के दौरान अपने देश की यात्र पर नजर डालने का बढ़िया वक्त होता है। आजाद देश के रूप में अपने भ्रमपूर्ण इतिहास पर जब मैं नजर डालता हूं तो कुहासे में मील के तीन पत्थरों को किसी तरह देख पाता हूं। अगस्त 1947 में हमने अपनी राजनीतिक लड़ाई जीती। जुलाई 1991 में आर्थिक आजादी हासिल की और मई 2014 में हमने सम्मान हासिल किया।
 
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गुरचरण दास

जब वित्तमंत्री पी. चिदंबरम 28 फरवरी को संप्रग-2 का आखिरी बजट पेश करने के लिए उठे थे तो लोग यह कल्पना रहे थे कि वह सब्सिडी और वोट के लिए कुछ और लोक-लुभावन योजनाओं की शुरुआत करने की कोशिश करेंगे। ऐसा नहीं हुआ। यह जिम्मेदार बजट निकला, जिसने राजस्व घाटे को 4.8 प्रतिशत पर रोकने का संकल्प व्यक्त किया। विडंबना यह रही कि यह उन अपेक्षाओं के लिहाज से अपर्याप्त रहा जो भारत की उच्च विकास दर के संदर्भ में की जा रही थीं।

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गुरचरण दास

आर्थिक जानकारों की मानें तो सन 2013 में यूपीए सरकार से आर्थिकी में सुधार की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। इस लिहाज से सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे कौशिक बसु को सबसे समझदार मानना चाहिए, जिन्होंने कई महीनों पहले भविष्यवाणी कर दी थी कि 2014 में नई सरकार बनने से पहले किसी बड़े आर्थिक सुधार की उम्मीद नहीं रखें। हालांकि अपवाद के तौर पर सरकार ने कुछ फैसले किए हैं, लेकिन वे प्रतीकात्मक ज्यादा हैं। मसलन खुदरा कारोबार में एफडीआई का फैसला सरकार ने किया है, लेकिन इससे अभी तत्काल कोई निवेश आएगा, इसकी गुंजाइश कम है।

यूपीए सरकार ने बैंकिंग कानून (संशोधन) विधेयक- 2011 से विवादास्पद प्रावधान को हटाने की बुद्धिमत्ता दिखाई, जिसका परिणाम है कि इस संशोधन को लोकसभा की मंजूरी मिल गई है। कंपनी कानून में संशोधन का विधेयक भी लोकसभा में पास हो गया है। इन दोनों विधेयकों जैसी व्यापक राजनीतिक सहमति बनी, उसके बाद राज्यसभा में इनके लटकने की आशंका नहीं है। इस तरह संसद के मौजूदा सत्र में ही आर्थिक सुधारों की दिशा में ये अहम विधायी प्रक्रिया पूरी हो जाने की संभावना है। बीमा कानून में संशोधन का विधेयक और पेंशन फंड विनियामक और विकास प्राधिकरण बिल पर स्थिति अभी साफ नहीं है, जबकि नया भूमि सुधार कानून का मसला

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दिल्ली में आए दिन रैलियां होती रहती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि दिल्ली और रैलियों का चोली दामन का साथ है। हर पार्टी और संगठन दिल्ली में विशाल  रैली कर लाखों की भीड़ जुटाना चाहता है  ताकि सारे देशभर  में उसका संदेश पहुंचे। इस नजरिये से पिछले 4 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई कांग्रेस की  रैली ऐतिहासिक थी। ऐतिहासिक इसलिए क्योंकि पहली बार किसी राजनीतिक पार्टी ने आर्थिक सुधारों और खासकर खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के समर्थन में इतनी विशाल रैली की । उसके पक्ष में भारी जनसमर्थन  जुटाने की कोशिश की।आप कह सकते हैं कि इसमें क्या खास बात

जिस दिन सरकार ने डीजल के दाम बढ़ाए, मैंने बड़े ध्यान से ‘आम आदमी’ की प्रतिक्रिया टीवी के समाचार चैनलों पर सुनी। सुनने के बाद इस निर्णय पर पहुंची हूं कि सोनिया-मनमोहन सरकार की सबसे बड़ी गलती अगर है, तो वह यह कि उन्होंने जनता को कभी नहीं बताया कि आर्थिक सुधार अनिवार्य क्यों हो गए थे। इस देश के आम आदमी को 1991 में नहीं बताया कि अगर वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने उस समय आर्थिक दिशा न बदली होती, तो संभव है कि कंगाली की नौबत आ जाती। यह नहीं बताया कभी कि पिछले दो दशक में जो खुशहाली भारत में फैली वह मुमकिन न होती अगर अर्थव्यवस्था की वार्षिक वृद्धि तीन फीसद से बढ़ कर नौ फीसद तक न पहुं

गत पखवाड़े संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार द्वारा उठाए गए सुधार संबंधी कदमों का इस कदर स्वागत महज इसलिए हुआ क्योंकि उससे पहले सालों तक उसने निष्क्रियता दिखाई थी। जिन आर्थिक सुधारों की घोषणा की गई वे कोई ऐसे सुधार नहीं थे जो बहुत बड़ा बदलाव लाने वाले हों। बल्कि वे संकट को दूर रखने के लिए न्यूनतम जरूरी सुधार थे। बहरहाल सरकार खुद को इतना कर पाने के लिए प्रेरित कर पाई यह भी स्वागतयोग्य है। इतना ही नहीं इस क्रम में उसने अपने लिए लगातार परेशानी खड़ी करने वाले सहयोगी तृणमूल कांग्रेस का भी चुनौतीपूर्ण ढंग से मुकाबला किया। सुधारों की घोषणा के बाद निहायत अवसरवादी ढंग से तमा

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