Environment

पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों ने प्रकृति और संस्कृति, कला और जीवन, सामरिक ललक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक शांति, जैव एवं सांस्कृतिक विविधता के बीच एक बेमिसाल तालमेल स्थापित किया है और इसे संरक्षित भी किया है। इन लोगों ने इस संतुलन की खूबी को संगीत, कला, स्थापत्य, अपनी सोच और ज्ञान प्रणाली, जीवन के आधारभूत रीति रिवाज से लेकर अपने कार्यों, मौसम और प्रकृति में संजोये रखा है।

जब हम जैसे लोग यह कहते हैं कि - जनसंख्या समष्द्धि का कारण है, केवल मनुष्य ही ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है और नक्शे पर  अंकित प्रत्येक बिन्दु,  जनसंख्या की दृष्टि से सघन है और ज्यादा सम्पन्न है,  तो उनके जैसे (तथाकथित समाजवादी) लोग प्राकृतिक संसाधन की कमी की बात करते हैं। उनका तर्क है कि पृथ्वी पर संसाधन सीमित हैं तथा यदि ज्यादा लोग होंगे, तो ये जल्दी समाप्त हो जायेंगे। प्राकृतिक संसाधनों की कमी की समस्या का जूलियन साइमन ने गहनतापूर्वक अध्ययन किया। उसने दीर्घकालिक मूल्य सम्बन्धी प्रवृत्तियों का अध्ययन किया और इससे बड़े रो

- चार दिवसीय मीडिया वर्कशॉप "आइ-पॉलिसी" का सोमवार को हुआ समापन 
- सेंटर फॉर सिविल सोसायटी, आजादी.मी और एटलस नेटवर्क द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था आयोजन
 

केंद्रीय पर्यावरण और वन  मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के मसौदे में प्रदूषक भुगतान करें,लागत न्यूनतम हो,और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए बाजार पर आधारित प्रोत्साहनों पर बल दिया गया है। इसकी एक तार्किक परिणिती यह होनी चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों की स्वामित्व या प्रबंधन का जिम्मा उन समुदायों को सौंपा जाए जो उन पर निर्भर हैं। लेकिन उस मामले में यह नीति कम पड़ती है।यह कमी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में ज्यादातर सामूहिक प्राकृतिक संसाधन मुक्त संसाधनों में बदल चुकें हैं।

भारत और चीन के तीव्र आर्थिक विकास ने पश्चिमी देशों के लिए संकट पैदा कर दिया है. अभी तक विकासशील देश अपने संसाधनों को स्वेच्छा से सस्ते मूल्य पर पश्चिमी देशों को उपलब्ध करा रहे थे. परिणाम स्वरूप पश्चिमी देशों के बीस फीसदी लोग विश्व के अस्सी फीसदी संसाधनों का उपभोग कर रहे थे. यह व्यवस्था स्थिर थी चूंकि  भारत स्वयं अपने संसाधनों का निर्यात करने को तत्पर था. पिछले दो दशक में भारत एवं चीन के तीव्र आर्थिक विकास ने पश्चिमी देशों के इस सुख में अनायस ही अड़चन पैदा कर दी है. इन दोनों देशों ने संसाधनों की खपत स्वयं बड़े पैमाने पर चालू कर दी है.