Morality of Market

मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के आलोचक कहते हैं कि यह नितांत अनैतिक है क्योंकि यह लालच पर आधारित है। लालच- लाभ कमाने का भद्दा प्रेरक। क्या यह आलोचना वैध है? इस क्यों को समझना जरूरी है क्योंकि जन नैतिकता समाजवाद के कहीं बहुत नीचे दब गयी है। प्रतिदिन घोटाले होते हैं। चोरों (नेताओं) को आर्थिक स्वतंत्रता को अनैतिक कहने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।

व्यापार में कुछ खास नैतिक खतरे नही है। कोई भी काम जिसमें सही या गलत में चुनाव करना पड़े उसमें नैतिक खतरा होता ही है। व्यापारी भले ही अपने काम में ज्यादा नैतिक दुविधा का सामना करता है लेकिन यह किसी राजनेता या नौकरशाह की दुविधा से ज्यादा नही होता होगा।
 

भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।

हम लोगों ने कई सालों में आर्थिक सुधार की धीमी वृद्धि देखी है जिस दौरान हमने कुछ नुकसानदेह समाजवादी संस्थाओं को विखण्डित किया है। फिर भी एक विशाल कार्य-सूची है जिसे पूरा किये बिना हम खुद को एक सख्त पूंजीवादी लोकतंत्र नही कह सकते। और तो और, यह भी देखा जा सकता है कि चुनाव के दौरान नेता आज भी एक उदार आर्थिक सुधार के मंच पर प्रचार करने से कतराते हैं। उन्हे लगता है कि पूंजिवादी संस्थाओं का समर्थन राजनीतिक विफलता का रास्ता है।

Author: 
गुरचरण दास