अर्थशास्त्रियों के पैनल के प्रस्ताव से मतभिन्नता

मैं साथियों के निम्न विषयों पर विचारों से सहमत नहीं हो पा रहा- (i) योजना का आकार, (ii) योजना के लिए वास्तविक संसाधन जुटाने में घाटे का वित्त पोषण, (iii) योजना के प्रारुप पर कुछ योजनाओं और संस्थाओं का प्रभाव। मैं संक्षेप में इन विषयों पर अपने विचार रख रहा हूं-

(I) योजना का आकार

योजना का आकार राष्ट्रीय आय में पांच वर्षों में 25 से 27 प्रतिशत की वृद्धि पर आधारित होता है। कुछ क्षेत्रों में उत्पादन के लक्ष्य, जो आय में बढ़ोत्तरी से जुड़े हैं, के लिए सकल शुद्ध निवेश (या बचत) में 1955-56 की राष्ट्रीय आय की 6.75 प्रतिशत की तुलना में 1960-61 की तरह की 10.95 प्रतिशत बढ़ोत्तरी की जरुरत होगी। इसने पांच साल में 5600 करोड़ रु. का सकल शुद्ध निवेश का आंकड़ा दे दिया था। इसमें से 3400 करोड़ रुपए सार्वजनिक क्षेत्र और 2200 करोड़ रुपए औद्योगिक क्षेत्र खर्च किया जाएगा।

सार्वजनिक क्षेत्र में 3400 करोड़ रु.के शुद्ध निवेश के जरिये कुल विकास के लिहाज से अनुमानित व्यय 4300 करोड़ रु.होगा। इसमें 4500 करोड़ रु.का गैर-योजनागत खर्च जोड़ देने पर पांच साल में केंद्र और राज्य का कुल व्यय 8600 करोड़ रु. हो जाएगा। इस खर्च का योजना के तहत इस तरह से वित्तपोषण किया जाता हैः

(तालिका 1)

(राशि करोड़ रु.)
1. रेवेन्यू और करंट रिसीप्ट्स राष्ट्रीय आय के मौजूदा 8.5 फीसदी की दर से 5,200
2. रेल्वे अधिशेष (सरप्लस) 200
3. कर्ज और अल्प बचत (स्मॉल सेविंग्स) 1,000
4. विदेशी सहायता 400
5. अतिरिक्त कराधान आवश्यक बचत और सरकारी उपक्रमों से हासिल उच्च लाभ 800-1,000
6. घाटे का वित्त पोषण (डेफिसिट फाइनेंसिंग) 1,000-1,200
कुल 8,800

 

अगर हम उपरोक्त से योजना पर कुल विकास खर्च (4300 रु.) को अलग कर देते हैं तो सार्वजनिक क्षेत्र की योजना के लिए संसाधन शायद इस तरह से उपलब्ध होंगेः

(तालिका 2)

 

(राशि करोड़ रु.)

1. कर्ज और अल्प बचत (स्मॉल सेविंग्स) 1,000
2. विदेशी सहायता 400
3. राष्ट्रीय आय के मौजूदा 8.5 फीसदी की दर से प्राप्त रेवेन्यू और करंट रिसीप्ट्स के आधार पर राजस्व अधिशेष (रेवेन्यू सरप्लस) 900
4. अतिरिक्त कराधान आवश्यक बचत और सरकारी उपक्रमों से हासिल उच्च लाभ 800-1,000
5. घाटे का वित्त पोषण (डेफिसिट फाइनेंसिंग) 1,00-1,200
कुल 4,300

 

मेरे साथियों का कहना है कि योजनागत ढांचे के लिए जरूरी निवेश में बढ़ोत्तरी "काफी महत्वाकांक्षी" है और वे इस बात पर भी जोर देते हैं कि "इस बढ़ोत्तरी के लिए काफी पुरजोर प्रयासों की जरुरत होगी, जो अर्थव्यवस्था पर बड़े पैमाने पर दबाव डालेंगे" (पैरा 7)। पहले हालांकि उनका ही यह कहना रहा था, "दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ प्रयास किए गए तो, "निवेश में इजाफे की दर के हिसाब से राष्ट्रीय आय का लक्ष्य "हासिल किया जा सकता है" (पैरा 4)।

मेरे हिसाब से यह उन जोखिमों का खुलासा नहीं करता जो इतने बड़े निवेश में छिपे होते हैं (सिवाय उस स्थिति के जब योजना के ढांचे में तय से ज्यादा विदेशी सहायता मिल जाए)। उपलब्ध संसाधनों की क्षमता से ज्यादा तेज गति के विकास में अनियंत्रित मुद्रास्फीति तो तय है। एक लोकतांत्रिक समुदाय में जहां अधिकांश लोग बमुश्किल जीवनयापन कर रहे हों, मुद्रास्फीति विस्फोटक रुप धारण कर सकती है और समाज की वर्तमान व्यवस्था को नष्ट कर सकती है। ऐसी परिस्थितियों में साम्यवाद के वित्तपोषण के लिए भी मुद्रास्फीति बढ़ाने वाले घाटे के वित्तपोषण से बेहतर कोई विकल्प नहीं है।

चीन में कुओमिनतांग का सबसे बड़ा दुश्मन शायद एक प्रिंटिंग प्रेस ही था। वैकल्पिक तौर पर, अगर साम्यवादी अर्थ के लिहाज से अगर सही "भौतिक उपाय" अपनाए गए (मुद्रास्फीति को रोकने के प्रयास में) तो हम, योजना की अनिवार्यता के लिहाज से, प्रशासनिक या कानूनी कार्रवाई से धीरे-धीरे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं को खत्म कर देंगे। इसलिए हमें अति-महत्वकांक्षी योजना के खतरों को लेकर पहले से ही सचेत हो जाना चाहिए।

पहली योजना की तरह लक्ष्य और उपलब्धि के बीच अंतर एक तीसरी संभावना है। यह हालांकि इस बात पर निर्भर था कि हम मुद्रास्फीति बढ़ाने वाले वित्तपोषण और किसी व्यक्ति की निजता में हस्तक्षेप का किस शिद्दत के साथ प्रतिकार करते हैं। यह प्रतिकार लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी कुदरती उत्साह के चलते थोड़ा मुश्किल होगा। एक बड़ी सोच के साथ तैयार योजना की प्रगति के पुनर्विचार (उपलब्ध संसाधनों से तालमेल के लिए) में यह कुछ खामियों का कारण बन सकता है।

योजना ढांचे की शुरुआत राष्ट्रीय आय में उस इजाफे के उल्लेख से होती है जो योजना के जरिये हासिल की जाती है। इसे तैयार करने वाले इसके बाद उन वास्तविक संसाधनों की तलाश करते हैं जो निवेश की तुलनात्मक दर से मेल खाते हों। राष्ट्रीय बजट बनाने के लिए जरूरी है कि पहले खर्च का अनुमान लगाया जाए। उसके बाद उसकी पूर्ति के लिए उतने ही वित्त का इंतजाम किया जाए, जो सकल राष्ट्रीय आय का कुछ हिस्सा हो और सरकारी कमाई के जरिये हासिल किया गया हो। बजट फिर बाकी की बातों का खयाल करते हुए तैयार किया जा सकता है।

इसी तरीके को एक योजना के बजट में लागू नहीं किया जा सकता, जिसमें पूरी वित्तीय बचत और देश की निवेशीय गतिविधियां समाहित होती हैं। यहां उपलब्ध संसाधनों का सबसे पहले आंकलन किया जाना चाहिए और निवेश की योजना का उससे तालमेल बैठना चाहिए। साम्यवादी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता कारोबार पर कुछ सीमित प्रतिबंधों के साथ बचत का आकार बढ़ाया जा सकता है।

इन सीमाओं के भीतर साम्यवादी योजना पहले खर्च का आकलन कर सकती है और फिर जरुरी संसाधनों को जुटा सकती है। लोकतांत्रिक समाज में बचत में परिवर्तन की गुंजाईश, जो कि अधिकांशतया निजी सोच का विषय होता है, तुलनात्मक तौर पर सीमित होता है।

बचत के अनुमानों के भरोसेमंद होने के आधार पर ही वास्तविक संसाधनों की उपलब्धता को लेकर निभर्रता होनी चाहिए. किसी भी परिस्थिति में कुल शुद्ध निवेश (बाहरी मदद को छोड़कर) समाज की कुल शुद्ध बचत से ज्यादा नहीं हो सकता। राजस्व अधिशेष, सरकारी उपक्रमों का अधिशेष, कर्ज, लाभ का पुनर्निवेश (ploughing back profits), घाटे का वित्त पोषण कुछ और नहीं समाज की पूंजी के योजना में इस्तेमाल के तरीके हैं। ऐसे वास्तविक संसाधनों को फिर से जीवित करने का कोई उपाय नहीं है, जिनकी बचत की अनदेखी की गई हो।

अर्थशास्त्रियों के एक समूह के लिए “भारत में पूंजी निर्माण”  पर कुछ ही समय पहले प्रसारित एक शोध-पत्र में देश में शुद्ध घरेलू पूंजी निर्माण से संबंधित जो आंकड़े दिए गए हैं वे इस प्रकार हैः

 

(राशि करोड़ रु. में)
  (1) (2) (3)
  शुद्ध घरेलू पूंजी निर्माण
(Net Domestic Capital Formation)
राष्ट्रीय आय
(National Income)
(1), (2) के प्रतिशत के रूप में
(1) as % of (2)
1948-49 446 8,580 5.2
1949-50 524 9,000 5.8
1950-51 589 9,500 6.2
1951-52 672 10,000 6.7
1952-53 659 9,800 6.7
1953-54 719 10,500 6.8

 

पंचवर्षीय योजना के पहले तीन सालों (1951-52 से 1955-56) में शुद्ध पूंजी निर्माण (net capital formation), राष्ट्रीय आय के हिस्से के तौर पर कम या ज्यादा स्थिर थी, क्योंकि राष्ट्रीय आय में बढ़ोत्तरी का ज्यादातर हिस्सा आबादी में बढ़ोत्तरी और वस्तुओं के उपभोग में बढ़ोत्तरी में समाहित हो जाता था। 1949-50 की तुलना में पूंजी निर्माण (राष्ट्रीय आय के हिस्से के तौर पर) 1953-54 में 17.24 प्रतिशत बढ़ गया, यानी 17.24 प्रतिशत की कुल और 4.56 प्रतिशत प्रति वर्ष की बढ़ोत्तरी। योजनागत ढांचे के तहत दूसरी योजना (1960-61) की समाप्ति तक शुद्ध पूंजी निर्माण (10.95 प्रतिशत), पहली योजना (1955-56) की तुलना (6.75 प्रतिशत) में 61.98 प्रतिशत ज्यादा होगा। यानी 12.40 प्रतिशत की वार्षिक बढ़ोत्तरी।

योजनागत ढांचे में निहित अतिमहत्वाकांक्षा की झलक राष्ट्रीय आय में बढ़ोत्तरी की दर के लक्ष्य से भी साफ हो जाती है। भरोसेमंद मानसून की उम्मीद के साथ पहली योजना में राष्ट्रीय आय में 12 से 13 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी का अनुमान लगाया गया है या प्रतिवर्ष 2.4 से 2.6 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी। योजना ढांचे में तुलनात्मक बढ़ोत्तरी पांच प्रतिशत प्रतिवर्ष या पांच वर्ष में 25 से 27 प्रतिशत है।

योजना ढांचे में अन्य देशों की राष्ट्रीय आय में बढ़ोत्तरी के आंकड़े बताते हैं कि कनाडा, स्विट्जरलैंड और जर्मनी में राष्ट्रीय आय में बढ़ोत्तरी भारत की पहली पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य से मेल खाते हैं। अमेरिका में 1913 तक वृद्धि की दर 4.5 प्रतिशत और 1929 से 1950 के दौरान तीन प्रतिशत। प्रति व्यक्ति आय और बचत की क्षमता दोनों ही मामलों में हम इन देशों से काफी पीछे हैं। सोवियत संघ, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी और बुल्गारिया में हाल के वर्षों में वृद्धि का आंकड़ा 12 से 16 फीसदी के बीच बताया जा रहा है। अगर यह आंकड़े तुलना के लायक हैं तो साम्यवादी देशों की अर्थव्यवस्था में तेजी से विकास सभी घटकों पर नियंत्रण की नीति की कार्यक्षमता को ही उजागर करता है।

अपने और अन्य लोकतांत्रिक देशों के उदाहरण से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि विकास के लिए उपलब्ध वास्तविक संसाधन (बचत) को हर बार राष्ट्रीय आय में वृद्धि को दोगुना करने में सहायक नहीं माना जा सकता। राष्ट्रीय आय के तहत भारत में बचत की आम दर 7 प्रतिशत मानी जाती है। पिछले पांच सालों में इसमें एक प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। यह मान लेना जरुरत से ज्यादा आशावादी होना होगा कि अगले पांच साल में यह दर और गति पकड़ेगी। सरकार की तय नीति, आय के वितरण में असमानता दूर करने की कोशिश, कुल बचत को कम करेगी। मौजूदा बड़ी आबादी का खाद्य सामग्री का उपभोग राष्ट्रीय औसत और न्यूनतम आहार मापदंडों के नीचे होने की वजह से अनुमान है कि भारत में अनाज पर उपभोक्ता खर्च ही 50 प्रतिशत बढ़ाने की जरुरत है। परंपरा के मुताबिक लगातार अच्छी फसल, जैसी कि हमें मिली है, के बाद के कुछ साल खराब या औसत से कम फसल वाले होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में अगले पांच साल के कालखंड की समाप्ति पर बचत की दर 8 प्रतिशत से ज्यादा होने का अनुमान सुरक्षित नहीं माना जा सकता। इस अनुमान के सही साबित होने से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए योजना के आकार को वास्तविक संसाधनों से मेल खाने वाला होना चाहिए, जैसा कि बचत की दर से साफ हो गया है। राष्ट्रीय आय में इजाफे के आंकलन को इस बचत दर से मेल खाते निवेश की दरकार होगी।

आय में इजाफा श्रमिकों और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने की योजना पर निर्भर होगा। निवेश के आकार और संभावित वृद्धि का हिसाब लगाया जाना बाकी है, जो इतनी जल्दी कर पाना मुश्किल ही होगा। एक मोटे आंकलन के मुताबिक 3500 से 4000 करोड़ रुपए तक के निवेश की जरुरत पड़ेगी। यह मानते हुए कि पहली पंचवर्षीय योजना के तीन सालों में सार्वजनिक क्षेत्र में कुल निवेश 885 करोड़ रुपए (पांच साल के लिए तय लक्ष्य 2290 करोड़ रुपए का 38.65 प्रतिशत), से ज्यादा नहीं होगा, यह दूसरी पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य से काफी कम होगा। सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश पहली योजना के लक्ष्य के आस-पास का ही होगा। अगर पांच साल के कालखंड की समाप्ति पर, तय लागत पर वास्तविक निवेश, लक्ष्य का 70 प्रतिशत है, तो दूसरी योजना में सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश, पहली योजना से 43 प्रतिशत ज्यादा होना चाहिए।

चूंकि कोई भी योजना, उपलब्ध संसाधनों से ज्यादा बड़ी नहीं हो सकती, निवेश योजना के आकार की वक्त-वक्त पर समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि बचत की सीमाओं का खयाल रखा जा सके। अगर ऐसी समीक्षा में संसाधनों की कमी की बात सामने आती है तो कर्ज लेकर या घाटे के वित्तपोषण से इसे पूरा करने की कोशिश अदूरदर्शितापूर्ण होगी। विकास के लिए जरुरी वास्तविक संसाधनों की कमी और मुखर होती जाएगी जो अर्थव्यवस्था में ज्यादा कर्ज या घाटे के वित्तपोषण के तौर पर साफ देखी जा सकेगी। योजना ढांचे की योजना के लिए 75 प्रतिशत से ज्यादा संसाधनों को मुहैया न करा पाने की कमजोरी ही इस बात का जीवंत प्रमाण होगी कि योजना उपलब्ध बचत के आकार से बड़ी है।

संसाधनों की कमी वास्तविकता में घाटे के वित्तपोषण के आकार से कहीं बड़ी होगी, जैसा कि संसाधनों से कमाई के बड़े लक्ष्यों के उम्मीद से ज्यादा साबित होने से साफ हो जाएगा। उदाहरण के लिए प्रतिवर्ष के 45 करोड़ रुपए के पिछले सात साल के औसत से राजस्व अधिशेष के दूसरी योजना में एकाएक 180 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष हो जाने की उम्मीद बेमानी है, जैसा कि योजना ढांचे में अनुमानित है। यह उपलब्धि और लक्ष्य के बीच की गहरी खाई को बताता है।

आर्थिक विकास महज कर्ज निर्माण या घाटे का वित्तपोषण नहीं है। बचत की कमी अपने आप में कर्ज की दरकार, घाटे के वित्तपोषण, उत्पादन की जरुरत, प्रशासनिक, सांगठनिक कमजोरियों का द्योतक है, जो विकास की गति को सीमित कर देते हैं, जिसे कर्ज लेकर सुधारा नहीं जा सकता।

भारत में गरीबी और शहरों में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की वजह बचत और निवेश के आबादी की तुलना (बढ़ती श्रम शक्ति के साथ प्रति व्यक्ति आय को कायम रखने के लिए जरुरी निवेश की दर) में कम पड़ना है। ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि पांच साल में इस समस्या को पूरी तरह से हल किया जा सकता है। पहली पंचवर्षीय योजना से 90 से 95 लाख लोगों को रोजगार दिए जाने का अनुमान लगाया गया था। यह इस दौरान श्रम शक्ति की दर से मेल खाता था। इसलिए पहली योजना की तुलना में ज्यादा निवेश राशि के साथ दूसरी योजना से अल्प रोजगार वालों के साथ उन लोगों की मदद की भी उम्मीद की जा सकती है जो वार्षिक आधार पर बढ़ती श्रम शक्ति का हिस्सा होंगे। बेरोजगारी की स्थिति और अधिक बिगड़ जाएगी अगर निवेश की योजना से मुद्रास्फीति में इजाफा होता है, यह बचत को कम कर देगा और बचत के एक हिस्से की रोजगार मुहैया कराने की क्षमता को प्रभावित करेगा।

राष्ट्रीय आय में अति आशावादी वृद्धि के उद्देश्य मद्देनजर नतीजा यह हुआ है कि एक ओर तो योजना प्रारूप का आकार अनावश्यक रूप से बढ़ गया है और दूसरी तरफ आमदनी में इजाफे के अनुमान पर बचत की अवास्तविक ऊंची दर आंकी गई है. अगर बचत दर और आमदनी के वास्तविक आधार पर अनुमान व्यक्त किए गए होते तो इन आंकड़ों का आकार काफी कम होता. यानी अगर यह दरें वास्तविक हुई होतीं तो भारत को हाल के वर्षों की तुलना में और ज्यादा परेशानी वाली स्थिति का सामना करना पड़ेगा। हालांकि आय और बचत में बढ़ोत्तरी के कारण विकास में कुछ हद तक तेजी देखने को मिलेगी, लेकिन आबादी का बड़ा हिस्सा उस गति से तरक्की नहीं कर पाएगा, केंद्रित सत्ता के बगैर।

(II) घाटे की वित्त व्यवस्था

संक्षेप में घाटे की वित्त व्यवस्था का मतलब है, (1) “बेरोजगारों और अपर्याप्त तौर पर इस्तेमाल संसाधनों के पूरे इस्तेमाल से ज्यादा निवेश और ज्यादा आय की प्रक्रिया की शुरुआत” के लिए, “अतिरिक्त बचत के लिए पहले ही” ऋण लेना ही पड़ेगा, जो भविष्य की ज्यादा आय से मिलेगी और इसलिए “कुछ शुरुआती ऋण किसी भी विकास कार्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है” (पेपर नं. 2, खंड 11), (2) यह कि “गैर-मौद्रिक (non-monetized) क्षेत्र की तुलना में मौद्रिक क्षेत्र का दायरा बढ़ने पर ज्यादा मूद्रा आपू्र्ति की दरकार होगी (पेपर नं. 2, खंड 11 में)”, (3) राष्ट्रीय आय में बढ़ोत्तरी के साथ ही मुद्रा की आपूर्ति में भी बढ़ोत्तरी जरुरी होगी, (4) वर्तमान में अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्फीति का कोई भी दबाव नहीं होने के कारण सीमित स्तर पर घाटे की वित्त व्यवस्था को आजमाने में कोई भी खतरा नहीं है, (5) यह भी कि हाल के वर्षों में बजट की कमियों के चलते कोई प्रतिकूल परिणाम देखने को नहीं मिले हैं।

मेरे साथियों ने, “घाटे की वित्त व्यवस्था से संसाधनों के इस्तेमाल की अनिवार्यता की हद को लेकर कुछ ज्यादा ही आशावादी होने को लेकर” चेतावनी दी थी, (पेज 4) मैं इस चेतावनी में उनका साथ देना चाहूंगा। मैं भी आमतौर पर (2), (3) और (4) को तर्क देकर कुछ हद तक घाटे की वित्त व्यवस्था को सही साबित करने का प्रयास ही मानता हूं। ऊपर चर्चित (1) की बात की जाए तो हमें औद्योगिक अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी और कम-विकसित अर्थव्यवस्थाओं की बेरोजगारी के अंतर को समझना होगा। दोनों के बीच एक अनुरुपता के कारण कम-विकसित अर्थव्यवस्थाओं में त्रुटिपूर्ण नीतियों को अपना लिया गया। दोनों अर्थव्यवस्थाओं की समस्याओं में आधारभूत अंतर है। कम-विकसित देशों में उत्पादन को लेकर सबसे ज्यादा चिंता का विषय अकुशल श्रमिकों की अधिकता थी। उत्पादन की मशीनरी, माल और प्रौद्योगिकी-प्रबंधन की जानकारी वाले कुशल लोगों की कमी थी। यह आबादी के लिहाज से बचत और निवेश के निचले स्तर के तौर पर प्रदर्शित होता था। निवेश का सबसे आसान तरीका किसी स्तर पर कुछ उपकरण और तकनीकी जानकारी की जरुरत थी। दूसरी ओर, औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में आबादी के लिहाज से बचत की दर ज्यादा होने के कारण श्रम शक्ति के पास रोजगार की कमी के साथ उत्पादन के वास्तविक संसाधनों का कम इस्तेमाल और बेरोजगारी देखने को मिलता रहा। ऋण उपलब्धता दोनों को करीब ले आएगी। यहां घाटे की वित्त व्यवस्था या साख सृजन (credit creation) वास्तविक संसाधनों के संग्रहण का एक उपकरण है। हम इसमें कम विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विकास की समस्या का हल नहीं खोज सकते। सवाल बचत की कमी का था जिसके लिए मुद्रा सृजन कोई विकल्प नहीं था। इसलिए कम-विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कम-रोजगार के लिए घाटे की वित्त व्यवस्था का उस तरह से समर्थन नहीं किया जा सकता, जैसा कि औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में बेरोजगारी के लिए किया जा सकता है।

पैनल के सामने पेश पेपर “स्थापित क्षमता और भारतीय उद्योग में इसका इस्तेमाल” (खंड 11 का पेपर नं. 9) में दिखाया गया कि जूट, शक्कर, कुछ भारी रसायनों, मशीनों और मशीन उपकरण सहित कई उद्योगों में अप्रयुक्त क्षमता का खासा हिस्सा बाकी रहता है। ऐसा माना जा सकता है कि इन उद्योगों में से कुछ मामलों में ऐसे पूरक कुशल कर्मचारी होंगे, जो बेरोजगार या अल्परोजगार वाले होंगे, साथ ही अर्थव्यवस्था में उत्पादन का ऐसा माल होगा जो इन लोगों के रोजगार के लिए जरुरी है। संयंत्रों के आंशिक आलस्य (क्षमता से कम काम) के कारण अलग-अलग हो सकते हैं। इसके लिए इन तमाम उद्योगों पर अलग से अध्ययन की दरकार होगी। कुछ मामलों में इसकी वजह निर्यात को लेकर दिक्कतें या फिर आयात से प्रतिस्पर्धा हो सकती है, जो हो सकता है अधिमूल्यांकित विनिमय दर (overvalued exchange rate) के कारण भी हो सकती है। घाटे की वित्त व्यवस्था या साख निर्माण ऐसे मामलों की जरुरतों को पूरा नहीं कर सकती। इस अप्रयुक्त क्षमता का संगठित निजी क्षेत्र के कुल कामकाज पर काफी कम आर्थिक प्रभाव होगा। इसमें से कुछ की पूर्ति बैंक प्रणाली से कुछ कर्ज लेकर या राज्य ऋण निगम द्वारा की जा सकती है। इनके आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र के लिए ऋण की बात नहीं की जा सकती।

जहां तक (5) की बात है तो 15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1954 तक मौद्रिक प्रभाव वाली घाटे की वित्त व्यवस्था का आकार संयत ही रहा है। 1948 में सरकार द्वारा स्टर्लिंग की तदर्थ खजाना बिल (ad hoc treasury bill) से खरीद, जिसका कोई मौद्रिक प्रभाव नहीं पड़ा था और रिजर्व बैंक और अन्य व्यावसायिक बैंकों की सार्वजनिक ऋण के आकार में परिवर्तन को छोड़कर, घाटे की वित्त व्यवस्था का आकार औसतन 50 करोड़ रुपए प्रति वर्ष था।

1947-48 से 1953-54 के दौरान थोक मूल्य सूचकांक पिछले साल के 308 की तुलना में 1951-52 में एकाएक 435 अंक तक उछला और 1953-54 में 398 पर जाकर थमा। मूल्य सूचकांक में उछाल का कुछ हद तक कारण अव्यक्त (latent) मुद्रास्फीति हो सकती है। लेकिन इसका प्रभाव इसी काल के शुरुआती दौर से ज्यादा वक्त तक नहीं रह सकता था। भारत में अव्यक्त मुद्रास्फीति हर लिहाज से काफी संयत थी। यह वाकई काफी महत्वपूर्ण लगेगा कि थोड़ी सी घाटे की वित्त व्यवस्था के बाबजूद 1951-52 तक कीमतों में लगातार वृद्धि होती चली गई और इस कालखंड की शुरुआत की तुलना में कालखंड के अंत तक 29 प्रतिशत ज्यादा थीं। यह अनुभव घाटे की वित्त व्यवस्था के आकार को लेकर हमारे आकलन का समर्थन करता है, जिसे सुरक्षित और अनिवार्य माना जा सकता है।

मेरे साथी मानते हैं कि 200 करोड़ रुपए की दर से एक वर्ष की घाटे की वित्त व्यवस्था सुरक्षित और अनिवार्य भी है और पांच साल के कालखंड के लिए वे इसे 1000 करोड़ रुपए रखेंगे।

मैं इन आंकड़ों को बहुत ज्यादा मानता हूं। उनका जो फार्मूला है, उसका आधार पता नहीं। घाटे की वित्त व्यवस्था से संसाधन निर्माण नहीं किया जा सकता। ऋण, अल्प बचत संग्रहण आदि को मिलाकर यह तो सार्वजनिक क्षेत्र के लिए वे वास्तविक संसाधन जुटाने की कोशिश है, जो अर्थव्यवस्था में मौजूद हैं। घाटे की वित्त व्यवस्था की जरुरत इसलिए पड़ती है क्योंकि लोग अपनी वास्तविक आय का एक हिस्सा नगदी शेष (cash balance) में बदल देते हैं, बाकी का या तो इस्तेमाल कर लिया जाता है या निवेश (स्टॉक एक्सचेंज या अन्य किसी तरीके से)। नगदी शेष, निवेश और किसी वस्तु पर खर्च की तरह ही आय के साथ बढ़ता जाता है। वे चूंकि बचत का हिस्सा होते हैं इसलिए अर्थव्यवस्था में उनकी तुलना में वास्तविक संसाधन भी होते हैं। घाटे की वित्त व्यवस्था लोगों को नगदी शेष मुहैया कराती है और योजना में निवेश के लिए वास्तविक संसाधन हासिल कर लेती है। अगर नगदी शेष में बढ़ोत्तरी की मांग की सही तरीके से पूर्ति नहीं होती तो कीमतें गिरेंगी और बेरोजगारी कम होगी। नगदी शेष का कुछ हिस्सा बैंकों द्वारा साख निर्माण के जरिये मुहैया कराया जाएगा। इस मामले में समतुल्य वास्तविक संसाधन निजी क्षेत्र को हासिल होंगे, जिनके लिए बैंक प्रणाली साख निर्माण करेगी।

घाटे की वित्त व्यवस्था और साख निर्माण की मात्रा को नगदी शेष में बढ़ोत्तरी तक ही सीमित कर दिया जाना चाहिए। नगदी शेष में बढ़ोत्तरी का फैसला पंचवर्षीय योजना के दौरान भारतीय राष्ट्रीय उत्पाद की वृद्धि दर पर निर्भर होगा। इस मद में साख निर्माण और घाटे की वित्त व्यवस्था के आकार के आकलन के लिए नजदीकी अध्ययन की जरुरत होगी, जो इतने कम समय में संभव नहीं। बर्नस्टीन फंड मिशन के अनुमान के मुताबिक पहली पंचवर्षीय योजना के पहले तीन वर्षों के लिए बैंक प्रणाली द्वारा हर वर्ष लगभग 33-1/3 करोड़ रुपए की घाटे की वित्त व्यवस्था और साख निर्माण की जरुरत होगी। मूल्यों के स्थिर रहने की कल्पना भी की जाए तो अगली पंचवर्षीय योजना में यह प्रतिवर्ष 35 से 40 करोड़ रुपए होगी। यह महज एक अनुमान है। लेकिन यह हमें इसमें मौजूद आकार का संकेत दे देता है। इस राशि में से कितना हिस्सा घाटे की वित्त व्यवस्था से और कितना साख निर्माण से आएगा, इस बात का फैसला सार्वजनिक क्षेत्र के नगदी शेष वास्तविक संसाधन के सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में विभाजन के अनुपात पर निर्भर होगा।

इस मद में घाटे की वित्त व्यवस्था की राशि में सार्वजनिक क्षेत्र से स्टर्लिंग के लिए जारी राशि को मिलाकर ही कुल राशि का अनुमान लगाया जा सकता है। योजनागत ढांचे में पंचवर्षीय योजना के दौरान स्टर्लिंग के लिए जारी की जाने वाली राशि 100 से 150 करोड़ के दरमियान होगी। इसका कुछ हिस्सा निजी क्षेत्र को दिया जाएगा और बैंकिंग प्रणाली द्वारा इसके समतुल्य साख निर्माण किया जाएगा। अगर हम नगदी शेष संसाधनों और स्टर्लिंग के लिए राशि का सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र में विभाजन का अनुपात 2:1 का मान लें, तो पांच साल के लिए औसत घाटे की वित्त व्यवस्था का आकार 180-235 करोड़ रुपए या सालाना 35-47 करोड़ रुपए होगा। स्वतंत्रता के बाद के भारत का अनुभव इस किस्म की घाटे की वित्त व्यवस्था की तुलनात्मक सुरक्षा का अनुमोदन करता है।

चूंकि घाटे की वित्त व्यवस्था की राशि राष्ट्रीय उत्पाद में बढ़ोत्तरी की वास्तविक दर और नगद संचय से वास्तविक निकासी पर निर्भर है, जो दोनों ही ऐसी अर्थव्यवस्था में अलग-अलग हो सकते हैं जिसमें मौसमी परिस्थितियों का उत्पादन और समृद्धि दोनों पर ही खासा असर हो, बड़े आकार की स्थिति में भी घाटे की वित्त व्यवस्था के लिए अग्रिम ऋण लेना समझदारी नहीं होगी। जनता की नगदी शेष के लिए प्राथमिकता, संभव है कि रुपए की प्रामाणिकता पर उनके विश्वास के साथ ही बदलती रहे। ऐसे हालात में इन संसाधनों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए ताकि अन्य संसाधनों से उपजी कमी को पूरा किया जा सके।

मैं यह महसूस करता हूं कि योजनागत ढांचे में प्रस्तावित घाटे की वित्त व्यवस्था के आकार और जिसे मेरे कई साथियों की सहमति भी हासिल है, की तुलना में यह काफी अरुचिकर (less than cat’s meat) है। लेकिन, अगर यह विश्लेषण सही है तो मैं नहीं जानता कि किस तरह से किसी और निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। यह मान भी लिया जाए कि राष्ट्रीय आय में दोगुना बढ़ोत्तरी होगी, अतिरिक्त नगदी शेष की मांग के लिए मुद्रा आपूर्ति के 50-60 प्रतिशत तक की घाटे की वित्त व्यवस्था को जायज नहीं कहा जा सकता। अगर केंद्रीय बैंक की राशि का एक तिहाई घाटे की वित्त व्यवस्था के जरिये चलन में लाने का प्रस्ताव, अगर व्यावसायिक बैंकों के कोष में इजाफा करता है और अगर वे इसे छह से सात गुना ऋण में बदल देते हैं तो योजना काल की समाप्ति पर कुल मुद्रा की आपूर्ति योजना की शुरुआत की तुलना में दोगुनी हो जाएगी। यह जाहिर तौर पर मुद्रास्फीति को ही बढ़ावा देगा। राष्ट्रीय आय में 13 प्रतिशत से 27 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी के लिए कुल मुद्रा आपूर्ति के दोगुना होने की कोई जरुरत नहीं है।

घाटे की वित्त व्यवस्था, मूल तौर पर कम उपलब्ध वास्तविक संसाधनों के कम-विकसित अर्थव्यवस्था में पूरे इस्तेमाल में कारगर साबित होती है। मुद्रास्फीति सारे वास्तविक संसाधनों में कोई योगदान नहीं देती। यह तो सीमित बचत पर बेकार या सामाजिक तौर पर कम उपयोगी मांगों का बोझ बना देती है। निवेश विलासितापूर्ण वस्तुओं के बाजार की ओर हो जाता है ताकि मुद्रास्फीति की कमाई से उपजी उनके उत्पाद की मांग की पूर्ति की जा सके। यह बचत के एक बड़े हिस्से को बेवजह शहरी जमीन-जायदाद, सोने, आभूषणों और विदेशी मुद्रा विनिमय की ओर मोड़ देता है, क्योंकि बचतकर्ता चाहता है कि उसकी बचत का मूल्य बना रहे। परिणाम यह होगा कि योजना के लिए उपलब्ध संसाधन तुलनात्मक रुप से कम होंगे और समग्र आर्थिक विकास बुरी तरह से प्रभावित होगा।

मुद्रास्फीति खुद को स्थिर रखने की प्रवृत्ति वाली होती है। मूल्यों और पारिश्रमिक में बढ़ोत्तरी के साथ, हाथ में ली गई परियोजनाओं की मूल लागत बेमानी हो जाएगी। इन्हें पूरा करने के लिए और घाटे की वित्त व्यवस्था की जरुरत होगी। और चूंकि इन्हें आधा-अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता, घाटे की वित्त व्यवस्था बढ़ाने के लिए और अधिक दबाव बढ़ेगा। किसी भी समय सार्वजनिक क्षेत्र में या निजी क्षेत्र में या फिर योजना के इतर में सारी उपलब्ध वर्तमान बचत निवेश होगी और इस्तेमाल के लिए कोई शेष बचत नहीं होगी। योजना में वास्तविक संसाधनों को जबरदस्ती झोंकना पड़ेगा, जो ऊपर चर्चित विकृतियों और फिजूलखर्ची को अपरिहार्य बना देगा। यह इस चेतावनी के वास्तविक मूल्य को ही निरर्थक कर देगा कि मुद्रास्फीति की स्थिति पर लगातार नजर रखी जानी चाहिए। मुद्रास्फीति (महंगाई) एक बार शुरू हुई तो यह गति पकड़ती जाती है और जबकि यह अपनी राह पर चलती जाती है हम लगभग असहाय दर्शक बनकर रह जाते हैं। मुद्रास्फीति से सबसे अच्छा बचाव है, निवेश की योजनाओं को उपलब्ध वास्तविक संसाधनों पर ही आधारित रखना।

(III) नीति और संस्थागत निहितार्थ

इस खंड में हम वैधानिक और प्रशासनिक उपायों, निम्न आयवर्ग पर करों, राष्ट्रीयकरण के विस्तार, नियंत्रणों को जारी रखने, कृषि उत्पादों को मूल्य समर्थन और प्रस्तावित राष्ट्रीय श्रम शक्ति पर चर्चा करेंगे।

(i) वैधानिक और प्रशासनिक उपायः कोई भी योजना उपलब्ध वास्तविक संसाधनों से बड़ी नहीं हो सकती। करारोपण जांच आयोग ने 1953-54 में भारत में शुद्ध बचत को राष्ट्रीय आय का सात प्रतिशत आंका था, जो कि लगभग 730 करोड़ रुपए है। यह एक समग्र आंकड़ा है और इसलिए इसमें संगठित निजी क्षेत्र में पूंजी निर्माण के लिए इस्तेमाल बचत (लगभग 75 करोड़ रुपए), सार्वजनिक बचत, ग्रामीण बचत और कानूनी तौर पर अमान्य बचत (non-monetised savings) भी शामिल है। बचत के अन्य आंकलन भी लगभग ऐसे ही हैं। इस आंकलन को अगर भरोसेमंद मान लिया जाए तो यह भारत में कुल स्वीकृत निवेश का आकार बता देता है। इस सीमा को लांघने की कोई भी कोशिश मूल्यों में वृद्धि का कारण बनेगी और समग्र आर्थिक विकास को प्रभावित करेगी। निजी स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संगठनों से सुसंगत ऐसा कोई साधन नहीं है जो बचत के प्रवाह में बढ़ोत्तरी में मदद कर रहा हो। हालांकि अच्छे प्रोत्साहन (जिसमें रुपए की प्रामाणिकता और मुक्त ब्याज दर) से इस प्रवाह को बढ़ाया जा सकता है। अधिनायकवादी शासन में परिस्थिति में खासा परिवर्तन होगा, जो कि उपभोग पर जोर-जबरदस्ती से अंकुश लगा सकती है। तब समग्र बचत निजी इच्छा पर निर्भर नहीं होगी। मैं मानकर चलता हूं कि भारत में योजनाएं लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थानों से सुसंगत होंगी।

मैं अपने साथियों की इस सिफारिश से सहमत नहीं हो पा रहा हूं:

“ठोस वैधानिक और प्रशासनिक आधार होने पर ही दूसरी योजना के काल में प्रगति की दर को दोगुना करने, पूंजी निर्माण, जीवनस्तर उठाने और भविष्य में तेज विकास के लिए मशीनरी के बारे में सोचा जा सकता है। इसलिए हम बड़ी और साहसी योजना के वैधानिक और प्रशासनिक निहितार्थों का सामना करने के महत्व पर ज्यादा जोर नहीं डाल सकते।”

मैं समझता हूं कि बचत की दर बढ़ाने के लिए वैधानिक और प्रशासनिक उपायों, जो कि एक बड़ी और साहसी योजना को बढ़ावा देंगे, हमारी लोकतांत्रिक सामाजिक व्यवस्था को कमतर साबित करेंगे। जो कि तेजी से आर्थिक विकास की बहुत बड़ी कीमत होगी।

वैधानिक और प्रशासनिक उपायों को लोकतांत्रिक तरीके से हासिल बचत के प्रभावी उपयोग के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए, व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता में दखल के बगैर, जिसके बिना, हमारे प्रधानमंत्री के शब्दों में, “हम अपने जीवन के सबसे बड़े मूल्य को गंवा देंगे।” बेहतर होगा कि हम घरेलू बचत के साथ भाररहित विदेशी मदद, विदेशी ऋण की मदद से आर्थिक विकास में तेजी का प्रयास करें। लाभकारी निवेश के लिए वृहद संभावनाओं को देखते हुए, कम से कम यह तो किया जाए कि योजनाओं का शुद्ध लाभ एक उचित अवधि में विदेशी पूंजी की भुगतान राशि से ज्यादा हो। शुरुआती दौर में बिना किसी घाटे या संप्रुभता को दांव पर लगाए बगैर विदेशी पूंजी के राष्ट्रीय आर्थिक विकास के लिए इस्तेमाल के आर्थिक इतिहास में पर्याप्त उदाहरण मिल जाएंगे।

(ii) निम्न आयवर्ग पर करः भारत में निम्न आयवर्ग के जीवनस्तर में कमी की रत्ती भर भी गुंजाईश नहीं है। योजना के लिए वित्त प्रबंधन मध्य और उच्च आयवर्ग से ही किया जाना चाहिए। निम्न आयवर्ग की उपभोग क्षमता को कम करने वाले कर जैसे उपायों को टाला जाना चाहिए। इसलिए मैं अपने साथियों से इस बात पर सहमत नहीं हो सकता कि संविधान के अनुच्छेद 286 (3) में संशोधन करके करारोपण को “सामाजिक जीवन के लिए अनिवार्य” बना दिया जाना चाहिए। इसके विपरीत संविधान में संशोधनों को तो आम आदमी की स्वतंत्रता, विशेषाधिकार और अधिकार बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए।

(iii) राष्ट्रीयकरण का विस्तारः मैं इस बात पर अपने साथियों से सहमत हूं कि प्रशासनिक और विशेषज्ञ कर्मचारियों की कमी और योजना के लिए बचत संरक्षण, राष्ट्रीयकरण के विस्तार के खिलाफ हैं। लेकिन उनकी सैद्धांतिक तौर पर राष्ट्रीयकरण के आम विस्तार को लेकर कोई आपत्ति नहीं है। मैं राष्ट्रीयकरण के आम विस्तार का सैद्धांतिक तौर पर विरोध करता हूं। राष्ट्रीयकरण को सार्वजनिक इस्तेमाल की वस्तुओं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं तक सीमित रखा जाना चाहिए। अन्यथा सरकारी हस्तक्षेप को एकाधिकार या छद्म-एकाधिकार को लेकर चिंतित होना चाहिए। प्रतिस्पर्धी बाजार वाली अर्थव्यवस्था में कारोबार और औद्योगिक समस्याओं का कुशल प्रबंधन एक बहुत ही विशेषज्ञता वाला काम है और इसमें ऐसे गुणों की दरकार होती है, जिसकी एक सरकारी कर्मचारी को जरुरत नहीं होती और आमतौर पर उसके प्रशिक्षण में भी ऐसा नहीं होता। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था और मूल्य तंत्र वाली वर्तमान सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में यह काम तो निजी उद्यमी बेहतर तरीके से कर सकते हैं।

(iv) नियंत्रणों को जारी रखनाः मैं नियंत्रणों को जारी रखने के आर्थिक महत्व को लेकर संतुष्ट नहीं हूं। विनियंत्रण भी उल्लेखनीय तौर पर सफल रहे हैं। योजना के लिए नियंत्रण और भौतिक आवंटन कोई अनिवार्य तत्व नहीं हैं। उत्पादक संसाधनों का वितरण, उनके इस्तेमाल के अनुपात को मिलाकर, बदलता रहता है और विभिन्न प्रौद्योगिक, आर्थिक और मूल्य से संबंधित विचारों पर निर्भर होता है। इन तमाम जटिल और बदलते विचारों का विचार करके संसाधनों का संतोषजनक आवंटन लगभग असंभव है। अर्थव्यवस्था को आजादी और मूल्य तंत्र को उपयोग और वितरण के लिहाज से उत्पादन की आजादी देने के कई फायदे हैं। मैं अपने साथियों से असहमत हूं कि मौजूदा नियंत्रणों को बरकरार रखना चाहिए। जितनी जल्दी हो सके नियंत्रण को हटाने के कदम उठाए जाना चाहिए। नियंत्रण और आवंटन साम्यवादी योजना के मूलभूत तत्व हैं। वे एक मुक्त उद्यम वाले बाजार की अर्थव्यवस्था की योजना में अच्छे नहीं हैं।

(v) कृषि उत्पादों का मूल्य समर्थनः मैं इस मामले में अपने साथियों के साथ हूं कि किसानों को ऋण उपलब्धि, विपणन सुविधाएं और लाइसेंसशुदा माल गोदाम उपलब्ध कराने का काम जल्द से जल्द किया जाना चाहिए। मेरे साथी कह चुके हैं कि माल गोदाम का इस्तेमाल “सरकार द्वारा कृषि सामान सुरक्षित भंडारण और खरीद-बिक्री के लिए इस्तेमाल किए जाना चाहिए। ताकि आज की तरह कृषि मूल्यों में तेजी से होती गिरावट से निपटा जा सके और मूल्यों में मौसमी उतार-चढ़ाव को भी नियंत्रित किया जा सके।”
सैद्धांतिक तौर पर मूल्यों में मौसमी बदलाव का अंतर लंबी अवधि के मूल्य रूझान से जानकर ऐसे उपाय किए जा सकते हैं जिससे कृषि उत्पादन और कृषि उत्पाद की बिक्री के बीच के समय में मूल्यों में आने वाले बदलाव को नियंत्रित किया जा सके। वास्तविकता में, हालांकि ऐसा अंतर कर पाना मुश्किल है और मौसम में बदलाव भी लंबी अवधि के मूल्य समर्थन को प्रभावित कर सकता है।

भारत में कृषि उत्पादों का मूल्य समर्थन एक जोखिम भरा काम है और हमें इसमें निहित खतरों से पहले ही चेत जाना चाहिए। भारत की राष्ट्रीय आय का 50 प्रतिशत कृषि से आता है। मूल्य समर्थन की नीति मूल तौर पर मूल्य समर्थित माल के उत्पादन के लिए शेष समुदाय द्वारा उत्पादकों को दिया गया अनुदान है। जिन देशों में कृषि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का एक छोटा क्षेत्र है, वहां पर अर्थव्यवस्था के बड़े क्षेत्र में अनुदान बहुत ही कम आकार में बांट दिया जाता है और किसानों को इसका पर्याप्त लाभ मिलता है। भारत में मामला इससे ठीक उल्टा है। अनुदान के बोझ का असर खुले बाजार में खरीद के लिए बजट की कमी और कृषि उत्पादन के भंडारण की कमी के तौर पर दिखाई देगा। जो आगे चलकर मूल्य समर्थन नीति की समाप्ति या मुद्रास्फीति का कारण बनेगा। दोनों ही मामलों में परिणाम नुकसानदेह ही हैं। अगर यह संकट एक सीजन में नहीं आया तो अगले में आ सकता है क्योंकि बेहतर समर्थन मूल्य के चलते उत्पादन बढ़ जाएगा। भारत के संदर्भ में, कृषि उत्पादों के समर्थन मूल्य की नीति अर्थव्यवस्था को मुद्रास्फीति की ओर धकेल सकती है। अमेरिका तक में, जहां कृषि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का एक बहुत ही छोटा हिस्सा है, मूल्य समर्थन का अस्तित्व है। लेकिन यह कामयाब नहीं है। इसके कारण कृषि उत्पाद का भंडार बढ़ता ही चला गया है और एक बहुत बड़ा भाग तो बेकार चला गया। चयनात्मक मूल्य समर्थन की नीति इस समस्या का कमजोर हल होगा। फसलों के बीच अंतर द्वेष पैदा कर सकता है और कृषि उत्पादन के तरीके के साथ-साथ आर्थिक अस्थिरता के ढांचे को बिगाड़ सकता है।

आज भारत में मूल्यों की स्थिति कृषि उत्पादों को समर्थन मूल्य या घाटे की वित्तीय व्यवस्था जैसे मुद्रास्फीतिजनक उपायों के लिहाज से भी काफी जटिल है।

मूल्यों में गिरावट न तो वैश्विक थी और न ही एक जैसी। कुछ बड़े उत्पादों के मूल्य तो विपरीत दिशा में जाते देखे गए हैं। अनाज, तिलहन और काली मिर्च में गिरावट सबसे ज्यादा थी। कुछ कृषि उत्पादों, जैसे चाय, कच्ची खाल और लाख, जो कि निर्यात किए जाते हैं और आयात किए जाने सामान में जूट, की कीमतों में उतना ही उछाल देखा गया जितनी गिरावट दूसरों की कीमतों में देखी गई। उत्पादकों की कीमतें या तो स्थिर थीं या औसतन कुछ ज्यादा। जीवनयापन व्यय सूचकांक (cost of living index) या तो स्थिर रहा या फिर हल्का सा गिर गया। मूल्यों के असमान उतार-चढ़ाव वाले परिदृश्य में सामान्य से मौद्रिक उपाय मामले और कीमतों के ढांचे को और उलझा सकते हैं। हो सकता है यह पहले से ही कड़े लागत ढांचे को और मुश्किल बनाकर रोजगार पर असर डाल दे। मूल्य समर्थन और घाटे की वित्त व्यवस्था व्यक्तिगत ज्यादा उत्पादन का हल नहीं हैं। न ही निर्यात की दिक्कतों का जिसका ठीकरा गुणवत्ता के सिर फोड़ा जा सकता है। न ही घरेलू लागत या विनिमय के अधिमूल्यन का। मूल्यों को लेकर जटिल होती समस्या आर्थिक तार्किकता, स्थिरता के साथ प्रगति के महत्व को रेखांकित करती है, जहां राजस्व, निवेश, मुद्रा, ब्याज दर, प्रशुल्क, विनिमय दर नीतियां परस्पर सुसंगत हों और समरस भी।

(vi) राष्ट्रीय श्रम शक्तिः प्रस्तावित राष्ट्रीय श्रम शक्ति में मुझे फायदे से ज्यादा नुकसान ही दिखाई दे रहा है। हो सकता है कि यह एक विशेष श्रम समूह तैयार करे, जिन्हें रखना और कहीं ले जाना ज्यादा खर्चीला हो। इस शक्ति की उपलब्धता क्षेत्रीय बेरोजगारी की समस्या में बाधक हो सकती है। आर्थिक विकास के बंद मुहाने पर आ जाने की स्थिति तक ऐसी श्रम शक्ति की शायद जरुरत ही न पड़े।

[दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-57 से 1960-61) में प्रकाशित यह विवरण योजना प्रारूप से संबंधित बुनियादी तर्कों को लेकर योजना आयोग (अप्रैल 1955) के एक अर्थशास्त्री दल द्वारा तैयार एक मैमोरेंडम है. इस सामग्री को इकोनॉमिक्स रिसर्च सेंटर, 1998 के प्रकाशन की बारीकी से की गई पड़ताल के बाद तैयार किया गया है.]

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