बचाना है भविष्य
“शिक्षा का सबसे असरदार ढंग यही है कि बच्चों को प्यारी चीजों के बीच में खेलने दिया जाए.”
- प्लेटो, महान ग्रीक दार्शनिक
नन्हें फूलों को अच्छे से खिलने पर जोर देते हुए यह कहा था प्लेटो ने। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों पर नजर डालें तो पता चलता है कि दुनिया भर में बच्चे भयानक माहौल और खतरनाक परिस्थितियों में जीवन गुजारने पर मजबूर हैं। इस संदर्भ में. हाल ही में पेश संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की रिपोर्ट एजुकेशन अंडर अटैक 2010 को देखा जा सकता है जिसमें भारत को उन चार देशों में शामिल किया गया है जहां वर्ष 2006 से 2009 के बीच स्कूलों, छात्रों और अध्यापकों पर सुनियोजित ढंग से अंजाम दिए गए हमलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है।
वाकई, भारत के लिए यह एक खासा चिंता का विषय है क्योंकि जनवरी 2010 में ही संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया था कि दुनिया भर में अशिक्षित लोगों की संख्या लगभग 75.9 करोड़ है और इसमें भारत की हिस्सेदारी सर्वाधिक है। दी एजुकेशन फॉर ऑल रिपोर्ट के मुताबिक वयस्क अशिक्षितों की आधी संख्या बांग्लादेश, चीन, भारत और पाकिस्तान में रहती है। इससे तरक्की के काफी धीमी गति से बढ़ने की ओर इशारा किया गया था। ऐसे में स्कूलों को निशाना बनाया जाना, भारत में शिक्षितों की संख्या में सुधार की उम्मीदों पर पानी फेरता नजर आता है। अगर रिपोर्ट पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि उग्रवादी संगठनों का ऐसा करने का उद्देश्य अपने हितों की पूर्ति करना है।
यूनेस्को की इस सूची में भारत के अलावा अफगानिस्तान, पाकिस्तान और थाईलैंड शामिल हैं। इन देशों में भी स्कूलों, छात्रों और शिक्षकों पर सुनियोजित ढंग से होने वाले हमलों में बढ़ोतरी देखी गई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में बच्चों को बंदूक की नोक पर अगवा कर लिया जाता है और फिर उनका प्रयोग आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए किया जाता है।
तारेम कोसा की दास्तां
संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में बतौर उदाहरण तारेम कोसा नाम के उस बच्चे की दर्दनाक दास्तां का जिक्र किया है जिसने ह्यूमेन राइट्स वाच (एचआरडब्ल्यू) को जानकारी दी थी कि जब वह 8वीं कक्षा में पढ़ता था, उस समय किस तरह नक्सली उसे अपने दल में भर्ती करने के लिए आए थे। कोसा के मुताबिक, ‘‘मैं आश्रम स्कूल (सरकार संचालित आवासीय स्कूल) में पढ़ रहा था और उस समय हमारे छात्रावास में नक्सली आ पहुंचे। मेरे स्कूल से वे चार छात्रों को अपने साथ ले गए, लेकिन लगभग 10-12 किमी चलने के बाद उन्होंने तीन अन्य छात्रों को छोड़ दिया. लेकिन वे मुझे अपने साथ ही ले गए।’’ रिपोर्ट के मुताबिक, जब कोसा को धनुष-बाण चलाने का प्रशिक्षण दिया गया और राइफल थमाई गई, साथ ही बम रखने का प्रशिक्षण दिया गया, उस समय उसकी उम्र सिर्फ 13-14 साल ही थी.
स्कूल बन रहे निशाना
रिपोर्ट कहती है कि 2006 से 2009 के बीच की अवधि में नक्सलियों ने कथित रूप से 300 स्कूलों को निशाना बनाया। बिहार और झारखंड में 2009 में 50 स्कूलों को उड़ा दिया गया। वर्ष 2009 की पहली छमाही में झारखंड में 37 स्कूलों सहित दर्जनों स्कूलों को सुरक्षा अभियानों को अंजाम देने के लिए कब्जे में ले लिया गया जबकि फरवरी 2007 में छत्तीसगढ़ सरकार के सूत्रों ने बताया था कि हाल के महीनों में 250 स्कूलों को नक्सलियों ने धमाके से उड़ा दिया गया।
मासूसों पर पड़ रही मार
अगर ह्यूमन राइट्स वाच की 2008 की रिपोर्ट डेंजरस ड्यूटी: चिल्ड्रन एंड दि छत्तीसगढ़ कनफ्लिक्ट को देखें तो पता चलता है कि नक्सली 6-12 साल की आयु के बच्चों को अपने दल में भर्ती कर रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि छत्तीसगढ़ राज्य में चल रहा यह संघर्ष बच्चों के जीवन को बुरी तरह क्षति पहुंचा रहा है। बेशक माओवादी विद्रोही हों, या सरकार समर्थित सलवा जुडुम या सरकारी सुरक्षा एजेंसियां, सभी बच्चों का किसी न किसी तरह प्रयोग कर रही हैं, और ऐसे में उनका हर समय खतरे में जीना स्वाभाविक है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अकेले 2008 में दुनिया भर में 2,50,000 का सशस्त्र समूहों और गुटों में भर्ती की गई थी। भारत ऐसे 18 देशों की सूची में शामिल था, जहां बच्चों को स्वेच्छा या जोर-जबरदस्ती से स्कूलों या अन्य स्थानों से अगवा कर लिया जाता है।
अंततः यह कहा जा सकता है विकास की ओर तेजी से अग्रसर भारत को नक्सली और हिंसा के अन्य सौदागरों से अपने इन भविष्य की धरोहर को बचाने के लिए पुख्ता इंतजाम करने होंगे क्योंकि इन बच्चों के वर्तमान और भविष्य से ही तो भारत का वर्तमान और भविष्य जुड़ा है।
