अगर हम कभी अमीर थे, तो आज गरीब क्यों?

भारत में साम्राज्यवाद की स्थापना की बहुत बड़ी कीमत चुकाने के बाद ब्रिटिश सरकार राजस्व बचत को अपने साथ अपने घर ले गई। भारत उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे भाग और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में काफी बड़े स्तर पर आयात की अपेक्षा निर्यात ज्यादा करता था। ब्रिटेन भारत के व्यापारिक अधिशेष का इस्तेमाल अन्य विश्व के साथ अपने वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए करता था। सतपाल के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद का आठ प्रतिशत भाग ब्रिटेन को जाता था जो हमारी धनसंपत्ति का महाकाय खर्च प्रद‌र्शित करता है। इस प्रकार ब्रिटेन हमें कंगाल करता रहा और धन उसकी औद्योगिक क्रांति में लगता रहा।

इस मामले में मैंने कहा कि अब हम आजाद हैं और इंग्लैंड अपना उपनिवेशवाद खो चुका है। भारत अमीर बन रहा है और इंग्लैंड निर्धन। क्या यह सही है? उन्होंने सिर हिलाया। मेरे चाचाजी ने उपनिवेशवाद के दौरान भारत की गरीबी का श्रेष्ठ मामला प्रस्तुत किया था। सतपाल और विमला की नि:स्वार्थ अखंडता और सरलता ने मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ा। दोपहर के खाने के बाद, विमला अपने जवानी के दिनों की फोटो की एक एलबम लेकर आईं। जिनमें से एक तस्वीर बंगाल के गांव में ली गई थी। यह दर्शाता है कि सतपाल और विमला आदर्शवाद के दो चेहरे थे। जिन्होंने 1943 में भयंकर अकाल के दौरान बहुत मदद की थी। दूसरी तस्वीर विमला को 1947 प्राग में दर्शा रही थी। जहां वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की नेता बनकर पहले विश्व युवा महोत्सव में गई थीं। उनकी आंखों में सफलता थी क्योंकि वह विश्व प्रजातांत्रिक युवा संघ की उपप्रधान चुनी गई थीं। उनका चेहरा आश्चर्यजनक आत्मविश्वास जाहिर कर रहा था जो उनके अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन की युवा नेता बनने के कारण था, उस समय उनके पास सभी कारण थे, यह मानने के लिए कि सचाई उसकी तरफ है और साम्यवादी एक दिन संसार पर शासन करेंगे। मैंने 1968 के वसंत के उस दिन के बारे में सोचा जब सोवियत टैंक प्राग में आजादी को कुचल रहे थे। फिर मैंने विमला का खुश चेहरा तस्वीर में देखा।

सतपाल और विमला के साथ मेरी मुलाकात ने मुझे आर्थिक इतिहास पढ़ने के लिए प्रेरित किया और मैंने पाया कि अधिकतर विद्वान मेरे चाचाजी की भारतीय गरीबी के श्रेष्ठ विश्लेषण से सहमत हैं। वह सहमत थे कि ब्रिटेन की व्यापारिक नीतियों ने उत्पादों के आयात और कच्चे माल के निर्यात को प्रोत्साहित किया था और किसानों से ज्यादा कर लेकर ब्रिटेन ने भारतीय कृषि को सुदृढ़ किया।

जैसे-जैसे वर्ष गुजरते गए इतिहासकारों की नई पीढ़ी उभरी जिन्होंने पुरानी व्याख्याओं को चुनौती देना शुरू कर दिया। इन विद्वानों ने ऐतिहासिक आंकड़ों को प्रेषित करने में अपना कीमती समय लगाया। उनमें से एक ने तय किया कि भूमिकर अत्यधिक न हो। 1900 में यह केवल कृषि उपज का पांच प्रतिशत था जो प्रतिव्यक्ति कर के भार से भी आधे से कम था। दूसरी सहमति यह थी कि भारत से ब्रिटेन की ओर धन का प्रवाह हुआ था। मुख्यत: उन्नीसवीं शताब्दी में, मगर यह सिर्फ सकल घरेलू उत्पाद का डेढ़ प्रतिशत भाग था। इतिहासकारों ने बहस की कि भारत ने ब्रिटेन को वास्तविक सेना और असैनिकों की सेवाओं और पूंजी निवेश की सेवा का भुगतान किया। इसी तरह ब्रिटिश संस्थापन को बनाए रखने के लिए ऊपरी कीमत, जो 'घरेलू खर्च' कहलाता है, बहुत कम थी। अगर भारत अपनी सेना और नौ सेना बनाए तो यह ज्यादा खर्चीला होगा। वह मानते थे कि भारत के पास भुगतान की जो बचत है, उसे ब्रिटेन अपने वित्तीय घाटे को पूरा करने के प्रयोग में लाता है, लेकिन वह कहते थे कि भारत को इसके लिए अंशत: मुआवजा दिया जाता, जो सोने और चांदी के रूप में भारत में आयात होता। जिसमें से थोड़ा भाग बहुमूल्य धातु का टकसाल में सिक्के (मुद्रा) बनने के लिए जाता और ज्यादातर निजी भारतीय हाथों में जाता। भारतीय हमेशा सोने और चांदी से सम्मोहित होते हैं। हालांकि रोमन प्लीनी ने भी यही देखा और विश्व में भारत को सोने में डूबा हुआ कहा।

पुन: अवलोकन की सबसे गंभीर ललकार राष्ट्रवादी धारणा की थी कि ब्रिटेन ने भारत को दोबारा औद्योगीकरण रहित कर दिया था। वे मेरे चाचाजी के साथ समहत थे कि उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय उद्योग का पतन हो रहा था। उन्होंने गणना की कि भारत 1830 में औद्योगिक उत्पादन का विश्व में 17.6 प्रतिशत भाग उपभोग कर रहा था जबकि ब्रिटेन का भाग सिर्फ 9.5 प्रतिशत ही था। 1900 तक भारत का हिस्सा घटकर 1.7 प्रतिशत रह गया और ब्रिटेन का हिस्सा बढ़कर 18.6 प्रतिशत हो गया। उन्होंने बहस की कि यह पतन तकनीक के कारण था। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति की मशीनों ने भारतीय वस्त्र उद्योग को नष्टकर दिया। इसी प्रकार यूरोप से और बाकी विश्व से परंपरागत हाथ से बने वस्त्र अदृश्य हो गए। पचास साल बाद भारतीय कपड़ा मिलों ने इन्हें नष्ट कर दिया। इस प्रकार भारतीय बुनकर तकनीकी रूप से अक्षमता के शिकार थे।

हथकरघा ने सारे विश्व में मिल से बने कपड़ों को रास्ता दिखाया और बुनकरों ने सभी जगह अपनी नौकरियां खो दीं। यहां तक कि भारत में भी। दुर्भाग्यवश भारत में ज्यादा बुनकर प्रभावित हुए क्योंकि भारत विश्व में कपड़े का सबसे बड़ा निर्माता था। यह उनकी महान विपत्ति और उनका दुख जो कि दरिद्रपन के कारण था। उससे दूर नहीं ले जा रहा था अगर ब्रिटिश शासन उनकी दुर्दशा पर कोमल हृदय होता तो भारत में व्यापार में बाधा नहीं आती। यह प्रभाव को लचीला कर देता और भारतीय हथकरघा वस्त्र को एक समय के लिए जीवित रखेगा। यह सच है कि ब्रिटिश सरकार ने अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैंड में भारतीय कपड़े के खिलाफ बाधा उत्पन्न की।
1850 के बाद भारतीय उद्यमियों ने अपनी आधुनिक कपड़ा मिलों की शुरुआत की। 1875 तक भारत ने कपड़े का निर्यात करना फिर शुरू किया और धीरे-धीरे घरेलू बाजार को पुन: प्राप्त कर लिया। 1896 में भारत में संपूर्ण प्रयुक्त कपड़े की भारतीय मिलें सिर्फ आठ प्रतिशत भाग, 1913 में बीस प्रतिशत, 1936 में बासठ प्रतिशत और 1945 में छिहत्तर प्रतिशत की ही आपूर्ति कर पाती थीं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय और ब्रिटिश पूंजीवादियों ने बहुत लाभ कमाया। जबकि ब्रिटिश व्यापारियों ने अपने युध्दकालीन लाभ को प्रेषित किया, भारतीय व्यापारियों ने युद्ध के बाद के अपने उद्यमों में दोबारा निवेश किया। इस प्रकार लड़ाई के बाद भारतीय उद्योग तेजी से बढ़ने लगे।

जी.डी. बिड़ला, कस्तूरभाई लालभाई और दर्जनों उद्यमियों ने युद्ध के मध्य के सालों में महत्वपूर्ण औद्योगिक साम्राज्य बनाया। 1913 और 1938 के मध्य उत्पादन की वृद्धि 5.6 प्रतिशत प्रतिवर्ष थी, विश्व की औसत 3.3 प्रतिशत से ज्यादा। अंत में, ब्रिटिश सरकार ने 1920 में शुल्क से सुरक्षा प्रदान की। इसने उद्योगपतियों को फैलने और विविधता उत्पन्न करने में मदद की। बिड़ला ने कपड़े के अलावा सीमेंट, जूट और कागज के क्षेत्र में भी कदम रखा। अन्य शिपिंग (हीराचंद), सिलाई मशीन (श्रीराम) और घरेलू एअरलाइन (टाटास) में बंट गए।

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