योजना का एक दशक - बी.आर.शिनॉय

साठ के दशक में ही बी.आर.शिनॉय ने मुद्रास्फीति और सरकारीकरण से होने वाले नुकसान को भांप लिया था। उन्होंने इसके दुष्परिणामों के बारे में भी बार-बार चेतावनी दी थी। 1962 में लिखी गयी उनकी किताब "इंडियन प्लानिंग एंड इकानॉमिक डवलपमेंट" से लिए गए इस अध्याय में उन्होंने एक चेतावनी दी जिस पर 1992 में पहली बार ध्यान दिया गया जब उदारीकरण और वैश्वीकरण की लहर आखिरकार पूरे देश में छा गई थी.

योजनाओं के आरंभ के बाद से हालांकि आंकड़ों के अनुसार भारत की राष्ट्रीय आय में 42 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया है, लेकिन जहां तक बड़े पैमाने पर गरीबी की बात है तो इसमें कोई सुधार देखने को नहीं मिला है। आय में इजाफा रईसों के छोटे से ऊपरी हिस्से में ही देखने को मिला है। कुछ भाग माल संचय में और कुछ अनुपयोगी उत्पादन क्षमता में कुछ हिस्सा देखने को मिलता है। अगर आम आदमी के हिस्से में कुछ दिखता है तो वह खाद्य सामग्री और कपड़ों की कुछ खपत की कुछ मंद गति में देका जा सकता है। आज आय का वितरण आजादी से पहले के दिनों से भी ज्यादा असामाजिक है और हर योजना के बाद बेरोजगारी में इजाफा देखने को मिला है।

उल्लेखनीय कामयाबी तो केवल औद्योगिक उत्पादन में ही देखने को मिली है। लेकिन यह एक दिखावटी जीत है जो तुलनात्मक लागत के सिद्धांत के खिलाफ उत्पादन और कृषि और उपभोक्ता सामान उद्योग में आकर्षक निवेश की कीमत पर हासिल की गई है। इस वजह से इससे राष्ट्रीय उत्पाद में गिरावट दर्ज की गई है। इसके साथ भारी उद्योगों को प्राथमिकता ने राष्ट्रीय उत्पाद के विस्तार के एक अहम कारक रोजगार को आबादी में इजाफे के लिहाज से कमजोर कर दिया है। यही वजह है कि हर एक योजना के साथ बेरोजगारी में भी इजाफा होता चला गया है।

भारत में पिछले एक दशक की योजना ने आर्थिक विषमताओं की लंबी फेहरिस्त तैयार कर दी है, जो योजना से होने वाले नुकसान को बताती है। भले ही फिर हमारे योजनाकार हमेशा योजना के फायदे ही क्यों न गिनाते हों। हम इनमें से कुछ विषमताओं का जिक्र कर सकते हैं। योजना में मूल उद्देश्यों गरीबी हटाने और बेरोजगारी समाप्त करने के लिए हमें राष्ट्रीय उत्पाद को अधिक से अधिक बढ़ाना होगा। इससे यह जरूरी हो जाता है कि हम उपलब्ध संसाधनों का वहीं पर ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल होना चाहिए जहां पर उत्पादन सर्वाधिक हो। और फिर भी योजनागत खर्च का दो-तिहाई से भी कुछ ज्यादा हम जबर्दस्ती भारी उद्योगों में झोंक देते हैं, जहां पर निवेश में इजाफे से राष्ट्रीय उत्पाद में इजाफा कुल निवेश का 20 फीसदी तक आंका जाता है। वह भी कृषि और उपभोक्ता सामग्री उद्योग की जगह, जहां राष्ट्रीय उत्पाद में इतने ही निवेश से 70 फीसदी तक का इजाफा देखने को मिल सकता है। इस परियोजना की विसंगति रोजगार के क्षेत्र में भी देखी जा सकती है। भारी उद्योगों में रोजगार के अवसर कृषि और उपभोक्ता सामग्री उद्योग की तुलना में 1/2 से लेकर 1/8 तक है।

भारतीय संदर्भ में गरीबी के उन्मूलन के लिए खाद्य सामग्री और कपड़े के उत्पादन में इजाफे की दरकार है, दोनों की ही खपत दुखद रूप से कम है। लेकिन सूती कपड़ों के घरेलू उत्पादन में 69 फीसदी का योगदान और भारतीय औद्योगिक गतिविधि में दो-तिहाई भागीदारी रखने वाला सूती कपड़ा उद्योग कई जटिल और प्रतिबंधात्मक निर्देशों से घिरा हुआ है। टेक्सटाइल मिलों के उत्पादन में इजाफा और उनका आधुनिकीकरण बहुत तेजी के साथ कम होता जा रहा है। इस वजह से पिछले चार साल में कपड़े के उत्पादन में काफी सुस्ती आई है। आबादी में इजाफे के परिप्रेक्ष्य में कपड़े की कीमतों में तेजी से उछाल देखने को मिल रहा है। इससे आय उपभोक्ता की बजाय उत्पादक के खाते में जा रही है जिसे सरकार के कदम से एकाधिकार का फायदा मिला हुआ है।

तेजी से औद्योगिकीकरण की नीति का ही अनुसरण करते हुए हम बलपूर्वक उद्योगों की स्थापना करते हैं-आयात पर प्रतिबंध या अंकुश लगाकर और घरेलू निर्माताओं को प्रोत्साहन देकर-भले ही कई उद्योगों में हमारी उत्पादन लागत विदेशों से आने वाले सामान की तुलना में अलाभकारी ही क्यों न हो। परिणाम यह होता है कि नए उद्योगों का उत्पादन तभी फायदेमंद होता है जबकि घरेलू बाजार में कीमतों में उछाल आया हो। यह माल कीमत और गुणवत्ता के कारण विदेश में नहीं बेचा जा सकता।

जब हमें यह आभास होता है कि निर्यात की गति कम है तो हम निर्यात को बढ़ाने के लिए तमाम तरह के कृत्रिम उपाय करते हैं-निर्यात को प्रोत्साहन, आयात लाइसेंस, शासकीय व्यापार (state trading), द्विपक्षीय समझौते, करारोपण में राहत, माल ढुलाई और कर्ज, उत्पादकों पर निर्यात के लिए दबाव, आदि आदि-जो स्थिति को और अधिक बिगाड़ देता है। आधारभूत दिक्कतों के अपरिवर्तित ही रहने के कारण पिछले पांच सालों में निर्यात 625 करोड़ रुपए के आस-पास ही सीमित होकर रह गया है। इस बीच अलाभकर उद्योगों की स्थापना का काम पूरे उत्साह के साथ जारी है।

हम सार्वजनिक क्षेत्र के घाटे की पूर्ति के लिए अबाधित तौर पर धन मुहैया कराते रहते हैं। जब इससे कीमतों में उछाल आता है तो हम इसकी जवाबदेही थोपने के लिए 'असामाजिक तत्वों' की खोज आरंभ कर देते हैं। बैंकों और कारोबारियों पर लांछन लगाकर चयनात्मक कर्ज अंकुश और नियंत्रण (credit curb and control) चाहते हैं। नहरों में पानी के बहाव पर नियंत्रण से बाढ़ को नहीं रोका जा सकता और न ही ऐसे नियंत्रण मुद्रास्फीति कोष (inflationary funds) पर ही नियंत्रण हासिल कर सकते हैं। स्वाभाविक तौर पर ये उपाय कीमतों पर नियंत्रण में नाकारा साबित हुए। 1954-55 से कीमतों में 46 फीसदी का इजाफा देखने को मिला है। इस अनुभव के बाद भी घाटे की वित्त व्यवस्था (deficit financing) जारी है और जैसा कि हमने देखा यह काम और बड़े पैमाने पर हो रहा है।

आर्थिक विषमता का सबसे पुराना उदाहरण शायद विदेशी कारोबार और विदेशी भुगतान में देखा जा सकता है। पिछले लगभग एक दशक से हम हमने विदेशी मुद्रा की भारी कमी देखी है। फिर भी हम विदेशी मुद्रा अर्जित करने वालों को दंडित करते हैं-निर्यातक-और उपभोक्ताओं को विदेशी मुद्रा विनिमय में राहत देते हैं-यानी आयातक को। ऐसा हम निर्यातकों पर उनके वैध देय पर विदेशी मुद्रा के रुपए में रुपांतरण के वक्त जुर्माना ठोककर और आयातकों से उनके वैध विदेशी मुद्रा विनिमय पर कम वसूली से करते हैं।

सबसिडी और जुर्माने का इस पूरी तरह से अनुचित खेल को सरकार के विदेशी मुद्रा विनिमय पर एकाधिकार से अंजाम दिया जाता है। साथ ही रुपए की विनिमय दर को एकाधिकार के बेदर्दी के साथ इस्तेमाल से बहुत ज्यादा और कृत्रिम रखा जाता है। 1954-55 से लेकर 1960-61 के काल के दौरान रुपए ने विदेशों में खुले बाजार में विदेशी विनिमय मूल्य में 32 फीसदी की और घरेलू स्तर पर 30 फीसदी की गिरावट देखी है। सामान्य मूल्य सूचकांक में इसी काल में 42 फीसदी का इजाफा देखा गया है। सोने की वर्तमान घरेलू कीमत (119.70 रुपए प्रति 10 ग्राम), विदेशों में इसकी कीमत (53.58 रुपए प्रति 10 ग्राम) की तुलना में सवा दो गुना ज्यादा है।

और फिर भी हमें इस बात पर पूरा भरोसा है कि भारतीय रुपया, प्रधानमंत्री के शब्दों में, अब तक की सबसे 'मजबूत' स्थिति में है, यानी कि 'दुनिया की चंद मजबूत मुद्राओं में से एक।' और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर के शब्दों में, यह 'अगले 10 से 15 वर्षों में तुलनात्मक रूप से ज्यादा भरोसेमंद मुद्रा (hard currency) बन जाएगी।'

रुपए की इस मजबूती न केवल हमारे अपने विश्लेषण पर निर्भर है, बल्कि 'अतिथि विशेषज्ञों'- 'व्यावहारिक विदेशी कारोबारी,' जिनका प्रधानमंत्री ने हवाला दिया था, और सी. डगलस डिलन, जिनका रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर ने हवाला दिया था, पर आधारित है। इन लोगों ने हमें उतना ही भरोसा दिलाया था कि जितना कि शायद रॉक ऑफ जिब्राल्टर ने भूमध्य सागर की रक्षा के दौरान रॉयल नेवी को दिलाया था। इसी के चलते प्रधानमंत्री ने रुपए की विनिमय दर व्यवस्थापन की तमाम बातों को 'शानदार बकवास' कहकर सिरे से खारिज कर दिया था। रिजर्व बैंक के गवर्नर को भी कहना पड़ा था कि एक समर्थ 'विशेषज्ञ' द्वारा रुपए के भविष्य को लेकर अच्छी भविष्यवाणी के बाद भी हमारे देश में चंद लोग हैं जो रुपए के बाह्य मूल्य को लेकर 'बेफिजूल की निराशावादी' बातों में उलझे हुए हैं।

हम भुगतान संतुलन के घाटे में सुधार के लिए हम मितव्ययिता के स्तर तक आयात पर प्रतिबंध या अंकुश लाद देते हैं। 1957-58 और 1958-59 के दो वर्षों में हमने निजी आयात में 38 फीसदी की कटौती की। सबसे ज्यादा असर 'विलासिता के सामान' पर पड़ा। लेकिन इसका आयातित सामान की मांग पर कोई असर नहीं पड़ा। मुद्रास्फीति और नियंत्रणों से उपजी काले धन ने इसका लगातार पोषण किया है।

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