खतरे में हैं मुक्त उद्यम - बी.आर. शिनॉय

यह लेख उद्योगपति जे.आर.डी. टाटा के एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री में दिए गए भाषण के समर्थन में  12 मई, 1975 को लिखा गया है। इसमें निजी उद्योग के अस्तित्व पर गहराते संकट को लेकर चेतावनी दी गई है…

भारत में मुक्त उद्यम और निजी स्वतंत्रता खतरे में है। जे.आर.डी. टाटा ने कहा है, "वक्त आ गया है जब मिश्रित अर्थव्यवस्था के एक हिस्से निजी उद्यमों की समाप्ति के खतरे को लेकर मुखर चेतावनी दी जाए।" भारत में सरकार को हटाने और समाज की स्थापित व्यवस्था को खत्म करने के लिए साम्यवादियों ने हिंसक क्रांति की बजाय शांतिपूर्ण घुसपैठ का रास्ता अख्तियार किया है।

टाटा ने बताया, रणनीति के तहत "कुछ लोगों ने, जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सदस्य हैं, सरकार में महत्वपूर्ण स्थानों पर कब्जा कर लिया। फिर हमारे आर्थिक ढांचे में मार्क्सवादी प्रकृति के कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं। लेकिन यह प्रक्रिया इतने धीमे से लागू की गई है कि न तो बुद्धिजीवी और न ही आम जनता ही इस शुरूआती खतरे को भांप सके हैं, जिसमें मिश्रित अर्थव्यवस्था की जगह 'पूरी तरह से योजनाबद्ध और अनुशासनबद्ध अर्थव्यवस्था' को सफाई से लागू किया जा रहा है।"

योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन पी. एन. हक्सर ने इस कड़वी सच्चाई पर बेहद मुखर प्रतिक्रिया दी है। देश के शीर्ष कारोबारी संगठन, फैडरेशन ऑफ द इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की सालाना बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मिश्रित अर्थव्यवस्था अभी मुर्दाघर में नहीं है, लेकिन भारी उतार-चढ़ाव झेल रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय उत्पाद का 90 फीसदी निजी क्षेत्र से ही आता है, इसलिए टाटा की चेतावनी में कोई दम नहीं है।

निजी क्षेत्र के भारी उत्पादन को टाटा के आकलन के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उनकी अनिष्ट की आशंका, कारोबारी प्रतिष्ठानों, उनके विस्तार और कार्यप्रणाली पर सरकार के बढ़ते नियंत्रण पर आधारित है। आशंका का दूसरा कारण सार्वजनिक और निजी क्षेत्र को दिए जाने वाले कर्ज को निजी क्षेत्र की शेयर पूंजी में तबदील करने का विकल्प है। तीसरा कारण है निजी क्षेत्र द्वारा सकल निवेश संसाधन (वर्तमान घरेलू बचत, विदेशी मदद और मुद्रा भंडारण पर समाशोधन का योग) के 65 फीसदी तक का वार्षिक विनियोजन और खनन पूंजी में सरकार की भागीदारी को 50 फीसदी से कम कर देगा। अगर कर्ज को शेयर पूंजी में तबदील किया गया तो सरकारी स्वामित्व 80 फीसदी तक बढ़ सकता है।

इस तरह वर्तमान मिश्रित अर्थव्यवस्था के 'मिश्रण' में उत्पादन पर स्वामित्व का साम्यवादी मत समय गुजरने के साथ एक स्वीकार्य सोच हो जाएगा। साम्यवाद की तरह या फिर उसमें छलांग लगाने की तरह, बिना कोई आंसू बहाए। आपने देखा होगा कि 1973 में कितनी आसानी के साथ गेहूं के थोक कारोबार का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था। भारत में आज जो राजनीतिक हालात हैं, उनमें तो चुनावी बाध्यताओं के चलते तथाकथित एकाधिकार वाले घरानों-निजी क्षेत्र की शीर्ष कारोबारी कंपनियों-के अधिग्रहण पर भी कोई राजनीतिक बवाल खड़ा नहीं करेगा।

यह संभावना महज कपोल कल्पना नहीं है। यह शीर्ष नीति निर्धारकों और कांग्रेस के प्रभुत्व वाले धड़े की विचारधारा से मेल खाता है। संभव है कि इसे भी जुलाई 1969 के चुनावों में बैंकों के राष्ट्रीयकरण को मिले अप्रत्याशित समर्थन जैसा ही समर्थन हासिल हो। साथ ही अधिकतर पर्यवेक्षकों की राय है कि सत्तारुढ़ दल सत्ता में वापसी के लिए किसी भी हद तक झुक सकता है। भारतीय परिदृश्य की यही स्थिति टाटा के आकलन की आशंका का आधार हैं।

यह संभावना महज कपोल कल्पना नहीं है। यह शीर्ष नीति निर्धारकों और कांग्रेस के प्रभुत्व वाले धड़े की विचारधारा से मेल खाता है। संभव है कि इसे भी जुलाई 1969 के चुनावों में बैंकों के राष्ट्रीयकरण को मिले अप्रत्याशित समर्थन जैसा ही समर्थन हासिल हो। साथ ही अधिकतर पर्यवेक्षकों की राय है कि सत्तारुढ़ दल सत्ता में वापसी के लिए किसी भी हद तक झुक सकता है। भारतीय परिदृश्य की यही स्थिति टाटा के आकलन की आशंका का आधार हैं।

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