सवाल जवाबदेही का...
किसी भी केंद्रीय मंत्री का कोई भी बयान काफी मायने रखता है और उसके द्वारा कहे गए एक भी शब्द के बहुत मायने निकाल भी लिए जाते हैं। शायद इस बात का एहसास हमारे मंत्रियों को नहीं है, तभी तो केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री शरद पवार के एक बयान के बाद चीनी के दाम आसमान छूने लगे थे और आज चीनी की कीमत 50 रु. प्रति किग्रा तक पहुंच चुकी है।
शरद पवार के कब्जे में कृषि मंत्रालय के साथ ही खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय भी है. पवार के कामकाज का आकलन जब-जब भी हुआ है उन्हें प्रदर्शन के मामले में फिसड्डी मंत्रियों की सूची में सबसे ऊपर ही रखा गया है. उनके समूचे कार्यकाल में आम लोगों को लेकर कोई न कोई परेशानी उठानी पड़ी है. सरकार महंगाई के जो आंकड़े जारी करती है वह भी लोगों को भ्रमित करते हैं क्योंकि जब मुद्रास्फीति की दर शून्य पर थी तब भी प्याज के दाम आंखों में आंसू ला रहे थे, दालें खाने की थाली से गायब हो रही थी और अन्य खाद्य पदार्थ भी जे को चुनौती दे रहे थे. पवार को मंत्रीपद पर बनाए रखना गठबंधन राजनीति की मजबूरी हो सकती है लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसे मंत्रियों को जनता कब तक भुगतेगी?
एक दो दिन पहले की अगर बात करें तो खाद्यान्नों की कीमतों पर लगाम कसने के लिए मंत्री महोदय कुछ करते इससे पहले ही उन्होंने अब दूध पर बयान देकर एक बार फिर से विवादों को हवा दे दी है। केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री का कहना है कि उत्तर भारत में दूध की कमी चल रही है और दूध की उपलब्धता में इजाफा करने के लिए खरीद मूल्य में वृद्धि करने पर विचार करने की जरुरत है।
अगर दूध की कीमतों में वृद्धि की बात करें तो 30 अक्तूबर, 2009 में ही दिल्ली समेत कई राज्यों में दूध के दाम दो रु. लिटर बढ़ाए गए थे। जिसके बाद मदर डेयरी के दूध की कीमत 28 रु. लिटर (जो पहले 26 रु. लिटर था) पर पहुंच गई जबकि टोंड दूध की कीमत 22 रु. लिटर (जो पहले 21 रु. लिटर था) है। अगर इस लिहाज से देखा जाए तो रोजाना 125 रु. की दिहाड़ी कमाने वाला शख्स अगर 50 रु. चीनी और 22 रु. दूध पर खर्च कर देता है तो उस दिन उसके पास 53 रु. बचते हैं। अमूमन वह रोजाना चीनी नहीं खरीदेगा। इसलिए थोड़ा आगे बढ़ें तो एक आम आदमी के भोजन का अहम हिस्सा हैं दाव-चावल। भारत में सबसे अधिक पसंद की जाने वाली दाल अरहर की है, ताज्जुब यह कि इसकी कीमत भी सौ रु. प्रति किग्रा से कम नहीं है। यही हाल सब्जियों, चावल और आटे का भी है। जो धीरे-धीरे आम आदमी की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं।ऐसे में परिस्थितियों को संभालने के बजाय हमारे मंत्री महोदय सिर्फ उकसाऊ बयान देने में अधिक व्यस्त नजर आ रहे हैं। केंद्रीय मंत्री बैठकें कर अपनी औपचारिकता पूरी कर रहे हैं. राज्यों में हो रही जमाखोरी और कालाबाजारी का हवाला देकर तथा आपूर्ति घटने का बहाना बना कर हर बार केंद्र सरकार अपना पल्ला झाड़ रही है और मंहगाई थमने का नाम ही नहीं ले रही. विपक्ष की भूमिका इस मामले में चौंकाने वाली है क्योंकि वोटों की राजनीति में मंहगाई को बड़ा मुद्दा बना कर कभी जनता की आवाज को बुलंद करने के प्रयास ही नहीं किए गए.
- ऐसे में खाद्य पदार्थों की लगातार चल रही महंगाई के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?
- क्या आपको नहीं लगता कि लगातार खराब प्रदशर्न करने वाले मंत्री के लिए जवाबदेही तय करनी चाहिए?
- महंगाई को काबू करने के लिए सरकार को किस तरह की भूमिका का निर्वहन करना चाहिए?
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