किसे मिले भू-अधिग्रहण अधिकार

आज़ादी का समर्थक होने के कारण मैं नागरिकों की जमीन के सरकार द्वारा जबर्दस्ती अधिग्रहण को साफ तौर पर पसंद नहीं करता। इसलिए मैं पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा टाटा और सलीम ग्रुपों के लिए सिंगूर और नंदीग्राम में किए गए भूमि अधिग्रहण के किसानों द्वारा किए गए विरोध का समर्थन करता हूं। ऐसा करते वक्त मैं कुछ हिचकिचाहट भी महसूस करता हूं क्योंकि मैं पश्चिम बंगाल को फिर से औद्योगिक तौर पर विकसित देखना चाहता हूं। लेकिन इसे हासिल करने के अच्छे और बुरे दोनों ही तरीके उपलब्ध हैं। बुरा तरीका राज्य सरकार द्वारा जमीन को कानून बनाकर हासिल करना। सही तरीका है किसानों को ही औद्योगिकीकरण का हिस्सा बनने का अधिकार दे दिया जाए।

प्रधानमंत्री ने एक नई मानवीय विस्थापन नीति का वादा किया है। इसका मतलब तो यही निकलता है कि पिछली नीति अमानवीय थी। समाजवाद के नाम पर सरकार ने निजी या सार्वजनिक हर उस जमीन को हासिल कर लिया जो वह चाहती थी। साथ ही उसने ही यह भी तय किया कि किस जमीन के बदले कितना मुआवजा दिया जाए। 1976 में जायदाद पर अधिकार के मूलभूत अधिकार की समाप्ति के साथ ही मुआवजा किसानों के हक नहीं राजनीतिज्ञों की सनक से तय होता था। दशकों तक सरकार (और निगम भी) भूमि अधिग्रहण को औद्योगिकीकरण की दिशा में पहला कदम माना करते थे।

सिंगूर और नंदीग्राम ने यह बता दिया कि यह सोच अब बेमानी हो चुकी है। किसी भी अन्यायपूर्ण अधिग्रहण की सूचना मिलते ही टीवी चैनलों के कैमरे वहां पहुंच जाते हैं और विरोधी राजनीतिज्ञ भी मैदान में कूद पड़ते हैं। सैकड़ों विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) बना दिए गए हैं, कई तो हजारों एकड़ तक फैले हुए हैं। अगर हमने अपने भूअधिग्रहण कानून में सुधार नहीं किया तो ये सेज भी जल्द ही हिंसक विरोध का अखाड़ा बन जाएंगे। आदर्श स्थिति तो यह होगी कि उद्योगों द्वारा वही जमीन खरीदी जानी चाहिए जो उसका मालिक स्वेच्छा से दे रहा हो। किसी को इसे असंभव मत कहने दीजिए।

रिलायंस ने हरियाणा में किसानों से सैकड़ों एकड़ जमीन खरीदी है। डीएलएफ और यूनिटेक जैसे बिल्डरों ने बाजार से खरीदकर काफी जमीन इकट्ठा कर ली है। महाराष्ट्र के एम्बी वैली में सहारा ग्रुप ने जमीन बेचने के इच्छुक लोगों से हजारों एकड़ जमीन खरीदी है। फिर भी समस्या खड़ी हो सकती है अगर किसी उद्योग की नजर जमीन के किसी हिस्से पर हो और वहां अधिकांश किसान तो जमीन बेचने को तैयार हों, लेकिन कुछ हैं कि न बेचने पर अड़ जाएं। ऐसी परिस्थिति में ताजा तरीका तो जोर-जबर्दस्ती से अधिग्रहण ही है। बेहतर होगा कि ऐसा कानून बना दिया जाए जो किसानों को खुद ही फैसला लेने का हक दे दे। नए कानून के तहत सरकार या कार्पोरेशन किसानों से बातचीत करे और मामले पर किसानों से मतदान करा लिया जाए। बहुमत का जो दो तिहाई या तीन चौथाई हो सकता है, जो फैसला हो वह विरोध करने वाले किसानों पर भी लागू हो।

इस योजना के तहत अंतिम फैसला सरकार या कार्पोरेशन नहीं खुद किसानों के हाथों में ही रहेगा। यह समाज आधारित भू-अधिग्रहण का आधार बनेगा। यह किसानों के जमीन पर हक और उनके सम्मान दोनों की ही रक्षा करेगा और औद्योगीकरण में उनको सहयोगी की भूमिका में ला खड़ा करेगा। कुछ लोगों ने इससे कम सुधारों की सिफारिश की थी, जिसमें भू-अधिग्रहण का फैसला पंचायत के अधिकार क्षेत्र में लाने को कहा गया था। यह पर्याप्त नहीं है। प्रभावित होने वाले किसानों को ही अपनी जमीन के बारे में अंतिम फैसले का हक होना चाहिए। दूसरा, नए कानून के तहत किसानों को यह अधिकार भी होना चाहिए कि वे अपनी जमीन को चाहें तो बेचें या फिर लीज पर दे दें।

जबर्दस्ती भू-अधिग्रहण से किसान दयनीय विस्थापित बन जाएंगे। लेकिन अगर किसान अपनी मर्जी से जमीन लीज पर देते हैं तो वह मालिक बने रहेंगे और कार्पोरेशन उनके किरायेदार। यह किसानों के स्तर और उनके सम्मान को सुधारकर उनको वास्तविक पार्टनर बना देगा। लीज रेंट को भी वक्त के साथ बदलने का प्रावधान होना चाहिए। नए कानून में किसानों के मकानों को आस-पास की जमीन बेचने या लीज देने पर यथावत रखने का प्रावधान होना चाहिए। एक आम औद्योगिक परिसर में एक मुख्य क्षेत्र होता है जिसे सुरक्षा और कर के कारणों से बंद रखा जाता है और बाहरी क्षेत्र खुला रहता है। मकानों, पार्क और सामाजिक गतिविधियों के केंद्र वाले इसी बाहरी इलाके में किसानों के मकानों को शामिल किया जाना चाहिए। ऐसे में यहां पर ग्रामीणों और शहर से आई आबादी का एक संतुलित मिश्रण बना रहेगा। वरना ऐसे इलाके आमतौर पर साहबों के इलाके बनकर रह जाते हैं। यह प्रस्ताव कम क्रांतिकारी नहीं है। दिल्ली ही इतने सालों में सैकड़ों गांवों को निगल चुकी है। लेकिन ग्रामीणों से कृषि जमीन अधिग्रहण के दौरान उनके आवासीय इलाकों को नहीं छेड़ा गया। यही वजह है कि आज भी दिल्ली में ये मूल गांव महानगर का ही एक हिस्सा बनकर उसमें अच्छी तरह से घुल-मिल गए हैं। दिल्ली के केंद्र में ही इन किसानों के पास करोड़ों की जमीन है। कई ने तो बहुमंजिला इमारतें बनाकर कई मकान किराये पर दे रखे हैं। नए औद्योगिक इलाकों में भी ऐसा ही किया जा सकता है।

कार्पोरेशनों की यह शिकायत आम होती है कि ताजा विरोध प्रदर्शनों ने मौके का फायदा उठाने वाली राजनीति को बढ़ावा दिया है। ऐसा नहीं है। उल्टा मीडिया ने आज के भू-अधिग्रहण कानून के नाम पर जायदाद के हकों से हो रहे खिलवाड़ का पर्दाफाश किया है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसकी विरोधी दल के राजनीतिज्ञ अनदेखी नहीं कर सकते। कार्पोरेशनों और सरकार दोनों का ही मानना है कि समाज के हाथों में भू-अधिग्रहण का फैसला दे दिए जाने पर हर काम में देरी होगी जिसका औद्योगीकरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। बिल्कुल नहीं। नए कानून से तो सरकार को ऐसे ग्रामीण इलाकों को चिन्हित करने में आसानी हो जाएगी जो भविष्य में औद्योगिकीकरण के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। एक बार ऐसा हो जाए तो प्रगतिशील इलाकों के किसानों को भी इसमें अपने फायदे की बात समझ में आ जाएगी। कुछ तो खुद आगे होकर औद्योगिकीकरण के लिए अपनी जमीन देने लगेंगे। आज कृषि से काफी कम कमाई होती है। ग्रामीणों को औद्योगिकीकरण से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित कीजिए और वो इस मौके का दोनों हाथों से फायदा उठाएंगे। उन्हें अधिकार दीजिए और पूरा का पूरा गांव ही जमीन देने को तैयार दिखाई देगा।

- टाइम्स ऑफ इंडिया में 14 जनवरी 2007 को प्रकाशित