कैसे प्रभावित होता है विकास

संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट 2006 भारत में सामाजिक विकास का निराशाजनक चित्र पेश करती है। भारत 177 देशों की इस सूची में 126वें स्थान पर है। ऐसे में हमें ऐसी किसी भी भविष्यवाणी से बचना चाहिए कि भारत जल्द ही दुनिया की एक आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है। दमदार सामाजिक विकास के बगैर आर्थिक तरक्की बेमानी साबित होगी।

भारत वाकई विरोधाभास पेश करता है। एक ओर तो वह लगातार चार साल तक 8 फीसदी की औसतन सकल घरेलू उत्पाद बढ़ोतरी के साथ आर्थिक तरक्की में चमत्कार साबित हो रहा है तो दूसरी ओर इसके सामाजिक विकास के संकेतक चिंता में डाल देने वाले हैं। चमत्कार की बात तो छोड़ दीजिए हमारे यहां पर सामाजिक सेवाएं अपने तय काम का आधा भी नहीं कर पा रही हैं।

इस विरोधाभास को कैसे समझाया जा सकता है? निजी सेक्टर में उदारीकरण ने आर्थिक विकास को पंख लगा दिए। भारतीय कंपनियां विश्वस्तरीय बन गई हैं और अब अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी में मल्टीनेशनल कंपनियों को पीछे छोड़ रही हैं। इसके विपरीत सामाजिक सेवाओं में कोई सुधार नहीं लागू किया गया है और इसका जिम्मा ऐसे कठोर सरकारी कर्मचारियों के हाथों में हैं जिन्हें आसानी से नौकरी से निकाला भी नहीं जा सकता।

सुधार लागू करने वाले औद्योगिक और आईटी सेक्टर ने विश्वस्तर का प्रदर्शन किया है। गैर-सुधार वाले क्षेत्रों की हालत पतली है। इस क्षेत्र में तो बांगलादेश तक हमसे आगे निकल गया है। फिर भी भारत के वामपंथी यह राग अलाप रहे हैं कि भारत के सामाजिक क्षेत्र में नाकामी का कारण आर्थिक सुधारों की नाकामी है। यह केवल शहरी रईसों के काम आ रहे हैं जबकि हमारे कम शिक्षित ग्रामीणों का इससे नुकसान ही हो रहा है।

मैं एक अखबार में प्रकाशित लेख का जिक्र करना चाहूंगा, 'मानव विकास रिपोर्ट...वैश्वीकरण के विरोधियों, खासतौर पर भारत में, को एक सशक्त हथियार थमा देती है। यह बताती है कि भारत सहित अधिकांश देशों में पहले के 15 वर्षों की तुलना में मानव विकास सूचकांक में 1990 से 2004 के दौरान गिरावट ही आई है। भारत के मामले में जहां 1975 से 1990 के दौरान मानव विकास सूचकांक सुधार के साथ 25 फीसदी तक पहुंच गया था, तो वही अगले 14 सालों में गिरकर 18.6 फीसदी तक आ गया।

यह देखते हुए कि बाद का काल सुधारों का काल था सुधारों के विरोधियों द्वारा इसे अपने तर्कों को पुख्ता करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।' ऊपर दी गई बात को देखकर तो आप भी यही सोच बना सकते हैं कि भारत ने मानव विकास में विविध सुधार लागू किए जो नाकाम साबित हुए। वास्तविकता में तो सामाजिक क्षेत्र में कोई सुधार ही नहीं किया गया। बिना सुधार वाली सरकारी सेवाओं की हालत और खराब हो गई है। गैर-सुधारों की नाकामी का कारण बनने का यह एक ज्वलंत उदाहरण है।

दिल्ली जैसे कुछ शहरों को भरपूर मात्रा में पेयजल की आपूर्ति की जाती है, लेकिन इसमें से दो-तिहाई तो बेकार जमीन में ही बह जाता है। यही वजह है कि दिल्ली के लोगों को केवल चार घंटे ही पानी मिल पाता है। आईटी सिटी के नाम से पूरी दनिया में मशहूर बंगलूर में दिन में केवल ढाई घंटे पानी आता है और चेन्नई में तो दिन में केवल डेढ़ घंटे। इसके विपरीत कोलंबो, जकार्ता और डकार में 24 घंटे पानी की आपूर्ति की जाती है। यानी भारत की सरकार द्वारा संचालित जल आपूर्ति योजना अफ्रीका के सबसे पिछड़े इलाकों से भी बुरी है।

वर्ल्ड बैंक की ताजातरीन विकास नीति समीक्षा इस बात का खुलासा करती है कि दिल्ली के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का औसत डॉक्टर तंजानिया के औसत डॉक्टर से कम जानकार होता है। साथ ही दिल्ली के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर से सही उपचार की उम्मीद केवल 50 फीसदी ही होती है। शिक्षकों का क्लास से नदारद रहना आम है और पांच राज्यों के बच्चे पांचवीं कक्षा तक पहुंचने के बाद भी दूसरी कक्षा तक के स्तर की पढ़ाई नहीं कर सकते।

सरकार के आईआईटी और आईआईएम विश्वस्तरीय हैं, लेकिन ये साल में चंद हजार स्नातक ही तैयार कर पाते हैं। सरकारी कॉलेजों से निकलने वाले लाखों छात्र इतने अकुशल होते हैं कि उनमें से अधिकांश को रोजगार के लायक नहीं माना जाता। कौशल की मांग के चलते ही निजी कॉलेजों की भरमार सी आ गई है। आईसीआरआईईआर के ताजा शोध के अनुसार 1999-2000 से 2005 के दौरान निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या 669 से बढ़कर 1478, टीचर प्रशिक्षण संस्थाओं की संख्या 1050 से बढ़कर 5190, फिजियोथैरेपी संस्थानों की संख्या 52 से बढ़कर 205 और फार्मेसी कॉलेजों की संख्या 204 से बढ़कर 629 हो गई है। इनका स्तर कोई बहुत अच्छा नहीं है, लेकिन बेहतर सेवा के नाम पर ये चल निकले हैं, हालांकि इनकी फीस कुछ ज्यादा है।

ज्यादा फीस के बाद भी दिल्ली में 53 फीसदी छात्र निजी स्कूलों में ही पढ़ते हैं। वे जानते हैं कि सरकारी स्कूलों की मुफ्त शिक्षा बेरोजगारी का सबब बन सकती है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी दयनीय है। अधिकांश दिनों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में या तो कर्मचारी नहीं होते या दवाई। सभी स्वास्थ्य सेवाओं में से केवल 20 फीसदी ही सरकार द्वारा मुहैया कराई जा रही है। यह दुनिया में सबसे कम औसत है।

आखिर इसका हल क्या है? सबसे पहले सरकारों को लोगों को शिक्षा पर खर्च के लिए पैसा देना चाहिए और यह उन पर छोड़ देना चाहिए कि वे इसका इस्तेमाल सरकारी शिक्षा संस्थाओं में करें या निजी स्कूलों में या फिर क्लीनिक में। इससे उपजने वाली प्रतिस्पर्धा से स्तर में सुधार होगा। दूसरा हमें लाइसेंस परमिट राज को समाप्त करना होगा जो निजी स्कूलों की प्रगति की राह का रोड़ा है। तीसरा, हमें पंचायतों को आर्थिक फैसलों का अधिकार देना चाहिए ताकि वे अपने स्तर पर डॉक्टरों और टीचरों की भर्ती कर सकें और इस बात के लिए उनको अपने राज्य मुख्यालय का मुंह न ताकना पड़े। साथ ही स्थानीय प्रशासन को ड्यूटी से मुंह चुराने वाले स्टाफ का किसी भी दिन का वेतन काटने का अधिकार दे दिया जाना चाहिए। पांचवां, निजी विश्वविद्यालयों को प्रतिबंधित करने की बजाय प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। विदेशी विश्वविद्यालयों को भी यहां कैम्पस खोलने की इजाजत दी जानी चाहिए। ऐसे सुधार तो बस एक शुरूआत होंगे। हमें अभी काफी लंबा रास्ता तय करना है।

- टाइम्स ऑफ इंडिया में 12 नवंबर 2006 को प्रकाशित