बढ़ा दायरा आरटीआई का...
सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कानून का उद्देश्य प्रशासनिक और सरकारी जवाबदेही को सुनिश्चित करना रहा है, और अगर लोकतंत्र का कोई अंग इससे अछूता रहता तो इससे इस कानून का उद्देश्य पूरा होता नजर नहीं आता था।
लेकिन आरटीआइ से जुड़ा एक ऐतिहासिक फैसला दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया है, जिसके बाद अब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय के लिए भी सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत सूचना देना अनिवार्य होगा। सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई का कार्यालय, उनकी संपत्ति और उनके न्यायिक व्यवहार से जुड़ा हर पहलू सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे में आएगा। वे इसे सार्वजनिक करने से इनकार नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस तरह खुद को अन्य न्यायाधीशों से अलग नहीं दिखा सकते। वे भी सूचना के अधिकार कानून के तहत उतने ही बाध्य हैं, जितनी दूसरी लोक संस्थाएं।
यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि कुछ समय पूर्व जब जजों की संपत्ति का विवरण देने का फैसला सामने आया था तो देश के मुख्य न्यायाधीश के.जी बालाकृष्णन ने ऐसा करने से मना कर दिया था। उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश एक संवैधानिक पद प्राप्त व्यक्ति है। वह कोई लोकसेवक नहीं है। लेकिन कानून के पैरोकारों को कानून के दायरे में लाना कोई गलत कदम नजर नहीं आता। इससे पूरे तंत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी ही और लोगों के प्रति जवाबदेही में भी इजाफा ही होगा। इस कदम को साफ-सुथरी न्यायावस्था की दिशा में एक मजबूत कदम की संज्ञा से भी नवाजा जा सकता है क्योंकि दूसरों के लिए आचार संहिता बनाने वाले तंत्र के लिए भी जवाबदेह होना जरूरी है।
- आप दिल्ली हाईकोर्ट के इस कदम को किस तरह देखते हैं?
- आप इस बात को मानते हैं कि इससे लोगों के प्रति जवाबदेही में इजाफा ही होगा?
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