विशेष लेख

यदि आतंकवाद का सहारा लेने वाले साधु-संतों का तर्क यह है कि उनका आतंकवाद सिर्फ जवाबी आतंकवाद है, तो मैं कहूंगा कि यह तर्क बहुत बोदा है। आप जवाब किसे दे रहे हैं? बेकसूर मुसलमानों को? आपको जवाब देना है तो उन कसूरवार मुसलमान आतंकवादियों को दीजिए, जो बेकसूर हिंदुओं को मारने पर आमादा हैं। आतंकवाद कोई करे, किधर से भी करे, मरने वाले सब लोग बेकसूर होते हैं।

क्या आतंक का कोई रंग होता है? कोई मजहब होता है? होता तो नहीं है, लेकिन मुख-सुख के लिए लोग उसका वैसा नामकरण कर देते हैं। यह नामकरण बड़ा

Published on 26 May 2011 - 12:02

कोलकाता की अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय के भीतर का नजारा देखकर अंदाजा हो जाता है कि आखिर क्यों यह पार्टी ममता बनर्जी के ‘परिबोर्तन’ यानी बदलाव के नारे के आगे असहाय हो गयी। कुछ समय पहले कोलकाता में एक यात्रा के दौरान मेरे अनुभव बहुत रोचक हैं. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के इंतजार में बैठने से पहले हमें कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। बड़े से कमरे में हलकी रोशनी है, जिसमें रखी कुरसी पर बैठकर आप अपने स्कूल के परीक्षा वाले दिनों में खो जाते हैं। आसपास का दृश्य अतियथार्थवाद

Published on 16 May 2011 - 13:57

हमारा पिछला दशक मूल्यों के कंफ्यूजन का दशक था। मैं उम्मीद करता हूं कि आगामी दस सालों में हम अपने मूल्यों को लेकर सुस्पष्ट हो पाएंगे। खास तौर पर हमारी नई पीढ़ी के लिए यह बहुत जरूरी है। जब मूल्य स्पष्ट और निर्धारित होते हैं तो हम लोगों को यह बता सकते हैं कि उनके जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए। तमाम घोटाले और घपले मूल्यों के अभाव में ही होते हैं।

नए दशक की दहलीज पर खड़े होकर एक कॉलम लिखना चुनौतीभरा काम है। एक सीमित स्थान में पिछले दस सालों का लुब्बेलुआब पेश करना या आगामी दस सालों के बारे में

Published on 5 May 2011 - 12:11

आजादी के बाद अनशन तो कई हुए, लेकिन अन्ना हजारे का अनशन अपूर्व था| इतने कम समय में इतनी जबर्दस्त प्रतिक्रिया पहले कभी नहीं हुई| श्रीरामुलू के अनशन ने आंध्रप्रदेश बनाया और तारासिंह और फतेह सिंह के अनशन ने पंजाब बनाया| अन्ना के अनशन ने अभी तक कुछ नहीं बनाया| लोकपाल भी नहीं| लेकिन इस अनशन ने सब सीमाएं तोड़ दीं| प्रांत, भाषा, जाति, मज़हब – कोई भी दीवार टिक न सकी| मानो पूरे देश में तूफान आ गया| चार-पांच दिन में ही सरकार की अकड़ ढीली पड़ गई| उसने घुटने टेक दिए|

आखिरकार यह अहिंसक

Published on 28 Apr 2011 - 13:48

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए देशों में भारत के पास लगातार सफल चुनाव संपन्न कराने का और एक मज़बूत व शांतिपूर्ण लोकतंत्र चलाने का अच्छा रिकॉर्ड है.  पिछले पचास सालों में कई देश जो लोकतान्त्रिक उम्मीदों के साथ जन्मे थे, समय के साथ तानाशाही ताकतों और सैन्य विद्रोहों का शिकार हो गए. हमारे पडोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश के उदाहरण से ही पता चलता है कि लोकतंत्र चलाना कितना कठिन है. फिर भी भारत विगत कई सालों से परिस्थितियों के साथ लचीलापन रखते हुए लोकतान्त्रिक मान्यताओं को बनाये रखने में कामयाब रहा है.  लोग

Published on 21 Apr 2011 - 18:59

विकास और सामाजिक खर्च को लेकर पिछले एक-दो महीने से इंटरनेट पर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा शुरू किए गए इस बहस में नोबल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि सामाजिक खर्च में वृद्धि नहीं कर सिर्फ दोहरे अंकों की विकास दर हासिल करने पर ध्यान देना नासमझी होगी। समाचार पत्र ने इसके जवाब में नोबेल पुरस्कार के एक दूसरे दावेदार जगदीश भगवती को भी उद्धृत किया, जिन्होंने कहा कि सामाजिक खर्च बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे बेहतर तरीके से लक्षित

Published on 18 Apr 2011 - 12:29

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