क्लासिक्स

थॉमस सी. टेलर

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पश्चिमी यूरोप में आर्थिक विचारों के दो विरोधी संप्रदायों- जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय और ऑस्ट्रियन संप्रदाय का जन्म हुआ। जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय के आर्थिक इतिहास की सहायता से आर्थिक सच्चाई को जानने का प्रयास किया। प्रारंभिक ऑस्ट्रियन विचारकों ने 1883 में जर्मन संप्रदाय द्वारा विकसित अनुभवाश्रित पद्धति को अपनी आलोचना का शिकार बनाया। इनका मत था कि आर्थिक ज्ञान इतिहास के अध्ययन से नहीं बल्कि सैद्धांतिक विश्लेषण से उत्पन्न होता है। पद्धति को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद दो दशकों से अधिक समय तक बना रहा। ऑस्ट्रियन संप्रदाय के विचारों का उल्लेख करने वाले थॉमस सी. टेलर के मोनोग्राफ एन इंट्रोडक्शन टू ऑस्ट्रियन इकोनॉमिक्स के कुछ अध्याय यहां सिलसिलेवार ढंग से पेश किए जाएंगे, जिनके जरिये आपको इस संप्रदाय के विचारों से रू-ब-रू होने का मौका मिल सकेगा।

एन इंट्रोडक्शन टू ऑस्ट्रियन इकोनॉमिक्स

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पश्चिमी यूरोप में आर्थिक विचारों के दो विरोधी संप्रदायों- जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय और ऑस्ट्रियन संप्रदाय का जन्म हुआ। जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय के आर्थिक इतिहास की सहायता से आर्थिक सच्चाई को जानने का प्रयास किया। प्रारंभिक ऑस्ट्रियन विचारकों ने 1883 में जर्मन संप्रदाय द्वारा विकसित अनुभवाश्रित पद्धति को अपनी आलोचना का शिकार बनाया। इनका मत था कि आर्थिक ज्ञान इतिहास के अध्ययन से नहीं बल्कि सैद्धांतिक विश्लेषण से उत्पन्न होता है। पद्धति को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद दो दशकों से अधिक समय तक बना रहा। ऑस्ट्रियन संप्रदाय के विचारों का उल्लेख करने वाले थॉमस सी. टेलर के मोनोग्राफ एन इंट्रोडक्शन टू ऑस्ट्रियन इकोनॉमिक्स के कुछ अध्याय यहां सिलसिलेवार ढंग से पेश किए जाएंगे, जिनके जरिये आपको इस संप्रदाय के विचारों से रू-ब-रू होने का मौका मिल सकेगा। पेश है पहली कड़ी:

मूल्य के विषयगत सिद्धांत की स्वीकार्यता में हालांकि ऑस्ट्रियन संप्रदाय को अन्य संप्रदायों से अलग नहीं किया जा सकता, परंतु आर्थिक विश्लेषण के आर्थिक उपागम में कुछ प्रमुख विशेषताएं अंतर्निहित रहती हैं। इसकी एक प्रमुख विशेषता अनम्य व्यवस्थात्मक स्थिति का होना है। विधियों को लेकर उठे विवाद की चर्चा पहले ही हो चुकी है जिसे मेन्गर ने अपनी 1883 में प्रकाशित पुस्तक में आरंभ किया था। (अब इसका अंग्रेजी में Problems of Economics and Sociology-Urbana University of Illinois, 1963 अनुवाद कर दिया गया है।) ऑस्ट्रियन संप्रदाय द्वारा विकसित आर्थिक विश्लेषण सैद्धांतिक निगमनात्मक विवेचना पर आधारित है तथा ऑस्ट्रियन आर्थिक सिद्धांत में जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय की तुलना में अनुभववाद का बहुत सीमित स्थान है। सामाजिक वातावरण से उत्पन्न होने वाले आर्थिक तथ्य, ऑस्ट्रियन अर्थशास्त्रियों के अनुसार न केवल जटिल हैं वरन् परिवर्तनशील हैं जिनसे भौतिकी के वैज्ञानिकों द्वारा किए जाने वाले उपयोगों की भांति प्रायोगिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता। तदनुसार, आर्थिक विश्लेषण में गणित की एक उपकरण के रूप में रीति या विधि के आधार पर ऑस्ट्रियन सिद्धांत की आलोचना की जाती है। ऑस्ट्रियन संप्रदाय में मात्रात्मक संबंधों को नहीं, केवल वैचारिक समझ को ही आर्थिक विज्ञान का अर्थपूर्ण आधार माना जाता है। ऑस्ट्रियन संप्रदाय के जनक मेन्गर न केवल इस पर जोर दिया वरन् अपने द्वारा किए गए कार्य में इसका अनुसरण भी किया। मेन्गर के उत्तरवर्ती अनुयायियों ने भी इसका अनुसरण किया।

ऑस्ट्रियन विश्लेषण मानवीय प्रकृति और मानवीय दशा की वास्तविकताओं का उपयोग आधार सामग्री के रूप में करता है। व्यक्ति के मानवीय मूल्य और मानवीय क्रियाएं, समझे गए ज्ञान सहित सीमित साधन ही आर्थिक विज्ञान के केंद्र में हैं। मानवीय चूक या गलती, भविष्य की अनिश्चितता और अनिवार्य रूप से समय में परिवर्तन जैसे कारकों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। यह विश्लेषणात्मक उपागम एक विकसित बाजार अर्थव्यवस्था की जटिलताओं  को कम करता है और बाजार के आवश्यक तत्त्वों की जांच करके आर्थिक प्रक्रिया की आधारभूत समझ प्रदान करता है। यह उपागम अर्थव्यवस्था, बाजार कीमतों, व्यावसायिक लाभ और हानि, ब्याज दर, स्फीति और आर्थिक अवसाद और मंदी छाए किसी भी रहस्यवादी वातावरण को दूर करता है। यह तथ्य ऐसे नहीं हैं कि जिनकी व्याख्या न की जा सके और न ही ऐसे हैं जो बिना कारण उत्पन्न हों।

किफायत  जैसा विशेषण जितना राबिंसन क्रूसो जैसे एकाकी, आत्मनिर्भर व्यक्ति पर लागू होता है उतना ही हर उस व्यक्ति पर लागू होता है जो व्यापक श्रम-विभाजन और जटिल विनिमय की विशेषता वाले समाज में रहता है। रॉबिंसन क्रूसो का कार्य उपलब्ध साधनों का इस प्रकार उपयोग करना था ताकि वह अधिकतम संतुष्टि प्राप्त कर सके। क्रूसो के कल्याण को अधिकतम करने के लिए निर्णय और चुनाव की प्रक्रिया का होना आवश्यक है। इसी प्रकार आधुनिक अर्थव्यवस्था में पारस्परिक क्रिया में लिप्त बहुत अधिक व्यक्ति सभी उपलब्ध साधनों का कुशलतम उपयोग करके संतुष्टि प्राप्त करना चाहते हैं। यह आर्थिक समस्या उस समाजवादी अर्थव्यवस्था में भी विद्यमान रहती है जहां निर्णय और चुनाव जैसे विषय केंद्रीकृत आयोजन बोर्ड में निहित हैं तथा उस बाजार अर्थव्यवस्था में भी जहां व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्र निर्णय लिए जाते हैं।

रॉबिंसन क्रूसो सीमित मात्रा में उपलब्ध संसाधनों का ही प्रभावी ढंग से प्रबंधन कर सकते थे औऱ इन संसाधनों के उपयोगों का निर्देशन करने के लिए तुलनात्मक रूप से उसे कुछ योजनाओं का निर्माण करना पड़ा। वस्तुओं और सेवाओं के चयन का क्षेत्र तुलनात्मक रूप से सीमित और सरल होने के कारण वह मात्रात्मक गणना के बिना भी प्रभावी निर्णय ले सकते थे। उनके द्वारा किए जाने वाले मूल्यांकन और पूर्वानुमान की योग्यता संभवतः उनके समक्ष उपलब्ध उत्पादक विकल्पों की अंतर्देशीय समझ और अवलोकन पर निर्भर करेगी। भौतिक उत्पाद के रूप में की जाने वाली गणना भी पर्याप्त होगी क्योंकि उसके संसाधनों में बहुत अधिक विविधता नहीं होगी और बहुविज्ञता (Versatility) का अंश भी कम होगा।

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