एक मौकापरस्त मुल्क की रक्तकथा

 

राजनीति, क्रिकेट सहित विभिन्न क्षेत्रों में सुधार के लिए निंदा अभियान चलाने की बजाय ईमानदारी से प्रयास करने की जरूरत। हर मोड़ पर जरूरी सरकारी अनुमति की एवज में हमारे सभी दलों ने जब भी मौका मिला, आगे बढ़ने को आतुर उद्योग जगत की बांहें मरोड़ीं और अपने दलीय तथा निजी कोषों को भरने के लिए धन दुहा है।

पुरानी सामंतकालीन कहावतें कुछ इस तरह की हुआ करती थीं कि राजा कभी गलती नहीं करता (दि किंग इज ऑलवेज राइट), या कि राजा ही अपने समय की शक्ल गढ़ता है (राजा कालस्य कारणं)। आज के लोकतांत्रिक भारत का सूत्रवाक्य है कि लोकतंत्र में जनता, खासकर युवा हमेशा सही होते हैं। बिगाड़ कोई करता है, तो अफसर, नेता, ठेकेदार, मीडिया या पार्टियों के हाई कमान। लेकिन रुकिये।

कई राज्यों में सामूहिक दुराचार की वारदातें करने, बतौर खिलाड़ी चोरी से प्रतिबंधित नशीली दवाएं लेने, गैरकानूनी सट्टेबाजी, घाटा पाटने को अपने ही रिश्तेदार अगवा कर मार डालने तथा मैच फिक्सिंग घोटाले के पर्दाफाश होने के बाद क्या यह भोली धारणा निरस्त नहीं होती कि जनता, खासकर उसके युवाओं को अब भी दुधमुंहे बच्चों की तरह निष्कलंक और गाय की तरह अवध्य माना जाए? कि पुरानी पीढ़ी ही दोषी है, और व्यवस्था से उसे हटाकर युवाओं को राज समाज की बागडोर सौंप देना क्रांतिकारी बदलाव ले आएगा।

हमारा मतदाता व्यवस्था के विरुद्ध आग उगलते और तलवारें भंजाते नेताओं के चुनावी भाषण सुनकर चाहे जितनी भी तालियां बजाए, नवीनतम (कर्नाटक) चुनावों में सिविल सोसायटी द्वारा उतारे अधिकतर साफ-सुथरे युवा उम्मीदवारों की हार इस बात का सबूत है कि ऐन समय पर दागी उम्मीदवारों को हराने की बजाय चंचलचित्त जनता अक्सर जाति, धर्म की पुरानी मक्खियां ही निगल लेती है।

फिर नई सरकार बन गई तो उसके गुण कुछ दिन बाद दुगरुण नजर आने लगते हैं, फिर वही निंदा का प्रवाह! यकीन न हो तो देखें कि किस तरह 2008 में अपनी गंभीरता, मितभाषिता, नो नॉनसेंस कार्यशैली तथा संप्रग अध्यक्षा से तालमेल बनाए रखने की क्षमता के लिए सराहे गए प्रधानमंत्री आज इन्हीं वजहों से विपक्षी भाजपा, जनता और मीडिया के समवेत निशाने पर हैं।

लोकतंत्र हो या क्रिकेट, जननिंदा का कोई भी सार्थक नतीजा तभी निकलेगा, जब कि निंदा ईमानदारी से की जाए। खेल या चुनाव के वक्त, अगर नैतिक आधारों को अटूट रखने के आग्रह की बजाय हम सिर्फ चमत्कारी पालियों के गणितीय आंकड़ों के आधार पर अपनी निंदा और मैन ऑफ दि मैच की व्याख्या बदलते रहे, तो साफ-सुथरे कायदे-कानूनों, दागी बुजदिल खिलाड़ियों या प्रतिभावान लेकिन बेसहारा लोगों की मूक जमात से देश का कोई गहरा सरोकार न खेल में बनेगा, न राजनीति में। संदिग्ध तरीकों से काम करने वाले नेता और खिलाड़ी ही हर प्रतिष्ठान छांटता रहेगा।

सोचिये, केन्द्र को कोसते विपक्ष ने स्वशासित राज्यों में नेताओं, नौकरशाही और वर्दीधारी पुलिस को कितना अधिक जनमुखी और जवाबदेह बनाया है? और जनता की कथनी-करनी में कितना साम्य है? हर शहर में इन दिनों दाखिले का सीजन है और दाखिले की औपचारिक अर्हता पर खरे न उतर सके लाखों छात्र और उनके अभिभावक अचानक हमको मनचाहे संस्थान में दाखिले के लिए गुप्त डोनेशन ऑफर करते या ऊपरी दबाव डलवाकर अपने बच्चे के लिए जबरन जगह रोकते दिख रहे हैं। कल तक जिस भ्रष्ट व्यवस्था से चौराहों पर तख्तियां लेकर वे इस्तीफा मांग रहे थे, उसके नेताओं, अफसरों के पुतले जला रहे थे, आज पिछवाड़े के दरवाजे से घुसकर उसी से चिरौरी करने में उनको क्या झिझक तथा शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए?

भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा है कि 2011 की 9.3 प्रतिशत विकास दर के नीचे गिरकर 5 प्रतिशत होने का कारण यह है कि हमारे कमजोर सरकारी संस्थान उस त्वरित तरक्की का वेग नहीं झेल सके। लोकतंत्र में भी तेज रफ्तार तरक्की की चुनौतियां लगता है, हम झेल नहीं पा रहे। बदलाव की घड़ी में महत्वपूर्ण नियम-कानूनों का स्थायित्व और स्वीकार सत्ता और जनता के बीच ठोस जमीनी रिश्तों और कार्यक्षेत्र में नई पीढ़ी के कार्य संस्कार ही तय कराते हैं। अगर यह रिश्ते बेईमानी और स्वार्थ से संचालित होते रहे, तो प्रगति पथ पर दौड़ती गाड़ी दिशाहारा बनेगी ही।

सच कहें तो सुबह नौ से पहले और शाम पांच बजे के बाद संपूर्ण क्रांति की बात करने वाला यह वेतनभोगी मध्यवर्ग जिसके भाग हम सब हैं, कुछ गुप्त वजहों से अपनी सुस्त कामकाजी शैली, निजी हितस्वार्थो की जकड़बंदी या अधिकारप्रियता को नहीं त्याग पाता है। हर मोड़ पर जरूरी सरकारी अनुमति की एवज में हमारे सभी दलों ने जब भी मौका मिला, आगे बढ़ने को आतुर उद्योग जगत की बांहें मरोड़ीं और अपने दलीय तथा निजी कोषों को भरने के लिए धन दुहा है।

सरकारी खुफिया तथा निगरानी इकाइयों का बेशर्मी से स्वहित में इस्तेमाल किया और अपने रिश्तेदारों की एक बड़ी फौज के बीच सरकारी पदों की रेवड़ियां भी बांटी हैं। होते होते हमारे यहां क्रिकेट एक उद्योग, राजनीतिक दल चुनाव लड़ने की मशीनें और सरकारी दफ्तर ‘अपने लोगों’ के द्वीप बन गए हैं।

अपनी कमीज लोकतांत्रिक और उजली रखते हुए भी गुप्त वसूली तंत्र कायम रखने को पेशेवर बाहुबलियों तथा पारिवारिक पिंडारी दस्ते सभी ने खोज रखे हैं, जिनके समांतर प्रशासकीय प्रकोष्ठों पर दिल्ली, मोहाली, चंडीगढ़ से चेन्नई या बेंगलुरू तक ज्ञात कानूनों की कोई धारा लागू नहीं होती और हम मतदाता खुद ऊपरखाने निंदा करते हुए भी विपत पड़ने पर  पिछवाड़े से इसी पाताली कानूननिरपेक्ष दुनिया से समझौता करते रहते हैं। नैतिकता का चौकीदार हमारा मीडिया भी अपने पाठकों की बजाय शेयरधारकों को खुश करने का लक्ष्य सवरेपरि रखता है। इस माहौल में सड़कों से संसद तक फैला कोई नयनाभिराम आंदोलन कैसे सच्चा या सफल हो?

हमारी राय में हालिया आंदोलनों की आक्रामक नारेबाजी, इस बहुस्तरीय तंत्र की गहरी समझ या आमजन के प्रति सच्ची सहानुभूति से नहीं, राजनीति के दूर लगे अंगूरों को खट्टे बताने की विवशता से उपजी थी। कई नकली मसीहा अब खुद चुनावी मैदान में हैं और वे अंगूर तोड़ने के लिए चुनावी चंदे की बहती गंगा में हाथ नहीं धोएंगे, मानना तनिक कठिन है।

सुधार यदि करने हैं तो उनकी शुरुआत राजनीतिक दलों से करके राजनेतानीत भारतीय खेल जगत तक हर उस क्षेत्र को उनकी लपेट में लेना पड़ेगा, जिन्होंने नाना पीढ़ियों को भ्रष्टाचार सहिष्णु बनाया है। यह न्याय के प्रति स्थिर और आदरपूर्ण माहौल में ही संभव है, ताकि सफाई के बीच भी रोजमर्रा के जरूरी कामकाज जारी रहें। आज की न्यायविमुख अराजकता के बीच किसी भी प्रधानमंत्री पर पत्थर फेंककर बेहतर तंत्र हासिल होगा क्या?

 

- मृणाल पाण्डे (जानी-मानी साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार)

साभारः दैनिक भास्कर