क्या वर्क फ्रॉम होम वाली व्यवस्था से महिला रोजगार को बढ़ावा मिलेगा?

कोविड महामारी कई मायनों में दुनिया को स्थायी रूप से बदल देगी। जाहिर तौर पर, घर से काम करने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि होगी। कार्य स्थल समाप्त तो नहीं होंगे लेकिन घर से होने वाले कार्यों की हिस्सेदारी काफी बढ़ जाएगी।

यह नियोक्ताओं के कार्यालय के लिए स्थान और आवश्यक सहायक सुविधाओं में बचत करेगा। इससे कर्मचारियों के पैसे, समय और कार्य स्थल पर आने जाने में लगने वाले समय में भी बचत होगी। हर मुद्दे पर होने वाली मीटिंग की जरूरतें भी कम होंगी। अधिक से अधिक लोगों को पार्ट टाइम या घर पर रहकर टुकड़ों में कार्य करने का मौका मिलेगा, जिससे उत्पादकता में बढ़ोतरी होगी।  

भारत में, वर्किंग फ्रॉम होम वाली व्यवस्था अंततः महिलाओं के श्रम बल सहभागिता दर (फीमेल लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट अर्थात एफएलपीआर) को नाटकीय तरीके से उल्टी दिशा में ले जा सकता है। धनी देशों में 15 वर्ष से उपर की दो तिहाई महिलाएं नौकरी करती हैं जिससे उनकी आय और जीवन स्तर में वृद्धि होती है। प्रत्येक चमत्कारी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में एफएलपीआर में वृद्धि होने से वहां की जीडीपी में 7 प्रतिशत से अधिक की प्रगति हुई है। 

इस मामले में भारत एक अपवाद है जहां सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एफएलपीआर की दर 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों के 33 प्रतिशत से घटकर केवल 25 प्रतिशत रह गया है। जबकि सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) द्वारा किये गए सर्वेक्षण के मुताबिक यह दर घट कर 11 से 12 प्रतिशत तक ही रह गई है। सीएमआईई के आंकड़े इतने बुरे दिखते हैं कि इनके सत्य होने पर संदेह होता है। संभवतः कोविड ने महिलाओं का घर से निकल कर काम के लिए जाना अधिक असुरक्षित बना दिया है। 

एफएलपीआर के गिरने का मतलब है भारत में महिलाओं और पुरुषों दोनों की श्रम भागीदारी यानी समग्र श्रम भागीदारी के दर का गिरना। बढ़ते जनसांख्यिकीय विविधता का जो लार भारत को मिलना चाहिए था यह उसके बिल्कुल विपरीत है। एक दशक पूर्व भागीदारी की दर लगभग 50 प्रतिशत थी जो कि 2019-20 में घटकर 43 प्रतिशत हो गई। कोविड के कारण यह और कम हो गई थी जिसमें अब कुछ सुधार हुआ है लेकिन यह अब भी 41 प्रतिशत जैसे दयनीय स्तर पर है। पुरुषों की भागीदारी लगभग लगभग स्थिर रही है लेकिन महिलाओं की भागीदारी में काफी गिरावट आयी है जिससे इसके राष्ट्रीय औसत मे भी भारी कमी हुई है।

ऐसा क्यों? एक कारण जो काफी उत्साहित करने वाला है वह यह है कि 15 वर्ष से 25 वर्ष आयु वर्ग की युवतियों का एक बड़ा तबका जो पहले खेतों में होता था वह आज स्कूलों और कॉलेजों में है। यही बात 15 वर्ष से 25 वर्ष आयु वर्ग के युवकों के उपर भी लागू होती है। दीर्घकाल के लिए यह एक अच्छी बात है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता का भी उन्नत होना आवश्यक है।

लेकिन रोजगार में महिलाओं की भागीदारी 25 से 65 वर्ष तक के सभी आयु वर्गों में घटी है, और अहम बात ये है कि ऐसा कृषि क्षेत्र में भी है। भारत के शहरी इलाकों में तो एफएलपीआर पहले से ही दुनिया में सबसे कम लगभग 16 प्रतिशत है, महिला शिक्षा के क्षेत्र में वृद्धि होने के बावजूद इसमें और संकुचन ही हुआ है। कॉलेज जाने वाली युवतियों की संख्या में भारी वृद्धि, महिलाओं के लिए शहरी नौकरियों में भारी वृद्धि के तौर पर रुपांतरित नहीं हुई है।

इसकी व्याख्या गहरे सामाजिक कारणों से होती है। महिलाओं की रोजगार के क्षेत्र में भागीदारी को यदि वैश्विक नक्शे पर देखें तो पता चलता है कि यह दर प्रायः मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में सबसे कम है जिसका विस्तार मोरक्कों से लेकर पूरे उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व से उत्तर भारत तक है। महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और घर से बाहर काम करने के व्यवहार को हतोत्साहित करने वाली इस्लामिक संस्कृति ने उत्तरी भारत की हिंदू संस्कृति को भी प्रभावित किया है। मैनें उत्तर प्रदेश के माइक्रोफाइनेंस समूहों में कार्यरत महिलाओं को पल्लू से चेहरा ढक कर काम करते हुए देखा है जो कि केरल और तमिलनाडु में खुले चेहरे के साथ कार्यरत महिलाओं के बिल्कुल विपरीत है।

उत्तर भारत में यदि महिलाएं घर के बाहर घूमती हैं विशेषकर देर रात को तो उन्हें पुरुषों के लिए आसान शिकार के तौर पर देखा जाता है। बदनामी और इज्जत पर धब्बा लगने के डर के कारण उनसे छेड़छाड़ के खिलाफ शिकायत करने की उम्मीद नहीं की जाती है। ग्रामीण इलाकों की महिलाएं (विशेषकर दलित महिलाएं) समूहों में चावल की रोपाई और फसलों की कटाई करती हैं और अपेक्षाकृत सुरक्षित महसूस करती हैं। लेकिन कृषि कार्य में मशीनों के उपयोग के कारण ऐसे कामों में भी कमी आयी है।

एक समय था जब गरीब परिवार मजबूरी में महिलाओं को पैसा कमाने के लिए बाहर भेजता था। लेकिन अब गरीबी की दर में कमी आने, मजदूरी की दर में वृद्धि होने और शहर में कार्यरत संबंधियों के द्वारा घर पर पैसा भेजे जाने कारण गांवों में रहने वाले कई परिवार प्रतिष्ठा के प्रतीक के तौर पर अपनी जवान महिलाओं को घर पर ही रखते हैं। दलित विद्वान चंद्र भान प्रसाद का कहना है कि ऐसे परिवारों की लड़कियां जो खेतों में काम करती हैं उनको निम्न गुणवत्ता वाले दामाद मिलते हैं। इसलिए महिलाओं को घर पर रखने से प्रतिष्ठा में वृद्धि और विवाह संबंधी समृद्धि दोनों की प्राप्ति होती है। इस प्रकार, रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं की कम भागीदारी के सामाजिक कारणों की जड़ें काफी गहरी होने के कारण इसे आसानी से दूर कर पाना आसान नहीं है।

वर्क फ्रॉम होम (घर से कार्य करना) वाली व्यवस्था संभवतः इस संस्कृति में बदलाव ला सकती है। ज़ूम, गूगल ग्रुप्स व अन्य टेली कॉन्फ्रेंसिंग वाली सुविधा के आने का मतलब ये है कि महिलाएं अब पुरुषों के बराबर घर से ही काम कर सकती हैं और उन्हें सामाजिक लांछन और सुरक्षा की चिंता भी नहीं होगी। उन्हें घर से बाहर जाने जरूरत नहीं होगी और छेड़छाड़ या बदनामी भी नहीं झेलना होगा। ज़ूम ने घर से कार्यालय आने जाने में लगने वाले समय में भी कटौती की है और महिलाओं के लिए कार्यालय और घर के काम दोनों को करना संभव बनाया है। इसके अतिरिक्त, घर से काम करने से होने वाली आय उन्हें घरेलू सहायक को रखने में समर्थ भी बनाएगी।

पूर्व में पुराने और अप्रचलित कानूनों ने आईटी फर्मों के लिए घर से कार्य करने में सहायक उपयुक्त नेटवर्क तैयार करने के लिए आवश्यक टेलीकॉम क्लियरेंस प्राप्त करना मुश्किल बना दिया था। सौभाग्य था कि कोविड के कारण उन कानूनों को स्थगित कर दिया गया और उन्हें अब हमेशा के लिए समाप्त करने की जरूरत है। कॉलेजों में महिला छात्रों की संख्या ने पुरुष छात्रों की संख्या को पीछे छोड़ दिया है और अब इस संख्या के शहरी नौकरियों में नियुक्ति के क्षेत्र में परिवर्तित होने की आवश्यकता है। सरकार को ऐसी कंपनियों को सब्सिडी देने के बारे में विचार करना चाहिए जो महिलाओं को वर्क फ्रॉम होम के लिए नियुक्त कर रही हैं क्योंकि इससे जनसांख्यिकीय भिन्नता को बढ़ाने और कुल मिलाकर समाज को मदद मिलने में सहायता होती है। यह अत्यंत आवश्यक है कि हम उस भयावह संस्कृति को बदलें जो महिलाओं को घर में रखता है और कार्यबल से बाहर करता है।

- स्वामीनाथन अय्यर (लेखक द इकोनॉमिक टाइम्स के कंसल्टिंग एडिटर हैं। वह वर्ल्ड बैंक और एशियन डवलपमेंट बैंक के कंसल्टेंट रहे हैं। लोकप्रिय कॉलमनिस्ट और टीवी कमेंटेटर स्वामी को ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन के स्टीफन कोहेन ‘भारत का अग्रणी आर्थिक पत्रकार’ की संज्ञा देते हैं। साप्ताहिक कॉलम के तौर पर ‘स्वामिनॉमिक्स’ का प्रकाशन द टाइम्स ऑफ इंडिया में वर्ष 1990 से हो रहा है। वर्ष 2008 में द टाइम्स ऑफ इंडिया ने ‘द बेनेवलेंट ज़ूकीपर्स - द बेस्ट ऑफ स्वामिनॉमिक्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन किया था।)

साभारः द टाइम्स ऑफ इंडिया

स्वामीनाथन अय्यर