इसलिए गुणवत्तायुक्त शिक्षा किसी की प्राथमिकता में नहीं

शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों के लाभ दीर्घकाल में दिखाई पड़ते हैं साथ ही इसके लिए निरंतर प्रयास की जरूरत होती है। इसके परिणाम अक्सर आम मतदाताओं के समझ के बाहर होते हैं और राजनीतिक दलों के लिए उन कार्यों का श्रेय लेना भी बहुत मुश्किल होता है। जाहिर है, लोग शिक्षा में बहुत अधिक बदलाव या सुधार की उम्मीद नहीं करते हैं। शिक्षा के मोर्चे पर राज्य की विफलता व्यापक तौर पर स्वीकृत है।

शिक्षा के क्षेत्र में लिए गए निर्णय आमतौर पर लोगों के लिए दृश्यमान नहीं होते हैं। कई निर्णय अत्यंत अप्रासंगिक प्रतीत होते हैं तो कई इतने लाज़मी लगते हैं कि लोगों को उनकी जांच करने की जरूरत ही नहीं लगती। इसलिए, उनके राजनीतिक परिणाम दुर्लभ और महत्वहीन होते हैं। यह एक बड़ा कारण है कि शिक्षा चुनावी मुद्दे के रूप में बहुत कम परिवर्तित हो पाता है।

शिक्षा के अधिकार अधिनियम की नो-डिटेंशन पॉलिसी को कमजोर करने से संबंधित - हाल के निर्णय पर विचार करें। यह निर्णय सच्चे अर्थ में राजनैतिक सहमति का श्रेष्ठ उदाहरण है। सभी विचारधाराओं के राजनेताओं ने इसका समर्थन किया। मीडिया में भी इसकी बहुत कम समीक्षा हुई। हालांकि यह एक प्रतिगामी कदम है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि लोगों को करने के लिए यह सही काम लगा। लोगों को यह स्पष्ट रूप से अपनी बचपन की यादों के प्रकाश में सही लगता है। लोगों को अपना बचपन याद आ जाता है जब वे परीक्षा में फेल होने से डरते थे। ऐसी प्रचलित यादें सामान्यबोध वाले उन तर्कों की पुष्टि करती हैं कि हम सभी ने कड़ी मेहनत की क्योंकि हम असफल होने से डरते थे।

यह तर्क इस निष्कर्ष का एक शॉर्टकट है कि अगर असफल होने का डर मिटा दिया जाए तो बच्चे कड़ी मेहनत करना बंद कर देंगे। तो, अब कोई भी खुशी से अंतिम कदम उठा सकता है: सीखने के मानक कम हैं (जैसा कि संदिग्ध सर्वेक्षणों ने बार-बार साबित किया है) क्योंकि नो-डिटेंशन पॉलिसी ने डर वाले कारक को समाप्त कर दिया है। यह त्वरित निष्कर्ष तब और स्वयंसिद्ध हो जाता है जब आब आप गरीबों के बच्चों को लेकर विचार-विमर्श कर रहे हैं। गरीबों के पुराने, अच्छी तरह से उलझे हुए मध्यवर्गीय चित्र बताते हैं कि उनके बच्चे गंभीरता से तभी सीखेंगे जब स्कूल उनके दिमाग में डर की भारी खुराक डालेंगे वह भी दैनिक आधार पर।

इस उदाहरण से पता चलता है कि शिक्षा के संबंध में लिए गए खराब फैसलों की राजनैतिक कीमत बहुत कम होती है अर्थात राजनैतिक दलों को बहुत अधिक कीमत नहीं चुकानी पड़ती है। अब हम चुनाव से पहले अक्सर पूछे जाने वाले एक प्रश्न को संबोधित कर सकते हैं: यदि शिक्षा विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, तो चुनाव के परिणाम पर कोई फर्क क्यों नहीं पड़ता? कई कारण हैं, और हमने उनमें से सिर्फ एक का नमूना लिया है। आईए अब हम दूसरे उदाहरणों की ओर मुड़ते हैं। शिक्षा मतदाताओं को एक मायावी भूभाग प्रस्तुत करती है। वे बिजली की कमी या खराब सड़कों की समस्या पर प्रतिक्रिया देते हैं। शहरी मतदाता एक ऐसी पार्टी के बारे में अच्छा महसूस करते हैं जिसके शासनकाल में पेयजल की आपूर्ति में सुधार हुआ था। स्कूलों की खराब स्थिति या परीक्षा में उच्च असफलता दर के मामले में इस तरह की प्रतिक्रिया नहीं आती है।

आप किसी ऐसे चुनाव के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकते जिसमें शिक्षा से संबंधित मांग ने मतदाताओं को एक साथ ला दिया हो। न ही आप एक ऐसे चुनाव के बारे में सोच सकते हैं जिसमें शिक्षा की उपेक्षा या कुप्रबंधन किसी पार्टी की हार का कारण बना हो। चुनाव दर चुनाव, लोगों को यह समझ में आ जाता है कि स्कूल और कॉलेज, चाहे वे कितनी भी बुरी स्थिति में हों, इसका चुनाव पर कोई फर्क नहीं पड़ता। चुनावी मुद्दे के रूप में शिक्षा की स्थिति बिजली, सड़क, पानी और नौकरी (बिजली, सड़क, पानी और रोजगार) की तुलना में बहुत कम है।

इसके बावजूद, राजनैतिक दल शायद ही कभी अपने चुनावी घोषणापत्रों में शिक्षा को शामिल करना भूलते हैं। किए गए वादे अक्सर भव्य होते हैं, शिक्षा पर एक नई राष्ट्रीय नीति की पेशकश, शिक्षा के मद में किए जाने वाले खर्च में वृद्धि, बुनियादी ढांचे में सुधार, शिक्षकों के बीच जवाबदेही वगैरह वगैरह। लेकिन जब ये वादे पूरे नहीं होते हैं, तो कोई भी किसी पार्टी या उम्मीदवार को सजा देने के लिए अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं करता है। जाहिर है, लोग शिक्षा में बहुत अधिक बदलाव या सुधार की उम्मीद नहीं करते हैं। यह शिक्षा के मोर्चे पर सरकार की विफलता को व्यापक स्वीकृति है। यह स्वीकृति तब भी प्रतिबिंबित होती है जब सरकारी संस्थानों के असफल रहने पर निजी संस्थानों से जुड़ने को आम स्वीकृति प्राप्त हो जाती है। सामाजिक वास्तविकता में इसका सामान्यीकरण हो चुका है भले ही बयान के तौर पर यह अधिक धारदार और कटु प्रतीत होता हो। निजी विकल्पों की तलाश राज्य के संस्थानों के प्रति अविश्वास की एक लंबी यात्रा का हिस्सा है और लोगों ने यह मान लिया है कि कोई नहीं बता सकता कि इनका संचालन कैसे होता है।

चुनावी मुद्दे के रूप में कम महत्वपूर्ण होने के पीछे एक अन्य कारण इसके कार्य क्षेत्र का व्यापक तौर पर विस्तारित होना है। शिक्षा के किसी भी घटक में सुधार के लिए दीर्घअवधि के नियमित प्रयास की जरूरत होती है। फल लगा देखने में कई वर्ष लग जाते हैं – पांच वर्ष से अधिक तो निश्चित तौर पर लगते हैं। तबतक जनता की स्मृतियों से इन प्रभावों के आरंभ के लिए किए गये प्रयासों की यादें समाप्त हो चुकी होती है। मीडिया से भी इसमें मदद नहीं मिलती। चुनाव के दौरान सत्ताधारी पार्टी के प्रदर्शन का विश्लेषण करने के लिए जगह बहुत कम होती है क्योंकि हाल ही में उठाए गए कदमों की बजाए पुरानी सामग्री की ओर स्थानांतरित होना मुश्किल होता है।

चुनावी बहस के केंद्र में शिक्षा के न होने का एक कारण इसका केंद्र और राज्यों के बीच भ्रामक स्थिति वाला होना भी है। दोनों के बीच शिक्षा की "समवर्ती" स्थिति नई नहीं है। अधिकांश लोग जिम्मेदारियों के वितरण और ओवरलैप को काफी भ्रामक पाते हैं। वास्तविकता में, दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से विभाजित हैं। यहां तक कि आरटीई जैसे मूलभूत उपायों पर भी केंद्र और राज्यों की भूमिका स्पष्ट नहीं है। कौन, वास्तव में, आरटीई की गति को धीमा करने के लिए जिम्मेदार है, इसकी स्पष्ट रूप से व्याख्या करना बहुत कठिन है। हिंदी पट्टी के मतदाताओं को समझाना विशेषरूप से कठिन है। हमारे देश में चुनाव के समय के लोक व्यवहार की प्रकृति को देखते हुए, जो कुछ भी थोड़ा जटिल लगता है उसे छोड़ दिया जाता है। शिक्षा का चुनावी माहौल के दौरान मुद्दा बनने की योग्यता यहीं पर समाप्त हो जाती है। साथ ही यहां भ्रम और आपत्ति की स्थिति की असीमित संभावनाएं होती हैं।

चूंकि स्कूलों और कक्षाओं के अंदर क्या हो रहा है, इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इसलिए बिना डर भय के भारी भरकम दावे किये जा सकते हैं। वास्तिवकता यह है कि सरकारों ने शिक्षा की प्रणाली बुनियादी मुद्दों को नजरअंदाज करने के लिए तकनीकि-आधारित "समाधान" के ग्लैमर से ढके हुए तरीके को ढूंढ लिया है।

माध्यमिक शिक्षा के स्लैब में, केंद्र और राज्यों के बीच का विभाजन वर्ग विभाजन को छुपाता है। उच्च आय समूह के लोगों को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएई) द्वारा सेवा दी जाती है, जबकि शेष समाज अपने बच्चों को राज्य बोर्डों से संबद्ध स्कूलों में भेजता है। हालांकि दिल्ली इस पैटर्न का एक बड़ा अपवाद है। छात्रों के उतीर्ण होने का प्रतिशत सीबीएसई और राज्य बोर्डों के बीच काफी भिन्न होता है। राज्य के बोर्डों में लाखों विफल होते हैं, लेकिन दिल्ली और राष्ट्रीय मीडिया में इसको लेकर बहुत कम चर्चा होती है। जहां तक उच्च शिक्षा की बात है, यह अपारदर्शी और अप्रासंगिक दोनों ही रहता है, क्योंकि अधिकांश बच्चे कॉलेज तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। इसलिए, अगर किसी सरकार ने उच्च शिक्षा के संस्थानों को सक्रिय रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया है, तब भी मामला राजनैतिक तौर पर बहुत अधिक नुकसान दायक नहीं होगा। इसके अलावा, उच्च शिक्षा को मुख्य रूप से इसकी डिग्री-वितरण भूमिका के संदर्भ में माना जाता है। कहने को इसका एक बौद्धिक उद्देश्य भी है, जो औसत अभिभावक-मतदाता के लिए बहुत कम मायने रखता है।

- कृष्णा कुमार (लेखक, वर्ष 2004 से 2010 तक एनसीईआरटी के डायरेक्टर थे। वर्तमान में वह दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापनरत हैं)
(यह लेख पहली बार 15 मार्च, 2019 को ‘क्यों शिक्षा एक चुनावी मुद्दा नहीं बनता’ शीर्षक के तहत इंडियन एक्सप्रेस अखबार के प्रिंट संस्करण में प्रकाशित हुआ था। लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं।)
फोटो साभारः टीचरहेड.कॉम