भ्रष्टाचारियों को फांसी देने की बात क्यों नहीं करता कोई

देश में इन दिनों भ्रष्टाचार को लेकर बवाल मचा है। संचार मंत्री ए. राजा को 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में पद से जाना पड़ा। कॉमनवेल्थ गेम्स में घोटाले को लेकर कुछ लोगों की गिरफ्तारियां तक हो चुकी हैं। मुंबई की आदर्श सोसायटी के मामले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की कुर्सी छिन गई। इन मुद्दों पर संसद कुश्ती का अखाड़ा बनी हुई है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री येदुरप्पा को मुख्यमंत्री के बजाय भू माफिया की संज्ञा दी जा रही है।

भ्रष्टाचार को लेकर देश के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा, राहुल बजाज से लेकर बाबा रामदेव तक मंत्रियों की ओर से रिश्वत मांगे जाने का खुलासा कर रहे हैं।

इस सबके बावजूद काग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी केवल चिंता जाहिर कर रही हैं कि नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है। देश में लालच और भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है। सवाल ये है इस देश में भ्रष्टाचार क्या पिछले दो- चार माह में ही बढ़ा है। इससे पहले कभी भ्रष्टाचार के मामले सामने नहीं आए। अगर थोड़ा पीछे जाएं तो पूर्व केन्द्रीय संचार मंत्री सुखराम, भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय बंगारू लक्ष्मण, तहलका जैसे मामलों को क्या हम भूल गए हैं?

जब भी भ्रष्टाचार का कोई बड़ा स्कैंडल सामने आता है, देश में हल्ला मचता है। राजनीतिज्ञ अपने अपने हिसाब से बयान देते हैं। एक या दो लोगों के इस्तीफे होते हैं। इसके बाद मीडिया, राजनीतिज्ञ, सामाजिक संगठन सब चुप हो जाते हैं। जनता भी भ्रष्टाचार के मुद्दों को भूल जाती है। मामला शांत हो जाता है। अगले चुनाव में वही लोग फिर जीतकर आ जाते हैं और उन्हीं पदों पर बिठा दिए जाते हैं।

मुझे लगता है कि इस देश में अब भ्रष्टाचार की बात करना बेमानी है। अब सवाल उठता है कि जो लोग भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाते हैं, वे खुद कितने ईमानदार हैं। देश की एक भी राजनीतिक पार्टी आज यह दावा कर सकती है कि वह चुनाव के लिए किसी से चंदा नहीं लेती? कोई अधिकारी दावे से यह कह सकता है कि उसने अपनी जिंदगी में पद पर रहते हुए किसी मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या राजनीतिज्ञ के कहने से गलत काम नहीं किया? केवल मैरिट पर ही सभी काम किए हैं? कोई उद्योगपति यह दावा कर सकता है कि वे पूरी ईमानदारी और एक नंबर की कमाई से ही शिखर तक पहुंचे हैं? कभी भी टैक्स की चोरी, मिलावट या कालाबाजारी नहीं की है? इस देश का कोई भी नागरिक यह कहने की स्थिति में है कि उससे कभी भी न तो घूस मांगी गई और न ही उसने दी, फिर भी काम आसानी से हो गया? फिर भ्रष्टाचार का कोरा ढिंढोरा क्यों? भाजपा संसद में आदर्श सोसायटी, कॉमनवेल्थ गेम्स और संचार मंत्री के घोटाले को लेकर हंगामा कर रही है, लेकिन कर्नाटक में क्यों नहीं कुछ कर रही?

अगर भ्रष्टाचार रोकने वाली एजेंसियों पर नजर डालें तो मुख्य सतर्कता अधिकारी की संस्था एकदम पंगु बनी हुई है। इसकी वजह ये है कि इसकी जिम्मेदारी उन्हीं अफसरों को दी हुई होती है जो या खुद भ्रष्टाचार करते हैं अथवा अपने विभाग में बढ़ावा देते हैं। संसद और विधानसभाओं में जनलेखा समितियों की कार्यवाहियों को गोपनीय बनाया हुआ है। उनकी रिपोर्टें कई कई साल बाद पेश होती हैं। यदि उन रिपोर्टों को भी देखा जाए तो उनमें भी लीपापोती ही नजर आती है। तीसरी संस्था लोकायुक्तों की है। उनकी कार्यवाहियां भी गोपनीय हैं। रिपोर्टस दो-तीन साल बाद पेश होती हैं, तब तक उनकी गंभीरता खत्म हो जाती है। लोकायुक्तों की संस्था अधिकारों के लिहाज से पंगु बनी हुई है। अब आया सूचना का अधिकार। इसमें सूचना देने में ही काफी समय लगा दिया जाता है। सूचना आयुक्त भी वही लोग बैठे हैं जो पहले ब्यूरोक्रेसी में रहकर भ्रष्टाचार खुद कर रहे थे या करवा रहे थे। सीबीआई और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो राज्य सरकारों के इशारे पर काम करते हैं। फिर भ्रष्टाचार कैसे रुकेगा?

अब सवाल यह उठता है कि क्या इस देश में भ्रष्टाचार का ढोल पीट कर जनता को राजनीतिक दल ऐसे ही मूर्ख बनाते रहेंगे? पिछले दिनों देश में बलात्कार के मामले में फांसी दिए जाने को लेकर बहस छिड़ी। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी मिलावटियों को फांसी दिए जाने की वकालत कर रहे हैं। लेकिन भ्रष्टाचारियों को फांसी की सजा दिए जाने की बात कोई नहीं करता। भ्रष्टाचार के मामले या तो दबा दिए जाते हैं या फिर रसूखदारों को क्लीनचिट दे दी जाती है। हां, भ्रष्टाचार के नाम पर कनिष्ठ लिपिक, पटवारी, ग्राम सेवक या सिपाही को सजा जरूर हो जाती है। नौकरी से इसलिए बर्खास्त कर दिया जाता है क्योंकि उसने बढ़ती महंगाई के कारण मामूली वेतन में गुजारा नहीं होने के कारण किसी से 100, 200 या 500 रुपए की रिश्वत ले ली थी। भ्रष्टाचार के मामले में मैंने आज तक किसी बड़े आदमी को जेल जाते या सजा भुगतते नहीं सुना है।

मैं जो सोचता हूं कि अगर भ्रष्टाचार पर अंकुश करना है तो साफ नीयत से कुछ कड़े फैसले लेने होंगे। यदि किसी राजनेता पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है और प्रारंभिक रूप से भी सही पाया जाए तो उसे और उसके परिवार को आजीवन चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर देना चाहिए। यहां तक कि उसकी सारी संपत्ति कुर्क कर लेनी चाहिए। ये प्रावधान सभी जनप्रतिनिधियों सरपंच से लेकर प्रधानमंत्री तक पर लागू होने चाहिए। इसी तरह यदि किसी अफसर या कर्मचारी पर भ्रष्टाचार का आरोप प्रमाणित होता है तो उसे तुरंत नौकरी से बर्खास्त करने के साथ ही उसकी संपत्ति कुर्क कर लेनी चाहिए। इसके साथ ही ऐसे लोगों का सामाजिक स्तर पर बहिष्कार भी होना चाहिए।

-गिरीराज अग्रवाल (g.agl1971@gmail.com)