गुणवत्तायुक्त शिक्षा आखिर चुनावी मुद्दा क्यों नहीं!!

आश्चर्यजनक है कि तमाम प्रांतीय और राष्ट्रीय आंदोलनों, सत्याग्रहों और क्रांति के लिए जाने जाने वाले भारत देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार को लेकर हुए किसी बड़े जन-आंदोलन का वाक्या याद नहीं आता। कुछ-एक आंदोलन (ज्योतिबा फुले/सावित्री बाई फुले का अभियान) जो शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर बदलाव लाने में कामयाब हुए भी तो उनका प्राथमिक उद्देश्य महिला उत्थान, समाज सुधार अथवा वर्ण/जाति व्यवस्था में बदलाव ज्यादा रहा। स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात के काल में भी कुछ बड़े आंदोलन अवश्य हुए लेकिन उनकी परिणति भी राजनैतिक बदलाव अधिक और शैक्षणिक सुधार कम रही। व्यक्तिगत तौर पर कुछ प्रयास जरूर सुधार के गंभीर प्रयास महात्मा गांधी और गोपालकृष्ण गोखले ने भी किया और उन्हें जनता से समर्थन भी प्राप्त हुआ लेकिन कहीं न कहीं ऐसा उनके व्यक्तित्व के प्रभाव के कारण हुआ माना जाता है।

हाल के कुछ वर्षों में, विशेषकर शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद अभिभावकों द्वारा विरोध प्रदर्शन करने की घटनाएं अवश्य हुई हैं लेकिन वह भी कुछ बड़े शहरों तक ही सिमट कर रह गई। हालांकि इन प्रदर्शनों का मुद्दा भी गुणवत्ता में सुधार की बजाए फीस वृद्धि तक ही सीमित रहा। यह बात दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में एक भारत के लिए शुभ संकेत बिल्कुल नहीं है। वह भी तब जबकि खुद केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने दिसंबर 2016 में देश की संसद में खड़े होकर यह स्वीकार किया था कि देश के प्राथमिक स्कूलों में 907585 शिक्षकों की कमी है और माध्यमिक स्कूलों में शिक्षकों के एक लाख से अधिक पद रिक्त हैं। यह भी एक स्वीकृत तथ्य है कि मौजूदा शिक्षकों की एक चौथाई संख्या अनुपस्थित रहती है और उपस्थित शिक्षकों में से पचास फीसद कक्षा में मौजूद नहीं रहते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस में 25 दिसंबर 2018 को सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाऊंटिबिलिटी (सीबीजीए) और चाइल्ड राइट्स एंड यू (सीआरवाई) के एक सर्वे के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया था कि छह राज्यों में प्राथमिक स्कूलों में 5 लाख से अधिक शिक्षक नहीं हैं। इनमें से 4 लाख से अधिक रिक्तियां तो सिर्फ बिहार और यूपी में ही हैं। इस बात की कल्पना ही की जा सकती है कि सिर्फ दो राज्यों में चार लाख से अधिक शिक्षक नहीं हैं तो यहां कौन सी गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान की जाती होगी। मानव संसाधन मंत्री के अनुसार बिहार और झारखंड के प्राथमिक स्कूलों में सबसे अधिक शिक्षकों की कमी थी। झारखंड में 38.39 प्रतिशत और बिहार में 34.37 प्रतिशत शिक्षकों के पद खाली थे। दिल्ली में 24.96 प्रतिशत, यूपी में 22.99 प्रतिशत शिक्षकों के पद खाली थें। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा जैसे छोटे राज्य में 29,000 शिक्षकों के पद खाली थें। यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन की प्रो. गीता गांधी किंगडन के मुताबिक भारत में एक लाख से अधिक स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक हैं। दो लाख से अधिक स्कूल ऐसे हैं जहां औसतन 10 से कम बच्चों का दाखिला है।

दूर दराज के राज्यों की बात छोड़ भी दें तो देश की राजधानी दिल्ली में ही जहां कि सरकार शिक्षा में सुधार को लेकर बड़े बड़े दावे करती है वहां भी स्थिति ज्यादा अलग नहीं है। हाल ही में प्रजा द्वारा जारी रिपोर्ट में राज्य में शिक्षा की दुर्दशा के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2013-14 में सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या 15,92,813 थी जो वर्ष 2017-18 में घटकर 14,60,675 ही रह गयी है। 10वीं की बोर्ड की परीक्षा में पास होने वाले छात्रों की प्रतिशतता भी वर्ष 2013-14 के 98.81% से घटकर वर्ष 2017-18 में 68.9% हो गयी है।
आलम यह है कि सरकारी स्कूलों में रंग रोगन करा देने और नई कुर्सियां और मेजे लगा देने भर को ही हम शिक्षा में सुधार मानना शुरू कर देते हैं। उधर, तुलनात्मक रूप से अच्छी शिक्षा देने वाले स्कूलों पर तमाम तरह की बंदिशें लगाकर उन्हें बंद होने पर मजबूर किया जा रहा है। जीवन में शिक्षा का अतुलनीय योगदान होने के बावजूद हम अपनी आंखों के सामने अपने नौनिहालों का भविष्य बर्बाद होता देख रहे हैं लेकिन चुप हैं। हम इसे चुनावी मुद्दा नहीं बनाते हैं। हम अपने राजनेताओं पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने का दबाव नहीं बनाते हैं। एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक कृष्ण कुमार के मुताबिक शिक्षा का संविधान की समवर्ती सूची में होना भी इसका एक बड़ा कारण है। क्योंकि यह प्रावधान शिक्षा को राज्य और केंद्र के अधिकारों के बीच झुलाता रहता है और किसी एक सरकार को जवाबदेही से ढाल प्रदान करता रहता है।

वैसे आश्चर्य इस बात पर भी होना चाहिए कि जिन निजी स्कूलों को लुटेरा और अभिभावकों का खून चूसने वाला तक बता दिया जाता है वे स्कूल ही नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स एलायंस (निसा) के बैनर तले देशभर में ‘सेव एजुकेशन’ अर्थात शिक्षा बचाओं अभियान चला रहे हैं। इस अभियान में उन्हें जनसहयोग अपेक्षित है..

- संपादक

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