क्यों अपराधी जीत जाते हैं, उदारवादी नहीं?

जब भी चुनाव आते हैं तो मैं यह सोचकर हताश हो जाता हूं कि हम सच्चे, स्वतंत्र और सुधार चाहने वाले उदार नागरिकों की बजाय फिर अपराधियों, लुभावने नारों वाले भ्रष्टों और राजनीति क वंश के सदस्यों को चुन लेंगे। इस बार तमिलनाडु में शशिकला और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की धक्कादायक जीत साफ-सुथरे उदारवादियों की नाकामी को रेखांकित करती है।

इस समस्या के समाधान के लिए मैंने एक बार आदर्श उदारवादी राजनीतिक दल की हिमायत की थी। 21वीं सदी में युवा और अपेक्षाओं से भरा भारत ऐसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी का हकदार है, जो आर्थिक नतीजों के लिए अधिकारियों की बजाय बाजार पर भरोसा करने के साथ सरकारी संस्थानों में शासन सुधार पर अपना ध्यान केंद्रित करती हो। संभव है कि इसे जल्दी चुनावी सफलता न मिले लेकिन, यह शासन में सुधार का मुद्दा बहस के केंद्र में ले आएगी। यह धीरे-धीरे लोगों के सामने साबित कर देगी कि खुले बाजार और नियमों से संचालित सरकार ही जीवनस्तर ऊंचा उठाने और सबकी समृद्धि का एकमात्र समझदारी भरा रास्ता है।

इसी आधार पर मेरे मित्र संजीव सबलोक ने 2013 में विशुद्ध रूप से उदारवादी 'स्वर्ण भारत पार्टी' बनाई लेकिन, इसे अभी व्यापक समर्थन नहीं मिला है। मुझे अपराध बोध महसूस होता है कि मैंने इसके लिए पर्याप्त योगदान नहीं दिया और न मेरे उदारवादी मित्र इसमें शामिल हुए। जब मैं हमारी नाकामी पर विचार कर रहा था तो मैं चौंकाने वाले निष्कर्ष पर पहुंचा। मुझे अहसास हुआ कि उदारवादी सिद्धांतों पर आधारित पार्टी के जीतने के लगभग कोई अवसर नहीं है बशर्ते यह किसी 'पहचान' आधारित पार्टी से गठबंधन नहीं करती।

रियायती बिजली और भोजन के लोक-लुभावन वादे करने वाला प्रत्याशी हमेशा उस उदारवादी को हरा देगा, जो निजी उद्यम और स्पर्द्धा की वकालत करता है। चुनाव में खुले बाजार को मतदाताओं के गले उतारना कठिन है, क्योंकि बाजार का 'अदृश्य हाथ' उन्हें दिखाई नहीं देता, जबकि सरकार का दिखने वाला हाथ और भी प्रखरता से दिखाई देने लगता है। किंतु 'वामपंथी उदारवादी' के सफल होने की संभावना अधिक है, क्योंकि वह सरकार के हस्तक्षेप से व्यापक कल्याणकारी राज्य की हिमायत करता है। इसीलिए वाम-उदारवादी कांग्रेस चुनाव के दौरान रियायतें बांटने पर ध्यान केंद्रित कर दशकों तक अपनी सत्ता कायम रख पाई।

शास्त्रीय किस्म का उदारवाद आर्थिक स्वतंत्रता के वातावरण में हर किसी को ऊपर उठने का अवसर देता है। इस व्यवस्था में सरकार से ऐसा वातावरण उपलब्ध कराने की उम्मीद होती है, जिसमें कोई भी व्यक्ति खुले, पारदर्शी बाजार में शांतिपूर्वक अपने हितों की दिशा में बढ़ सके। इसके बाद 'अदृश्य हाथ' धीरे-धीरे चारों तरफ का जीवनस्तर ऊंचा उठाने में मदद करता है और लोगों को गरिमापूर्ण मध्यवर्गीय जिंदगी की ओर ले जाता है। 'अदृश्य हाथ' का यह जुमला एडम स्मिथ का है, जो शास्त्रीय उदारवाद के संस्थापकों में से थे। वे मानते थे कि मुक्त बाजार में हर व्यक्ति अपने हित का पीछा करता है तो 'अदृश्य हाथ' समाज के साझा हित को साकार करता है। चूंकि वोटर यह नहीं समझ पाता कि कैसे बिज़नेस चलाने में सरकार की बजाय बाजार अच्छा है, शास्त्रीय किस्म के उदारवादी सांस्कृतिक व सामाजिक पहचान वाली पार्टियों में शामिल हो गए। अमेरिका में वे 'लिबरल रिपब्लिकन' या 'कंज़र्वेटिव डेमोक्रेट' बन गए। किंतु उन्हें इसकी कीमत 'गर्भपात विरोधी' ईसाई एजेंडे तथा रिपब्लिकनों की गन लॉबी और डेमोक्रेटिक पार्टी के सख्त, अक्षम श्रम संगठन स्वीकार करने पड़े। ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर को अपनी पार्टी (व देश) को बाजार के हित में लाने के लिए टोरी के 'परम्परागत अंग्रेजियत' के आदर्श स्वीकारने पड़े।

भारत में भी कई उदारवादी मोदी के 'विकास' एजेंडे का समर्थन करते हैं पर भाजपा की हिंदुत्ववादी सांस्कृतिकता से वास्ता नहीं रखते। 2014 के चुनाव में मोदी की चमत्कारी सफलता 'अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार' के उदारवादी आह्वान का ही नतीजा था, जिसने महत्वाकांक्षी युवाओं या कांग्रेस की लोक- लुभावन नीतियों से हताश लोगों को आकर्षित किया। इसका नतीजा यह हुआ कि उन्होंने भाजपा में आर्थिक उदारवादियों के लिए जगह बनाई और भाजपा परिपक्व होकर दक्षिणपंथी झुकाव वाली मध्यमार्गी पार्टी बन गई, जिसमें आर्थिक व सांस्कृति क दक्षिणपंथ का स्पष्ट विभाजन था। हालांकि, मोदी मार्गरेट थैचर की तरह आर्थिक व सांस्थानिक सुधारों के लिए वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध आदर्श उदारवादी नहीं हैं। वे व्यावहारिक आधार पर सुधार लाते हैं। अब भी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मोदी ‘विकास’ के वादे को पूरा करेंगे या नहीं लेकिन, यदि वे अपने उदारवादी समर्थक कायम रखना चाहते हैं, तो उन्हें अपने दल की सांस्कृतिक शाखा को कड़े नियंत्रण में रखना होगा। लेकिन लोग चुनाव में आपराधिक रिकॉर्ड वाले व्यक्ति को क्यों चुनते हैं? 2014 में चुने गए सांसदों में से एक-तिहाई के खिलाफ अपराधिक प्रकरण चल रहे हैं और बीस फीसदी सांसदों पर तो हत्या व दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। स्पष्ट है कि (543 में से) सौ से ज्यादा कानून निर्माताओं पर गंभीर आरोप दायर हैं। मिलन वैष्णव अपनी नई किताब 'व्हेन क्राइम पेज़' में लिखते हैं कि अपराधी चुनावों की आसमान छूती लागत उठाने और पार्टी कोष को भरने में बेहतर साबित होते हैं। मतदाता 'अपराधियों' को 'काम करा लेने' की काबिलियत के कारण चुनते हैं। कानून-व्यवस्था से संबंधित शिकायतें निपटाने में पुलिस की बजाय 'अपराधी' सांसद ज्यादा प्रतिसाद देते हैं।

मुझे दुख है कि किसी उदारवादी दल का न तो भारत में, न और कहीं भविष्य है। पिछली तीन सदियों तक उदारवाद ने ही न्यायोचित राजनीतिक आंदोलनों को संचालित किया है। 20वीं सदी में ज्यादातर राजनीतिक विमर्श इसी के हक में रहा। इसने भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्त कराया, साम्यवाद को धराशायी करने में इसी की भूमिका थी और भारत के आर्थिक सुधार भी इसी से संचालित हुए। किंतु उदारवादियों ने इन सुधारों का श्रेय नहीं लिया और इसीलिए हम चुपके से सुधार लाते रहे हैं। उदारवादी कोई संत नहीं है लेकिन, यह शर्म की बात है कि समृद्धि व शासन के पक्ष में तर्कपूर्ण दलीलों की बजाय मतदाताओं के लिए नस्ल, धर्म और जातिगत पहचान के आधार पर की गई भावनात्मक अपील का महत्व ज्यादा है।

- गुरचरन दास (लेखक 'इंडिया अनबाउंड' किताब के लेखक हैं)
साभार: http://gurcharandas.org/why-criminals-win-and-not-liberals
पूर्व प्रकाशित 1 मार्च 2017 (दैनिक भास्कर)

गुरचरण दास

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