प बंगाल मे बदलाव की बयार

भारतीय-शैली के साम्यवाद के बारे में ही जानने वाले पश्चिम बंगाल में वर्षों की ऊहापोह के बाद आखिरकार बदलाव का समय आ गया लगता है। यह राज्य महत्वपूर्ण आर्थिक विकास के मुद्दों के मामले में सभी बड़े राज्यों में लगभग सबसे नीचे के स्तर पर है, जैसे कि वहां ग़रीबी सीमा रेखा के नीचे रहने वालों का प्रतिशत सबसे ज्यादा है।

लोकप्रियता की लहर पर सवार होकर कोलकाता के रायटर्स बिल्डिंग पर कब्ज़ा करने की उम्मीद रखने वाली ममता बैनर्जी की जीत पश्चिम बंगाल की कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था के लिए क्या मायने रखती है?

34 वर्षों से शासन करने वाली भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को राज्य की आर्थिक दुरावस्था के लिए व्यापक रूप से जिम्मेदार माना जाता है और उम्मीद की जा रही है कि इस बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ मिलकर सुश्री बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के हाथों उसकी क़रारी हार होने वाली है। इससे भारतीय राजनीति में भारी बदलाव आएगा, क्योंकि अधिकांश नौजवान मतदाता किसी अन्य सरकार को जानते ही नहीं यह भले ही बर्लिन की दीवार के गिरने जैसा महत्वपूर्ण न हो, लेकिन यह भारत के लिए लगभग उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

चूंकि अपनी आर्थिक नीति के बारे में सुश्री बैनर्जी साफ़-साफ़ कुछ नहीं बोल रही हैं, इसीलिए हमें अनुमान लगाना होगा कि नयी आर्थिक नीति कैसी होगी।  इस मामले में, उनका रिकॉर्ड एक चेतावनी होनी चाहिए। उनकी देखरेख में रेलवे को भारी नुकसान उठाना पड़ा है और रेलवे के नेटवर्क का विस्तार करने तथा इसकी पुरानी संरचना के आधुनिकीकरण के मामले में वे नाकाम रही हैं।

इस साल के आरंभ में उन्होंने रेलवे बजट पेश किया, जिसे व्यापक रूप से लोकप्रियता प्राप्त करनेवाला बजट माना गया। रेलवे की कमियों को दूर करने तथा युक्तिसंगत ऑपरेशन चलाने के प्रति गंभीरता के बजाय यह चुनाव अभियान अधिक लगा। अपने गृह राज्य पर बहुत अधिक ध्यान देने के  लिए सुश्री बैनर्जी  की आलोचना भी  की गयी।

फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के महासचिव अमित मित्र ने रेलवे के नुकसान के लिए वैश्विक आर्थिक मंदी और उसके बाद राजस्व के सबसे बड़े स्रोत माल किराये में आयी गिरावट को जिम्मेवार ठहराया है। श्री मित्र को राज्य के भावी वित्तमंत्री के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन यह अर्द्धसत्य है।

माल राजस्व में गिरावट से हुए नुकसान की भरपाई का रेलवे के पास सिर्फ एक ही रास्ता है कि वह यात्री किराये में वृद्धि करे। जो लोग ट्रेन से यात्रा किया करते हैं, आमतौर पर उनके पास कार या हवाई यात्रा जैसा दूसरा विकल्प नहीं हुआ करता है; ऐसे में रेलवे टिकटों की मांग पर कीमत का ‘प्रभाव’ नहीं पड़ता या अर्थशास्त्र की शब्दावाली में कहा जाय तो यह ‘मूल्य निरपेक्ष’ है। हालांकि यात्री किराये में वृद्धि से अनेक लोगों को राजनीतिक रूप से मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। स्पष्ट रूप से सुश्री बैनर्जी के लिए इस संतुलन को बनाने में कठिनाई पेश ‍आयी.

इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस के घोषणापत्र  से भी हमें कुछ संकेत मिल सकता है। इसके शुरूआती हिस्से में सीपीएम के शासन के तहत प. बंगाल की आर्थिक नीति की आलोचना की गयी है। विनिर्माण में आयी गिरावट से शुरू करके विनिर्माण रोज़गार तथा श्रम उत्पादकता में आयी कमी की आलोचना की गयी है। घोषणापत्र में आगे कृषि में आयी गिरावट, राज्य के आर्थिक संकट तथा बुनियादी संरचना, स्वास्थ्य और शिक्षा की खराब स्थिति का भी उल्लेख किया गया है। ऐसी निराशाजनक तस्वीर पेश की गयी है कि सीपीएम के खंडन के प्रयास के बावजूद इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ रहा। मसलन, 17 बड़े राज्यों में राज्य का स्थान 9वां है, सीपीएम का यह दावा कुछ वैसा ही है जैसे कि उसने अपने ही गोलपोस्ट में गोल मार दिया हो!

तृणमूल कांग्रेस के घोषणापत्र के दूसरे हिस्से में यह सकारात्मक दृष्टि पेश की गयी है कि चुनाव में जीत के बाद पार्टी किस तरह अर्थव्यवस्था में बदलाव लाएगी। इसमें अर्थव्यवस्था की संचालक शक्ति के रूप में विनिर्माण क्षेत्र को पुनर्जीवित करने को रखा गया है। श्रम-आधारित क्षेत्रों पर खास ध्यान देने की बात की गयी है, ताकि बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा हों। बुनियादी संरचना, स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश करने और राज्य की वित्तीय हालत को अच्छी स्थिति में लाने के वादे किये गए हैं। योजनाबद्ध संरचना निवेश के सिलसिले में खर्च के विवरण नहीं दिये गए हैं, लेकिन उम्मीद है कि यह राशि बड़ी होगी। करों में कोई बड़ी वृद्धि किये बिना या सामाजिक खर्च या वेतनों में कटौती किये बिना बही-खाते के साथ संतुलन स्थापित करने के लिए कितना बड़ा नया निवेश किया जा सकता है, यह साफ़ नहीं है।

सुश्री बैनर्जी अगर सत्ता पर काबिज़ होती हैं तो राज्य की आर्थिक स्थिति के लिए कुछ करने की कम ही गुंजाईश रह पाएगी। हमेशा से संवेदनशील रहे भूमि अधिग्रहण के मुद्दे को भी नहीं भूलना चाहिए, जो राज्य के फिर से औद्योगिकीकरण के लिए बहुत ज़रूरी है। मज़बूत स्वार्थों से निपटना और एक पीढ़ी से भी अधिक समय से राज्य प्रशासन से सीपीएम का जुड़ा होना, राज्य को पुनर्जीवित करने की उनकी योजना के लिए बहुत ही विकट साबित हो सकता है।

- रूपा सुब्रह्मण्या