दुनिया में सबसे आत्मविश्वासी हम हिन्दुस्तानी

विपक्ष के नेता लालकूष्ण आडवाणी ने 22 जून को मुंबई में कहा कि रैनबैक्सी  का जापानी कंपनी के हाथों बिकना राष्ट्रिय हितों के साथ धोखाधड़ी है ! उन्होंने यह भी कहा कि हमें सोचना चाहिए कि ऐसे सौदे से सस्ती दवाओं  की सुलभता पर कैसा असर पड़ता है ! श्री आडवाणी यह मानकर चल रहे है की भारतीय रैनबैक्सी  किसी विदेशी रैनबैक्सी की अपेक्षा अपनी दवाएं सस्ते दामों पर बेचेगी ! हकीकत यह है की कीमतों का भारतीय या विदेशी होने से कोई लेना देना नहीं है ! कीमतें बाजार में प्रतिस्पर्धा से निर्धारित होती है! भारत जैसे उग्र प्रतिस्पर्धी बाजार में, जहां ९७.८ फीसदी दवाएं पेटेंट से बाहर है, जब प्रतिस्पर्धी कंपनी एक दवा २० रुपये में बेच रही हो तो आप अपनी दवा ५० रुपये में नहीं बेच सकते ! यही नहीं, हमारे यहाँ बहुधा इस्तेमाल होने वाली दवाओं पर मूल्य नियंत्रण प्रणाली लागू है!

पिछले कुछ सालों से मुझे रैनबैक्सी के बोर्ड में होने का विशेषाधिकार मिला है और मैंने गर्व के साथ इसे भारत की पहली सच्ची बहुरास्ट्रीय कंपनी बनते देखा है! इसने दर्जन भर अन्य कपनियों को प्रेरित किया जिसके नतीजतन आज भारत में विश्व स्तरीय जेनेरिक दवा उघोग है !  इससे पश्चिम की विशाल कम्पनियां डरती है क्योकि यह उनके पेटेंटो को आक्रामक चुनौती देता है ! हेल्थकेयर प्रोफेशनल इसकी तारीफ करते है क्योंकि यह दुनिया भर में दवाओं की कीमतें कम करने में मदद करता है!

इसलिए जब मालविंदर सिंह ने अपने परिवार की अंशपूंजी जापानी कंपनी दाईची सांक्यो को १०हजार करोड़ रुपये में बेचने की घोषणा की तो मुझसे कैसी प्रतिक्रिया अपेक्षित थी ?मैंने देखा कि मालविंदर का परिवार भी इस घोषणा से चकित था ! महीनों चलने वाली इस बातचीत को इतना गोपनीय रख सके, इससे मेरे दिमाग में कंपनी का चरित्र ही प्रबल हुआ ! शुरुआत में अल्बत्ता मुझे अफसोस हुआ था - भारत की एक बेहतरीन कंपनी जापानी कंपनी की सहायक कैसे बन सकती है! लेकिन गहराई से सोचने पर मुझे लगा मै गलत था ! यह सौदा कंपनी को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में और मजबूत बना सकता है!

आज दुनिया की बड़ी से बड़ी दवा कम्पनियां संघर्ष से गुजर रही है! उनके  पुराने पेटेंट खत्म हो रहे है और नई खोजें बेहद दुर्लभ है! हेल्थकेयर की बढ़ती लागत के चलते सस्ती जेनेरिक दवाओं का बाजार बढ़ रहा है !तीव्र प्रतिस्पर्धा के कारण रैनबैक्सी जैसी जेनेरिक दवा कंपनियों  के मुनाफे में नाटकीय कमी आई है ! इसका समाधान यही है कि नई-नई दवाओं की खोज में लगी पुरानी कंपनियां जेनेरिक दवा कंपनियों के साथ विलय कर लें ! आज  की दुनिया में अकेले लड़ते रहने के बजाय साथ मिलकर लड़ना बेहतर है!

यही कारण है कि जापानी कंपनी ने रैनबैक्सी का मूल्य ८.५ बिलियन डॉलर तय किया जबकि उसके शेयर का बाजार मूल्य केवल ५ बिलियन डॉलर था ! इसीलिए वह रैनबैक्सी की भावी आमदनी का ३५ गुना ज्यादा दे रही है ! फिर दोनों अलग-अलग की बजाय साथ मिलकर ज्यादा संपदा पैदा कर सकेगी ! लेकिन एक भारतीय कंपनी को बेचकर संपदा कैसी निर्मित हो सकती है ? कंपनिया देश के लिए संपदा तब निर्मित करती है जब वे देशवाशियो के लिए नोकरियां, शेयरधारको के लिए लांभाश, सप्लायर के लिए राजस्व और सरकार के लिए टैक्स का निर्माण करती है ! इन चारों के लिए रैनबैक्सी लाभ निर्मित करती रहती, लेकिन वह कम होता क्योंकि वैश्विक मानदंडो  से वह अब भी छोटी और कमजोर कंपनी होती!

२००८ का प्यू ग्लोबल सर्वे बताता है कि भारतीय आज धरती पर सबसे ज्यादा आत्मविश्वास से लबालब लोग है ! इस साल की शुरुआत में २४ बड़े देशो के २४ हजार लोगो से सवाल किये गए ! १०मे से ९ भारतीयों ने कहा कि विदेशी व्यापार देश के लिए बहुत अच्छा है या कुछ अच्छा है ! १० में ६ भारतीयों ने विदेशियों द्वारा  भारतीय कंपनियों की खरीद का स्वागत किया ! भारतीयों की यह परिपक्वता १७ सालों तक टिकाऊ आर्थिक सुधारो का ही नतीजा है ! हम समझ चुके है कि कंपनियों की  खरीद-बिक्री दोतरफा गतिविधि है जिससे कंपनियों और राष्ट्रों दोनों की मूल्य वृद्धि होती है!

- गुरचरण दास
(लेखक बहुराष्ट्रीय कंपनी प्रोक्टर और गैंबल इंडिया के चेयरमैन और एमडी रह चुके है । वे  जानेमाने स्तंभकार और ‘इंडिया अनबाउंड’ और ‘ इंडिया ग्रोज एट नाइट ‘ पुस्तकों के लेखक हैं)
(29जून 2008 के दैनिक भास्कर से साभार)