वॉलमार्ट पर हंगामा

अमेरिका में वॉलमार्ट कंपनी की लॉबिंग की रिपोर्ट पर भारतीय संसद में गतिरोध खड़ा करने वाली पार्टियों का मुद्दा क्या है, इसे सहजता से नहीं समझा जा सकता। अगर वॉलमार्ट या उसकी तरफ से लॉबिंग के लिए नियुक्त कंपनी ‘पैटन बॉग्स’ ने भारत में किसी को रिश्वत दी तो यह आपराधिक मामला होगा। लेकिन प्रारंभिक रूप से इसके कोई संकेत नहीं हैं। वैसे भी एक वकील ने यह मसला सुप्रीम कोर्ट के सामने रख दिया है। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में उपलब्ध तमाम तथ्यों की रोशनी में अपना फैसला देगा।

जहां तक लॉबिंग का प्रश्न है, तो जैसा कि अमेरिकी सरकार और वॉलमार्ट दोनों ने सफाई दी है कि अमेरिका में यह वैध एवं पारदर्शी गतिविधि है, जिससे संबंधित रिपोर्ट हर कंपनी को हर तीन महीने में अमेरिकी कांग्रेस के सामने रखनी पड़ती है। दरअसल, भारत में जो हंगामा खड़ा हुआ, वह ऐसी ही रिपोर्ट से सामने आई जानकारियों पर आधारित है। अगर इस कंपनी की तरफ से भारत में खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की गई (जिसके बारे में विवरण का अभाव है), तो उसका अर्थ सीधे घूसखोरी के रूप में निकालने का कोई आधार नहीं है।

भारत का कार्पोरेट सेक्टर इस क्षेत्र में एफडीआई की वकालत लंबे समय से कर रहा था। इस अनुमान का अधिक तार्किक आधार है कि भारत सरकार के निर्णय को इस क्षेत्र की मांग ने ज्यादा प्रभावित किया होगा। इसलिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विपक्ष ने एफडीआई पर वोटिंग के प्रावधान के तहत संसद में बहस के बाद इस मुद्दे पर नए सिरे से संसदीय गतिरोध खड़ा कर दिया।

भ्रष्टाचार के आरोपों से पहले से घिरी सरकार को बैकफट पर डालने की यह रणनीति सियासी नजरिये से फायदेमंद हो सकती है लेकिन इसे स्वस्थ संसदीय परंपरा का हिस्सा नहीं माना जा सकता। लॉबिंग एवं घूसखोरी को एक जैसा बताकर विपक्षी दल जनता को कोई भला नहीं कर रहे हैं। बहरहाल, अगर जांच का एलान करने से गतिरोध टूटता है, तो सरकार ने ऐसा इरादा जताकर उचित किया है। संभवतः इससे यूपीए सरकार अपनी छवि बचा सकेगी, जिसे ध्वस्त करना विपक्ष का मकसद लगता है।

- साभार दैनिक भास्कर