लॉबिंगः हंगामा है क्यों बरपा?

जब से भारतीयों विशेषकर खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का विरोध कर रही राजनैतिक पार्टियों को पता चला है कि वालमार्ट ने भारत में एफडीआई को मंजूरी देने के प्रति सहमति कायम कराने के लिए ‘लॉबिंग’ के मद में सवा सौ करोड़ रूपए की भारी भरकम धनराशि खर्च की है, उनकी भृकुटि तन गई है। एफडीआई के मुद्दे पर लोकसभा में वोटिंग के दौरान हुई हार से तिलमिलाए राजनैतिक दलों को जैसे सरकार को गलत और खुद को सही साबित करने का एक बड़ा मौका मिल गया। मुख्य विपक्षी दल सहित अन्य दलों ने जिस प्रकार लॉबिंग पर हाय तौबा मचाना शुरू किया और संसद की कार्रवाई में गतिरोध पैदा किया वह उनकी अधीरता का परिचायक है। वास्तव में, या तो राजनैतिक दल जानबूझ कर वास्तविकता से अंजान बनने का ढोंग कर रहें हैं या फिर यह उनकी अज्ञानता के स्तर को प्रदर्शित करता है। वैसे एफडीआई के मुद्दे पर संसद में बहस के दौरान जिस प्रकार नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने मैक डॉनल्ड्स द्वारा पंजाब से आलू न खरीदने की दलील दी और जिस प्रकार, सरकार व स्वयं मैक डॉनल्डस द्वारा इस बात का खंडन करते हुए खरीदे गए आलू का आंकड़ों के साथ ब्यौरा दिया गया उससे न केवल भाजपा की जबरदस्त किरकिरी हुई बल्कि उनके साथ अन्य दलों के नीति निर्धारकों के ज्ञान और जानकारी के स्तर का भी पता चल गया।

दरअसल, इतने बड़े मामले की शुरूआत एक बड़ी ही साधारण सी बात के साथ हुई। और वह साधारण बात थी वॉलमार्ट कंपनी द्वारा विदेशों में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त करने के लिए समर्थन जुटाने के मद में चार वर्षों के दौरान 25 मिलियन डॉलर की धनराशि खर्च करने का। इस बात की भनक लगते ही भारत में लॉबिंग का बखेड़ा खड़ा कर दिया गया और इस प्रकार प्रस्तुत किया गया जैसे लॉबिंग का एकमात्र अर्थ रिश्वत देकर समर्थन जुटाना ही होता है। चूंकि भारत की जनता पूर्व में सांसदों के ‘पैसे लेकर सवाल पूछने’ और ‘नोट के बदले वोट’ देने जैसे वाकए का अनुभव कर चुकी है इसलिए राजनैतिक दलों की इस दलील को सीधे सीधे खारिज कर देने का उनके पास कोई कारण भी नहीं था। हालांकि वॉलमार्ट की मुखालफत कर रही पार्टियों द्वारा बड़ी चतुराई से यह जानकारी छिपा ली गई कि 25 मिलियन डॉलर में भारत सहित अन्य देशो में लॉबिंग के मद में हुआ खर्च भी शामिल है। वैसे भी अमेरिका सहित कई देशों में लॉबिंग एक वैध प्रक्रिया है जिसकी सहायता से विभिन्न मुद्दों पर प्रशासन की सहमति प्राप्त करने की कोशिश की जाती है।

दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात कि तमाम निजी व सरकारी भारतीय कंपनियां भी विदेशों में अपने समर्थन में माहौल बनाने के लिए वर्षों से लॉबिंग प्रक्रिया को अपनाती रही हैं। मजे की बात यह है कि भाजपानीत एनडीए के शासन में भी यह प्रक्रिया बदस्तूर जारी रही थी। ‘द वॉल स्ट्रीट जरनल’ के मुताबिक एनडीए शासन के दौरान अक्टूबर 2002 में सरकारी कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने लॉबिंग के लिए वाशिंगटन के एक लॉ फर्म सिडले ऑस्टिन ब्राऊन एंड वुड की सहायता ली थी। इसके अलावा कई भारतीय कंपनियों द्वारा भी विगत के वर्षों में अपने हितों को बढ़ावा देने के लिए विदेशों में लॉबिंग कर लाखों डॉलर खर्च किए गए हैं। वर्ष 2003 तक भारतीय तकनीकी के क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यवसायिक समूह नैसकॉम (NASSCOM) ने अमेरिका में लॉबिंग के मद में 2.95 मिलियन डॉलर खर्च किए। यह लॉबिंग अंतरराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी और आव्रजन मुद्दों को लेकर की गई थी। वर्ष 2009 तक रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने अमेरिका में 1.88 मिलियन डॉलर खर्च किए, जबकि 2005 से 2008 के बीच निर्माण व अभियांत्रिकी के क्षेत्र की बड़ी कंपनी लार्सन व टूब्रो लिमिटेड ने इसी मद में 1.2 मिलियन डॉलर खर्चे। पटनी कम्प्यूटर सिस्टम (पीसीएस), टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), आर्किड केमिकल्स व फार्मास्यूटिकल्स, सन फार्मास्यूटिकल्स इंडस्ट्रीज यहां तक कि हस्त निर्मित कालीन के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए कार्पेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (सीएपीसी) अन्य कंपनियों ने भी कई अमेरिकी लॉबिस्ट कंपनियों की सहायता ली और करोड़ों रूपए खर्च कर लॉबिंग की। खुद भारत सरकार ने कई वर्षों तक वॉशिंगटन में लॉबिंग, विशेष रूप से अमेरिका के साथ नागरिक परमाणु ऊर्जा समझौता शामिल है। जबकि इस बात पर संसद में कभी हंगामा नहीं हुआ।

द वाल स्ट्रीट जनरल से बातचीत में स्वयं नैसकॉम के प्रेसिडेंट सोम मित्तल ने स्वीकार किया है कि वॉलमार्ट द्वारा की गई लॉबिंग का विरोध राजनैतिक स्वार्थ के तहत किया गया है। इन सबके बावजूद यदि सरकार चला चुकी भारतीय जनता पार्टी व किसी न किसी रूप में सरकार में शामिल रहीं अन्य पार्टियां लॉबिंग के खिलाफ बयानबाजी कर रही हैं तो सिर्फ दो ही कारण समझ में आते हैं, एक या तो वे अज्ञानता का शिकार है या फिर जानबूझ कर लोगों के मन में भ्रम और विदेशी किराना स्टोर्स के प्रति डर पैदा कर रही हैं। हास्यास्पद यह है कि सरकार में शामिल व अपनी पार्टी के मुखिया को अगला प्रधानमंत्री बनाने का सपना पाले बैठे एक राजनैतिक दल की ओर से यह बयान भी दिया जाता है कि चूंकि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती इसलिए उनके साथ वॉलमार्ट की ओर से कोई लॉबिंग नहीं की गई।

तो फिर क्या यह मान लिया जाए कि एनडीए शासन के दौरान सरकारी व गैर सरकारी कंपनियों द्वारा की गई लॉबिंग सरकार की जानकारी में नहीं थी। और यदि थी तो क्या आज भाजपा व अन्य राजनैतिक दल जानबूझ कर अंजान बनने का ढोंग कर रहे हैं। सोचिए...

-  अविनाश चंद्र

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.